शरीर के दूसरे अंगों की तरह आंखों की भी समय-समय पर जांच कराना बेहद जरूरी है। खासकर बच्चों में आंखों की रोशनी से जुड़ी परेशानियों का समय रहते पता लगाना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि कई बार बच्चे खुद यह नहीं बता पाते कि उनको देखने में किस तरह की दिक्कत आ रही है। थोड़ी सी भी लापरवाही भविष्य में गंभीर परिणाम दे सकती है।
वर्ल्ड साइट डे और आंखों की सेहत का महत्व
हर साल अक्टूबर के दूसरे गुरुवार को 'वर्ल्ड साइट डे' (World Sight Day) मनाया जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों को आंखों की सेहत के प्रति जागरूक करना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनियाभर में कम से कम 2.2 अरब लोग पास या दूर की चीजें देखने में परेशानी यानी विजन इंपेयरमेंट से जूझ रहे हैं। इनमें कम से कम 1 अरब ऐसे मामले हैं, जिन्हें समय पर रोका जा सकता था या जिनका इलाज संभव था लेकिन सही वक्त पर ध्यान नहीं दिया गया।
बच्चों और बड़ों में आंखों की समस्याएं
विशेषज्ञों के अनुसार, वैसे तो आंखों की जांच सभी आयु वर्ग के लिए जरूरी है, लेकिन बड़ों की तुलना में बच्चों में आंखों की समस्या का आसानी से पता नहीं चल पाता। कई बच्चे यह समझ ही नहीं पाते कि उनकी नजर सामान्य से कम है। ऐसे में वे किताब को बहुत पास लाकर पढ़ते हैं, आंखें सिकोड़कर देखते हैं या पढ़ाई में कठिनाई महसूस करते हैं। इन आदतों से आंखों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और समस्या और अधिक गंभीर हो सकती है। इसलिए बच्चों की नियमित आंखों की जांच कराना अनिवार्य है ताकि समय रहते चश्मा या अन्य उपचार शुरू किया जा सके।
किन लक्षणों पर दें विशेष ध्यान?
आंखों की हर बीमारी शुरुआत में तेज दर्द, लालिमा या धुंधला दिखने जैसे स्पष्ट लक्षण नहीं देती है। ग्लूकोमा (काला मोतिया) और डायबिटिक रेटिनोपैथी जैसी साइलेंट बीमारियां अंदर ही अंदर नुकसान पहुंचाती हैं। इनका शुरुआती चरण में पता लगाने के लिए डॉक्टर से संपूर्ण जांच कराना जरूरी है। यदि सिरदर्द, बार-बार आंखें मलना या देखने में असुविधा जैसे संकेत मिल रहे हैं, तो तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करें।
स्वास्थ्य संबंधी यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य समस्या होने पर 'The Freelance' हमेशा योग्य नेत्र विशेषज्ञ या डॉक्टर से परामर्श लेने की सलाह देता है।
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