भारतीय राष्ट्रीय राजमार्गों पर इन दिनों एक ऐसा दुर्लभ और हैरतअंगेज नजारा देखने को मिल रहा है, जिसने आम राहगीरों से लेकर ट्रैफिक पुलिस और नेशनल हाईवे अथॉरिटी तक सभी को चकित कर दिया है। 308 पहियों पर सवार दो सौ टन से भी ज्यादा वजनी एक भीमकाय औद्योगिक मशीन जब सड़क पर निकली, तो देखने वालों का तांता लग गया। दोहरे भारी-भरकम इंजनों की ताकत से खिंचने वाला यह महाकाय ट्रेलर जब आगे बढ़ा, तो रास्ते में बने सामान्य बुनियादी ढांचे इसके आकार के सामने छोटे पड़ गए। आठ मीटर ऊंची और सात मीटर चौड़ी इस मशीन को अपने गंतव्य तक पहुंचाना किसी बड़े इंजीनियरिंग ऑपरेशन से कम साबित नहीं हो रहा है।
सड़क परिवहन के इतिहास में ऐसे दृश्य बेहद कम देखने को मिलते हैं जहां किसी एक वाहन को निकालने के लिए पूरे हाईवे के बुनियादी ढांचे में तात्कालिक फेरबदल करने पड़ें। हाईवे पर बने ओवरब्रिज की सीमित ऊंचाई के चलते इस महाबली वाहन के पहिए थम गए। इसके बाद सड़क पर मौजूद तकनीकी विशेषज्ञों और प्रशासनिक अमले को इसे आगे बढ़ाने के लिए एक बिल्कुल नया बाईपास मार्ग तलाशना और तैयार करना पड़ा।
बेल्जियम से समंदर पार कर भारत पहुंची यह महाकाय मशीन
यह पूरा मामला एक बेहद महत्वपूर्ण औद्योगिक परियोजना से जुड़ा हुआ है। यूरोपीय देश बेल्जियम में तैयार किया गया यह भारी-भरकम 'शुगर मिल वेसल' यानी वैक्यूम बॉयलर अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग से होते हुए ओडिशा के पारादीप बंदरगाह पर उतारा गया था। वहां से इसे सड़क मार्ग के जरिए उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में निर्माणाधीन अत्याधुनिक और एशिया के सबसे विशाल चीनी व एथेनॉल संयंत्रों में से एक में स्थापित करने के लिए रवाना किया गया।
आमतौर पर इतने भारी और विशालकाय ढांचों को 'ओवर डायमेंशनल कार्गो' (ओडीसी) श्रेणी में रखा जाता है। रेलवे के नेटवर्क में सुरंगों, ओवरहेड बिजली तारों और घुमावदार मोड़ों की वजह से ऐसे कार्गो को मालगाड़ी से ले जाना नामुमकिन होता है। लिहाजा, समंदर से जमीनी मंजिल तक पहुंचाने के लिए सिर्फ सड़क मार्ग का ही विकल्प बचता है। ओडिशा से चलकर झारखंड और बिहार की सीमाओं को पार करते हुए जैसे ही यह विशाल काफिला उत्तर प्रदेश की सीमा में दाखिल हुआ, तकनीकी बाधाओं ने रास्ता रोक लिया।
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हाइवे पर जब पुल बना रुकावट: 8 मीटर ऊंची मशीन के लिए बदला गया रूट
जब यह 308 पहियों वाला ट्रेलर राष्ट्रीय राजमार्ग-19 पर आगे बढ़ रहा था, तभी पचफेड़वा के पास बने रिंग रोड के फ्लाईओवर ने इसकी राह रोक दी। इस विशाल मशीन की ऊंचाई करीब आठ मीटर यानी लगभग 26 फीट है। सामान्य तौर पर भारतीय राजमार्गों पर बनने वाले ओवरब्रिज और फ्लाईओवर की क्लियरेंस ऊंचाई साढ़े पांच से छह मीटर के आसपास रखी जाती है। ऐसे में आठ मीटर ऊंची मशीन को पुल के नीचे से निकालना तकनीकी रूप से पूरी तरह असंभव था।
पुल से टकराने के खतरे को देखते हुए ट्रेलर चालकों और तकनीकी टीम ने फौरन ब्रेक लगा दिए। शनिवार को दिनभर विशेषज्ञों की टीम मौके पर नक्शा और सड़क का जायजा लेकर यह रणनीति बनाती रही कि इस अवरोध को कैसे पार किया जाए। काफी माथापच्ची के बाद तय हुआ कि ट्रेलर को मुख्य लेन के पुल के नीचे से ले जाने के बजाय रिंग रोड के ऊपरी हिस्से पर चढ़ाया जाएगा और फिर आगे जाकर वापस मुख्य हाईवे पर उतारा जाएगा। इस तरह एक समानांतर डायवर्जन तैयार कर इस गतिरोध को खत्म करने की योजना पर अमल शुरू हुआ।
"अत्यधिक भारी और ऊंचे कार्गो की ढुलाई में सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता होती है। पुलों की सीमित ऊंचाई और बिजली की तारों को देखते हुए मार्ग का हर मीटर पहले से जांचा जाता है। जहां बाधा आती है, वहां सुरक्षित डायवर्जन तैयार किया जाता है।" — राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के तकनीकी अधिकारी
