उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले विपक्षी खेमे में सियासी खींचतान
उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक दलों की गोटी अभी से बैठनी शुरू हो गई है। राज्य के सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि मुख्य विपक्षी दल यानी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीटों के तालमेल को लेकर अंदरखाने बड़ी रस्साकशी चल रही है। कांग्रेस अब सूबे की राजनीति में 'छोटे भाई' की पुरानी भूमिका से बाहर निकलने का मन बना चुकी है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व राज्य में अपनी जमीन को मजबूत करने के लिए आक्रामक रुख अपना रहा है, जिससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि आगामी चुनाव में सीटों का समीकरण काफी दिलचस्प होने वाला है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य के बाद कांग्रेस अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाने के लिए पूरी तरह बेताब है। पार्टी के रणनीतिकार यह अच्छी तरह समझ चुके हैं कि अगर उत्तर प्रदेश में खुद को फिर से मुख्यधारा की ताकत बनाना है, तो केवल पारंपरिक दांव-पेच से काम नहीं चलेगा। इसके लिए एक बड़े और आक्रामक विजन के साथ मैदान में उतरना होगा, जिसकी शुरुआत सीटों की बड़ी मांग और मजबूत गठजोड़ के जरिए की जा रही है।
संबंधित खबरें
कांग्रेस की बड़ी मांग: 200 सीटों पर अड़ी पार्टी
सामने आ रही रिपोर्टों के मुताबिक, कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों में से सीधे तौर पर 200 सीटों की मांग रखी है। पार्टी के भीतर यह आम राय बनती दिख रही है कि अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ यदि गठबंधन होता है, तो कांग्रेस केवल चंद सीटों पर सिमटकर नहीं रहना चाहती। पार्टी के प्रदेश प्रभारी से लेकर कई वरिष्ठ नेता इस बात पर जोर दे रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी को अपनी सांगठनिक ताकत के हिसाब से सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।
दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी इस बड़े दावे को लेकर असहज नजर आ रही है। सपा नेताओं का तर्क है कि राज्य के कई इलाकों में उनका जमीनी संगठन और विधायकों की संख्या मजबूत है, ऐसे में कांग्रेस को उसकी वास्तविक धरातल स्थिति को ध्यान में रखकर ही सीटों का बंटवारा स्वीकार करना चाहिए। इसके बावजूद, कांग्रेस नेतृत्व अपनी रणनीति पर अडिग नजर आ रहा है और आने वाले दिनों में सीट शेयरिंग के लिए एक विशेष समिति के गठन की भी तैयारी की जा रही है, जो सभी पहलुओं पर गहराई से विचार करेगी.
बीजेपी की तर्ज पर छोटे दलों को साथ जोड़ने की रणनीति
कांग्रेस पार्टी केवल अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी योजना इन सीटों के जरिए राज्य के कई छोटे और क्षेत्रीय दलों को अपने पाले में लाने की है। ठीक वैसी ही सोशल इंजीनियरिंग, जैसी रणनीति अपनाकर भारतीय जनता पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनावों में बंपर सफलता हासिल की थी। बीजेपी ने गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और दलित समुदायों के छोटे-छोटे क्षत्रपों को अपने साथ जोड़कर एक अजेय सामाजिक गठबंधन तैयार किया था।
कांग्रेस भी इसी फॉर्मूले को उत्तर प्रदेश में आजमाने की फिराक में है। पार्टी का मानना है कि राज्य के विभिन्न सामाजिक समूहों और जातियों को अलग-अलग साधने के बजाय यदि एक व्यापक गठबंधन के तहत टिकट बांटे जाएं, तो चुनावी नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं। इसी उद्देश्य के तहत कांग्रेस उन दलों से लगातार बातचीत कर रही है जो सपा के साथ तालमेल में फिट नहीं बैठ पा रहे हैं या फिर अपनी अलग राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं।
स्वामी प्रसाद मौर्य और निषाद पार्टी के संपर्कों से तेज हुई हलचल
इस सियासी खेल में सबसे ताजा घटनाक्रम स्वामी प्रसाद मौर्य और अन्य छोटे दलों के साथ कांग्रेस की बढ़ती नजदीकियों को लेकर है। हाल ही में स्वामी प्रसाद मौर्य ने दिल्ली पहुंचकर कांग्रेस के शीर्ष नेताओं राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से मुलाकात की थी, जिसके बाद से राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म है। मौर्य गुट के अलावा कुछ अन्य क्षेत्रीय ताकतें भी कांग्रेस के संपर्क में बताई जा रही हैं, जो चुनाव से पहले अपने लिए एक सुरक्षित राजनीतिक ठिकाना तलाश रही हैं।
निषाद पार्टी जैसे दल, जो पहले एनडीए गठबंधन का हिस्सा रहे हैं और जिनका खास जातियों पर अच्छा खासा प्रभाव माना जाता है, उनकी गतिविधियों पर भी सभी की नजरें टिकी हुई हैं। जानकारों का कहना है कि यदि कांग्रेस इन छोटे दलों को अपने पाले में लाने में कामयाब हो जाती है, तो वह समाजवादी पार्टी के साथ होने वाली सीट शेयरिंग की बातचीत में अपनी स्थिति काफी मजबूत कर लेगी।
"राजनीति संभावनाओं का खेल है और उत्तर प्रदेश में हर दल अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने के लिए नए समीकरण तलाश रहा है। कांग्रेस यदि छोटे दलों को साधने में कामयाब होती है, तो आगामी चुनाव का ऊँट किस करवट बैठेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।"— राजनीतिक विश्लेषक
निष्कर्ष और आगे की सियासी राह
आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही उत्तर प्रदेश का राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। एक तरफ जहां अखिलेश यादव अपनी पार्टी की पुरानी ताकत को सहेजने में जुटे हैं, वहीं कांग्रेस का आक्रामक तेवर विपक्षी गठबंधन के भीतर आंतरिक कलह को भी हवा दे रहा है। यदि समय रहते दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे का कोई सर्वमान्य फॉर्मूला नहीं निकला, तो इसका सीधा फायदा सत्ता पक्ष को मिल सकता है। फिलहाल, सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले हफ्तों में कांग्रेस और सपा के बीच बैठकों का दौर क्या गुल खिलाता है।






