मुंबई: बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार की बहन अलका भाटिया हीरानंदानी से जुड़े एक हाई-प्रोफाइल प्रॉपर्टी धोखाधड़ी और जालसाजी मामले में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के नेता गणेश चुक्कल को अदालत से बड़ी राहत मिली है। मुंबई की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने चुक्कल को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया, यह देखते हुए कि जांच एजेंसी ने कानूनी प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन किया और आरोपी को अवैध रूप से हिरासत में रखा। यह फैसला जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन पर जोर देता है।
पूरा मामला क्या है?
यह मामला मुंबई के पवई स्थित हीरानंदानी एस्टेट्स में एक आवासीय फ्लैट से जुड़ा है। इस प्रॉपर्टी को लेकर धोखाधड़ी और जालसाजी की एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी, जिसमें मेलरोनिया हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी शामिल थी। इस कंपनी के निदेशकों में बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार की बहन अलका भाटिया हीरानंदानी, कमल निरंजन हीरानंदानी और श्रीधर नारायण शामिल हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए, पवई पुलिस ने MNS नेता गणेश चुक्कल और उनके सहयोगी समीर सावंत को गिरफ्तार किया था। यह विवादित प्रॉपर्टी करोड़ों रुपये की बताई जा रही है, जिस पर कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के जरिए कब्जा करने का प्रयास किया गया था।
गिरफ्तारी से रिहाई तक का सफर: कानूनी प्रक्रियाओं में चूक
MNS नेता गणेश चुक्कल को 2 अक्टूबर, 2023 को गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद, उन्हें शुरू में 5 अक्टूबर तक पुलिस हिरासत में भेजा गया। इसके बाद, आरोपी को दोबारा अंधेरी की 66वीं मजिस्ट्रेट अदालत में पेश किया गया, जिसने उनकी पुलिस हिरासत को 9 अक्टूबर तक बढ़ा दिया।
इसी बीच, 5 अक्टूबर को शिकायतकर्ता की ओर से बॉम्बे हाई कोर्ट में दाखिल एक याचिका पर सुनवाई हुई। इस सुनवाई के दौरान, अभियोजन पक्ष ने उच्च न्यायालय को सूचित किया कि मामले की जांच पवई पुलिस स्टेशन से मुंबई क्राइम ब्रांच की DCB CID यूनिट-10 को सौंप दी गई है।
इसके बाद, 6 अक्टूबर को शाम 4 बजकर 42 मिनट पर क्राइम ब्रांच ने गणेश चुक्कल को अपनी हिरासत में ले लिया। हालांकि, यहीं से कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन की शुरुआत हुई। क्राइम ब्रांच ने अगले तीन दिनों तक आरोपी को किसी सक्षम अदालत के सामने पेश नहीं किया। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 47 और 48 के तहत, किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य होता है, ताकि उसकी हिरासत की वैधानिकता सुनिश्चित की जा सके और उसे अवैध हिरासत से बचाया जा सके।
7 अक्टूबर को, क्राइम ब्रांच ने अंधेरी की 66वीं अदालत को पत्र लिखकर बताया कि आरोपी को 9 अक्टूबर को एस्प्लेनेड कोर्ट में पेश किया जाएगा। अंततः, 9 अक्टूबर को गणेश चुक्कल को एस्प्लेनेड की 37वीं अदालत में पेश किया गया।
अदालत में दलीलें और फैसला
गणेश चुक्कल की ओर से पेश वकील राजेंद्र शिरोडकर, अर्चित सखलकर, लक्ष्मण शाहपुर और निहार घाग ने अदालत में जोरदार दलीलें दीं। उन्होंने तर्क दिया कि जब कोई जांच एजेंसी किसी मामले की जांच अपने हाथ में लेती है, तो आरोपी को सक्षम अदालत के सामने पेश करना और आगे की हिरासत के लिए अनुमति लेना कानूनी रूप से आवश्यक होता है। वकीलों ने जोर देकर कहा कि इस मामले में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और क्राइम ब्रांच द्वारा चुक्कल की हिरासत को अवैध ठहराया। उन्होंने उच्च अदालतों के कई फैसलों का हवाला देते हुए चुक्कल की तत्काल रिहाई की मांग की।
सुनवाई के दौरान, जांच एजेंसी ने अदालत से जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। इसके बाद, सोमवार को जांच अधिकारी ने हलफनामा दाखिल किया। हालांकि, अदालत को हलफनामे में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला, जिससे आरोपी के वकीलों की दलीलों को खारिज किया जा सके या क्राइम ब्रांच की चूक को सही ठहराया जा सके।
एस्प्लेनेड की 37वीं अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि आरोपी को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर संबंधित अदालत के सामने पेश किया जाना चाहिए था। अदालत ने पाया कि गिरफ्तारी के बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 47 और 48 के प्रावधानों का सरासर उल्लंघन किया गया। इन गंभीर कानूनी चूकों के आधार पर, अदालत ने गणेश चुक्कल को एक लाख रुपये के निजी मुचलके (PR Bond) पर रिहा करने का आदेश दिया। यह फैसला जांच एजेंसियों के लिए एक कड़ा संदेश है कि उन्हें कानूनी प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन करना चाहिए और किसी भी नागरिक को अवैध रूप से हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
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