क्रेन से हटाए गए बोर्ड, उखाड़े गए डिवाइडर: ऐसे बना नया गलियारा
इस महाकाय ट्रेलर का सफर इतना सीधा नहीं था। चौड़ाई सात मीटर होने की वजह से सड़क की दोनों पटरियों पर लगा हर खंभा और बोर्ड इस मशीन के लिए खतरा बन रहा था। सीमावर्ती इलाके से लेकर आगे के कई किलोमीटर तक नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई), परिवहन विभाग और स्थानीय पुलिस प्रशासन के संयुक्त दल को मोर्चा संभालना पड़ा। रास्ते में पड़ने वाले बड़े-बड़े लोहे के सरकारी साइनबोर्ड, टोल प्लाजा के ढांचे और खनन व वाणिज्य कर विभाग के एंट्री गेटों को तीन भारी क्रेनों की मदद से काटकर या उठाकर हटाया गया।
इसके अलावा हाईवे के डिवाइडरों के कुछ हिस्सों को भी अस्थायी तौर पर तोड़ा गया ताकि 308 पहियों वाला यह विशाल वाहन आसानी से मुड़ सके। इलाके में लगातार हो रही मानसूनी बारिश ने भी राहत और निर्माण कार्य में खासी अड़चनें पैदा कीं। बारिश के कारण कच्ची जमीन दलदल में तब्दील हो रही थी, जिससे 200 टन के वजन के धंसने का खतरा था। तकनीकी दल ने कंक्रीट और भारी पत्थरों की मदद से रातों-रात अस्थायी रैंप और मजबूत रास्ता तैयार किया।
308 पहियों और डबल इंजन की इंजीनियरिंग का अजूबा
सड़क से गुजरने वाले हर व्यक्ति के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर किसी एक ट्रक में 308 पहियों की क्या जरूरत होती है? ऑटोमोबाइल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग के जानकारों के अनुसार, यह कोई सामान्य ट्रक नहीं बल्कि 'हाइड्रोलिक एक्सल मॉड्यूलर ट्रेलर' होता है। इसमें एक साथ दर्जनों एक्सल जुड़े होते हैं और हर एक्सल पर चार से आठ पहिए लगे होते हैं।
भौतिक विज्ञान के नियम के मुताबिक, यदि 200 टन का वजन सामान्य 16 या 22 पहियों वाले ट्रक पर लाद दिया जाए, तो सड़क की डामर पूरी तरह धंस जाएगी और पुल टूट सकते हैं। 308 पहिए होने से 200 टन का भार जमीन पर पूरी तरह समान रूप से बंट जाता है, जिससे सड़क की सतह पर प्रति वर्ग इंच का दबाव बहुत कम हो जाता है। इस ट्रेलर के हर पहिए को कंप्यूटर और रिमोट कंट्रोल की मदद से अलग-अलग कोणों पर मोड़ा जा सकता है, ताकि संकरे मोड़ों पर भी यह दैत्याकार वाहन आसानी से घूम सके। इसे खींचने के लिए आगे और पीछे दो बेहद शक्तिशाली प्राइम मूवर (इंजन) लगाए गए हैं।
सैकड़ों किलोमीटर का सफर और औद्योगिक विकास का नया पहिया
यह बॉयलर मशीन महज एक उपकरण नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के कृषि और औद्योगिक परिदृश्य के लिए एक मील का पत्थर है। लखीमपुर खीरी में बलरामपुर चीनी मिल्स समूह द्वारा स्थापित किए जा रहे नए मेगा प्लांट में यह मशीन लगाई जाएगी। इस संयंत्र के चालू होने से न केवल गन्ने के रस से रिकॉर्ड मात्रा में चीनी का उत्पादन होगा, बल्कि भारी मात्रा में हरित ईंधन यानी एथेनॉल भी तैयार किया जा सकेगा। यह प्लांट इलाके के हजारों किसानों और युवाओं के लिए आर्थिक तरक्की के नए द्वार खोलेगा।
यही वजह है कि इस भारी-भरकम मशीन को सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाने के लिए पूरा प्रशासनिक तंत्र दिन-रात एक किए हुए है। हालांकि इस लंबे सफर में रफ्तार चींटी की चाल जैसी है—यह ट्रेलर दिन में औसतन 15 से 20 किलोमीटर का ही सफर तय कर पाता है। जहां भी यह पहुंचता है, लोग मोबाइल कैमरे निकालकर इस आधुनिक इंजीनियरिंग के चमत्कार को कैद करने लगते हैं। सभी बाधाओं को पार करते हुए उम्मीद जताई जा रही है कि अगले कुछ हफ्तों के भीतर यह विशाल बॉयलर अपनी मंजिल पर सुरक्षित पहुंच जाएगा।






