उत्तर प्रदेश की सियासत में गरमाया पारा: ओवैसी के अल्टीमेटम पर सपा का कड़ा रुख
उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों का सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है। राजनीतिक दलों के बीच सीटों के तालमेल और गठबंधन को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। इसी कड़ी में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमिन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और समाजवादी पार्टी (SP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव आमने-सामने नजर आ रहे हैं। अखिलेश यादव ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी आगामी चुनाव में किसी नए सियासी प्रयोग के मूड में नहीं है और पुराना गठबंधन ही मैदान में उतरेगा।
राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर थी कि क्या असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के मुख्य विपक्षी गठबंधन में जगह मिलेगी या नहीं। ओवैसी ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वे एक तय समय सीमा तक समाजवादी पार्टी के सकारात्मक जवाब का इंतजार कर रहे हैं। समय सीमा समाप्त होने के बाद जब सपा की तरफ से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई, तो सियासी सरगर्मी और अधिक बढ़ गई।
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महाभारत और पांच गांवों का जिक्र: ओवैसी की तीखी चेतावनी
अखिलेश यादव द्वारा गठबंधन का प्रस्ताव ठुकराए जाने के बाद असदुद्दीन ओवैसी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी पार्टी ने तो केवल पांच सीटों की मांग की थी, लेकिन यदि इसके लिए भी सपा तैयार नहीं है तो आने वाले दिनों में सियासी महाभारत होना तय है। ओवैसी ने यह भी कहा कि समाजवादी पार्टी को पड़ोसी राज्य बिहार के चुनावी नतीजों का गंभीरता से विश्लेषण करना चाहिए।
असदुद्दीन ओवैसी का तर्क था कि जो राजनीतिक गलतियां पिछले चुनावों में अन्य दलों द्वारा दोहराई गईं, वही भूलें उत्तर प्रदेश में भी दोहराई जा रही हैं। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि छोटे दलों और क्षेत्रीय ताकतों को नजरअंदाज किया गया, तो इसका खामियाजा विपक्षी खेमे को भुगतना पड़ सकता है। हालांकि, इन बयानों के बावजूद सपा नेतृत्व अपने फैसले पर पूरी तरह अडिग नजर आया और उसने ओवैसी की चेतावनियों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी।
अखिलेश यादव का दो टूक जवाब: लोकसभा वाला गठबंधन ही रहेगा बरकरार
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि अब नए राजनीतिक गठजोड़ की कोई गुंजाइश नहीं बची है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो राजनीतिक गठबंधन पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान बना था और जिसने धरातल पर सकारात्मक परिणाम दिए थे, वही व्यवस्था आगामी विधानसभा चुनावों में भी जारी रहेगी।
"जो लोग भारतीय जनता पार्टी को हराना चाहते हैं और देश के संविधान व लोकतंत्र की रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाना चाहिए जिससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्ताधारी दल को फायदा पहुंचे। हमारा गठबंधन पूरी तरह मजबूत है और हम उसी के साथ जनता के बीच जाएंगे।" — अखिलेश यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी
पार्टी सूत्रों के अनुसार, सपा इस बार उत्तर प्रदेश की एक बड़ी संख्या यानी लगभग 350 सीटों पर खुद चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। इसके साथ ही, कांग्रेस पार्टी के साथ सीटों के बंटवारे को लेकर भी अंदरखाने बातचीत चल रही है, जहां कांग्रेस अधिक सीटों की मांग कर रही है, वहीं सपा अपने पुराने प्रभाव वाले समीकरणों के हिसाब से ही सीटें तय करना चाहती है।
राज्यसभा चुनाव के समीकरण और पुराने साथियों को खुला निमंत्रण
एक तरफ जहां अखिलेश यादव ने AIMIM के साथ किसी भी समझौते की संभावना को खारिज कर दिया, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने उन पुराने नेताओं को एक बार फिर साथ आने का खुला ऑफर दे दिया है, जो पिछले कुछ वर्षों में समाजवादी पार्टी का साथ छोड़कर अन्य दलों के साथ चले गए थे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह रणनीति मुख्य रूप से आगामी राज्यसभा चुनावों को ध्यान में रखकर बनाई गई है।
सपा प्रमुख ने कहा कि यदि कोई पुराना साथी अब दोबारा पार्टी के साथ मिलकर चलना चाहता है, तो वे पुरानी कड़वी बातों को भुलाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उनका इशारा मुख्य रूप से निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) जैसे दलों के नेताओं की तरफ था, जो कभी सपा के साथ हुआ करते थे। राज्यसभा चुनाव में अपने उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए सपा को अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत है, जिसके चलते इस प्रकार के सियासी समीकरण साधे जा रहे हैं।
क्षेत्रीय दलों और सहयोगियों की प्रतिक्रिया: सियासत में जुबानी जंग जारी
अखिलेश यादव की तरफ से पुराने साथियों को दिए गए इस खुला ऑफर पर विपक्षी खेमे की तरफ से भी तुरंत तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने इस प्रस्ताव को एक सोची-समझी चाल करार देते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश का हर राजनीतिक दल और विधायक समाजवादी पार्टी की कार्यशैली और रणनीतियों को भली-भांति समझता है, इसलिए उनके इस बुलावे का कोई असर पड़ने वाला नहीं है।
इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर भी नेताओं के बीच बयानबाजी का दौर जारी है। कानपुर कैंट से समाजवादी पार्टी के विधायक हसन रूमी ने भी AIMIM के चुनावी मैदान में उतरने के दावों पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी पार्टियां केवल उन क्षेत्रों में सक्रियता दिखाती हैं जहां विशेष मतदाताओं की संख्या अधिक होती है, जबकि धरातल पर उनका कोई जनआधार नहीं होता। कुल मिलाकर, साल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ही उत्तर प्रदेश का सियासी रण बेहद दिलचस्प और संघर्षपूर्ण होता नजर आ रहा है।








