बिहार में सामाजिक सरोकार की अनूठी मिसाल, गांवों से लेकर शहरों तक गूंजा सेवा का संकल्प
देश के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण राज्यों में शुमार बिहार की धरती पर इन दिनों समाज सुधार की एक नई बयार बह रही है। ग्रामीण अंचलों में फैली कुरीतियों और नशाखोरी जैसी गंभीर समस्याओं के खिलाफ अब स्थानीय लोगों के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी खुलकर मैदान में उतर आए हैं। इसी कड़ी में शाहाबाद क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में एक व्यापक सामाजिक अभियान की शुरुआत की गई है, जिसका मुख्य उद्देश्य युवाओं को गलत राह से बचाना और पर्यावरण संतुलन को मजबूत करना है। इस पहल के तहत आयोजित कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में आम नागरिकों, युवाओं और पार्टी कार्यकर्ताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और समाज को बेहतर बनाने का संकल्प लिया।
जानकारों का मानना है कि जब तक जमीनी स्तर पर जनमानस को जागरूक नहीं किया जाएगा, तब तक किसी भी बड़े बदलाव की कल्पना नहीं की जा सकती। यही कारण है कि इस अभियान को केवल राजनीतिक कार्यक्रमों तक सीमित न रखकर इसे पूरी तरह से लोक-कल्याणकारी स्वरूप दिया गया है। गांव-गांव जाकर लोगों को यह समझाया जा रहा है कि नशा न केवल व्यक्ति के शरीर और मन को खोखला करता है, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को भी तबाह कर देता है। इस तरह के जागरूकता अभियानों से समाज में एक सकारात्मक संदेश जा रहा है और लोग स्वेच्छा से इन बुराइयों से तौबा करने के लिए आगे आ रहे हैं।
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नशामुक्ति के खिलाफ फूंकुल हुंकार, युवाओं को दिलाई गई संकल्प की शपथ
इस वृहद अभियान का सबसे मुख्य आकर्षण ग्रामीण इलाकों में चलाया गया नशामुक्ति अभियान रहा। संदेश उत्तरी मंडल के पिछिआंव गांव में आयोजित एक विशेष जनसभा के दौरान वक्ताओं ने युवाओं को नशे से होने वाले भयंकर दुष्परिणामों के बारे में विस्तार से बताया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे स्थानीय पदाधिकारियों ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी देश का भविष्य है और यदि युवा ही नशे के दलदल में फंस जाएंगे, तो देश और समाज का विकास पूरी तरह से रुक जाएगा।
इस मौके पर उपस्थित सैकड़ों युवाओं और बुजुर्गों ने एक स्वर में यह शपथ ली कि वे जीवन में कभी भी किसी प्रकार के नशे का सेवन नहीं करेंगे और अपने आस-पास के लोगों को भी इसके प्रति जागरूक करेंगे। स्थानीय लोगों का कहना है कि गांवों में बढ़ते नशे के चलन पर लगाम लगाने के लिए इस तरह के आयोजनों की बहुत अधिक आवश्यकता थी। वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि प्रशासनिक सख्ती के साथ-साथ जब तक सामाजिक और नैतिक दबाव नहीं बनेगा, तब तक इस समस्या का पूरी तरह से खात्मा नहीं किया जा सकता है।
पर्यावरण संरक्षण को मिला नया आयाम, 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान के तहत रोपे गए पौधे
केवल मानव समाज ही नहीं, बल्कि प्रकृति और पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने के लिए भी इस अभियान के दौरान विशेष प्रयास किए गए। बढ़ते प्रदूषण और घटते हरित आवरण को लेकर चिंता जताते हुए उदवंतनगर मंडल के बेलाउर सूर्य मंदिर परिसर और धरना रिजॉर्ट के बाहरी हिस्सों में बड़े पैमाने पर पौधरोपण किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान से प्रेरणा लेते हुए यहां के जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं ने धरती को हरा-भरा बनाने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम में शामिल हुए वरिष्ठ नेताओं और पर्यावरण प्रेमियों ने न केवल पौधे लगाए, बल्कि उनकी नियमित देखभाल करने की भी शपथ ली। उन्होंने उपस्थित लोगों को समझाया कि पेड़ हमारे जीवन के आधार हैं और इनके बिना शुद्ध हवा की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
"पेड़ लगाना और उनकी रक्षा करना आज के समय में किसी धार्मिक कार्य से कम नहीं है। हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ और स्वच्छ पर्यावरण सौंपना है, जिसके लिए हर नागरिक को कम से कम एक पौधा जरूर लगाना चाहिए और उसकी परवरिश करनी चाहिए।" — स्थानीय जनप्रतिनिधि
पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि इसी प्रकार हर गांव और शहर में पौधे लगाने का सिलसिला जन-आंदोलन का रूप ले ले, तो जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से काफी हद तक निपटा जा सकता है। इस पहल ने स्थानीय युवाओं में प्रकृति के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी की भावना को और अधिक मजबूत किया है।
नेत्रहीन बच्चों के जीवन में बिखरी खुशियां, बांटी गई पठन-सामग्री और संगीत के उपकरण
इस सामाजिक अभियान का एक और बेहद प्रेरणादायक पहलू आरा के धनपुरा स्थित नेत्रहीन विद्यालय में देखने को मिला। यहां आयोजित विशेष सेवा कार्यक्रम के दौरान समाज के इन विशेष बच्चों के साथ वक्त बिताया गया और उन्हें आवश्यक पठन-पाठन सामग्री वितरित की गई। इन बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने के उद्देश्य से उन्हें संगीत के प्रति उनकी रुचि को ध्यान में रखते हुए हारमोनियम जैसे वाद्य यंत्र भी भेंट किए गए।
विद्यालय के बच्चों ने भी अतिथियों का स्वागत अपनी कला और उत्साह के साथ किया। आयोजकों का मानना है कि समाज के हर वर्ग, विशेषकर दिव्यांग और जरूरतमंद बच्चों तक खुशियां पहुंचाना ही असली मानवता है। इस प्रकार के आयोजनों से इन बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है और उन्हें यह अहसास होता है कि वे समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। स्थानीय नागरिकों ने इस संवेदनशील पहल की भूरी-भूरी प्रशंसा की है और उम्मीद जताई है कि भविष्य में भी इस प्रकार के सामाजिक सरोकार के कार्य निरंतर जारी रहेंगे।



