बैंकिंग सेक्टर में उबाल: लंबित मांगों को लेकर मुखर हुए कर्मचारी
देश की आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले बैंकिंग सेक्टर में इन दिनों भारी हलचल देखने को मिल रही है। कर्मचारी और अधिकारी वर्ग अपनी लंबे समय से लंबित पड़ी मांगों को लेकर एक बार फिर सड़क पर उतर आए हैं। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन (UFBU) के आह्वान पर देश भर के विभिन्न सार्वजनिक और निजी बैंकों के कर्मी लामबंद हो गए हैं। हाल ही में हुए एक बड़े विरोध प्रदर्शन के दौरान कर्मचारियों ने अपनी एकजुटता का परिचय देते हुए प्रबंधन और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि उनकी अनदेखी अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इस विरोध प्रदर्शन में विभिन्न राष्ट्रीयकृत बैंकों जैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, यूनियन बैंक, केनरा बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा के हजारों कर्मचारी और अधिकारी शामिल हुए। संध्या के समय आयोजित इस धरने में वक्ताओं ने सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए और बैंकिंग सुधारों के नाम पर कर्मचारियों पर बढ़ते मानसिक दबाव का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। सभा स्थल पर पहुंचे बैंक कर्मियों के हाथों में तख्तियां थीं जिन पर उनकी मुख्य मांगें लिखी हुई थीं।
संगठन से जुड़े वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि बैंकिंग उद्योग देश की वित्तीय स्थिरता की धुरी है, लेकिन इस सेक्टर को संभालने वाले कर्मचारियों की मूल समस्याओं पर लंबे समय से पर्दा डाला जा रहा है। कार्य के भारी बोझ और अनिश्चित कामकाजी घंटों के कारण कर्मचारियों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। यही वजह है कि अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया गया है।
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पांच दिवसीय बैंकिंग की मांग पर अड़े कर्मचारी, सप्ताह में दो अवकाश की पुरजोर वकालत
बैंक कर्मचारियों की सूची में सबसे ऊपर पांच दिवसीय बैंकिंग (Five Day Banking) को लागू करने की मांग बनी हुई है। आधुनिक युग में लगभग सभी प्राइवेट कॉर्पोरेट सेक्टर और सरकारी विभागों में पांच दिन का कार्य सप्ताह और दो दिन का अवकाश नियम लागू है, लेकिन बैंकिंग सेक्टर आज भी शनिवार और रविवार के संशय में उलझा हुआ है। बैंक कर्मियों का तर्क है कि डिजिटल बैंकिंग और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के इस दौर में ग्राहकों को तमाम सुविधाएं पहले से ही चौबीसों घंटे मिल रही हैं, ऐसे में भौतिक शाखाओं के संचालन के लिए भी कार्य दिवसों का पुनर्गठन होना चाहिए।
धरना प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि दुनिया भर के विकसित देशों और खुद रिजर्व बैंक के कई अनुषांगिक विभागों में पांच दिवसीय कार्य संस्कृति सफलतापूर्वक चल रही है। इसके बावजूद कमर्शियल बैंकों में हर महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को ही छुट्टी का नियम है, जबकि पहला, तीसरा और पांचवां शनिवार कार्य दिवस रहता है। इससे कर्मचारियों को निजी और पारिवारिक जीवन के संतुलन में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
यूनियन के नेताओं ने सरकार और इंडियन बैंक एसोसिएशन (IBA) को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि इस मांग पर सैद्धांतिक सहमति बनने के बावजूद अभी तक इसे औपचारिक रूप से लागू नहीं किया गया है। कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि इस मामले में जल्द ही कोई सकारात्मक अधिसूचना जारी नहीं की जाती है, तो देशव्यापी हड़ताल का रास्ता अपनाने से भी पीछे नहीं हटेगा।
वेतन संशोधन और अनुकंपा नियुक्तियों के मुद्दों पर भी उठाई गई मुखर आवाज
केवल पांच दिवसीय कार्य सप्ताह ही नहीं, बल्कि कर्मचारियों के वेतनमान में सुधार और लंबित भत्तों का भुगतान भी इस प्रदर्शन का एक प्रमुख एजेंडा रहा। वक्ताओं ने संबोधित करते हुए कहा कि बढ़ती महंगाई के इस दौर में बैंक कर्मियों के वेतन ढांचे में उस अनुपात में संशोधन नहीं हो रहा है, जितनी बैंक की उत्पादकता और लाभ में बढ़ोतरी हुई है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कर्मचारी भारी दबाव और सीमित संसाधनों में देश की आर्थिक योजनाओं को आम जनता तक पहुंचाते हैं, लेकिन इसके एवज में मिलने वाले लाभ न्यायसंगत नहीं हैं।
इसके अतिरिक्त, अनुकंपा के आधार पर नौकरी (Compassionate Grounds Appointment) के नियमों को और अधिक मानवीय और सरल बनाने की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई। सेवाकाल के दौरान असामयिक मृत्यु का शिकार होने वाले बैंक कर्मियों के आश्रित परिवारों को आज भी नियमों की जटिलताओं के कारण दर-दर भटकना पड़ता है। यूनियनों की मांग है कि इन जटिल प्रावधानों को तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जाए ताकि पीड़ित परिवार को आर्थिक संबल मिल सके।
बैठक में मौजूद विभिन्न बैंकों के प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा कि बैंक प्रबंधन और वित्त मंत्रालय को कर्मचारियों की इन जायज मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए। यदि समय रहते इन मुद्दों का समाधान नहीं निकाला गया, तो यह असंतोष एक बड़े राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित प्रशासनों की होगी।
काम के बढ़ते दबाव और वर्क-लाइफ बैलेंस पर गंभीर चिंता
आज के डिजिटल युग में बैंकों पर काम का बोझ कई गुना बढ़ गया है। सरकार की तमाम वित्तीय समावेशन योजनाएं जैसे जनधन खाते, मुद्रा लोन, बीमा योजनाएं और विभिन्न ऋण वितरण कार्यक्रमों को धरातल पर उतारने की मुख्य जिम्मेदारी बैंक कर्मियों पर ही होती है। कर्मचारियों का कहना है कि स्टाफ की भारी कमी के कारण एक ही व्यक्ति को कई जिम्मेदारियां उठानी पड़ रही हैं, जिससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।
वक्ताओं ने मंच से दो टूक शब्दों में कहा कि बैंक कर्मचारियों को रोबोट नहीं समझा जाना चाहिए। उनकी भी व्यक्तिगत और सामाजिक जरूरतें होती हैं। कार्यस्थल पर अत्यधिक दबाव के कारण कर्मचारियों में तनाव, उच्च रक्तचाप और अन्य बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। सरकार को चाहिए कि वह खाली पड़े पदों पर तत्काल नई भर्तियों की प्रक्रिया शुरू करे ताकि मौजूदा कर्मचारियों पर से कार्यभार कुछ कम हो सके।
"बैंक कर्मी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन आज वे ही खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। पांच दिवसीय बैंकिंग और लंबित वेतन समझौतों को तुरंत लागू नहीं किया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।" — विष्णु गुप्ता, बैंक यूनियन नेता
निष्कर्ष और आगे की संभावित रणनीतियां
बैंक कर्मियों का यह प्रदर्शन इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आने वाले दिनों में बैंकिंग सेक्टर में टकराव बढ़ सकता है। यदि इंडियन बैंक एसोसिएशन और सरकार समय रहते इन यूनियनों के साथ सार्थक बातचीत कर किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंचते हैं, तो आम जनता को भी बैंकिंग सेवाओं में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। कर्मचारियों की यह एकजुटता बताती है कि अब वे अपनी मांगों को लेकर किसी भी प्रकार के टालमटोल के मूड में नहीं हैं। आने वाले हफ्तों में इस आंदोलन को लेकर कुछ और बड़े फैसले लिए जा सकते हैं, जिन पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहेंगी।







