नई दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर इन दिनों राजनीतिक सरगर्मी के साथ-साथ पुलिस के कड़े पहरे की तस्वीरें आम हो चली हैं। मुख्य विपक्षी दलों के नेता और नागरिक संगठन लगातार सड़कों पर उतर रहे हैं, लेकिन उन्हें हर कदम पर पुलिस की रोक का सामना करना पड़ रहा है। ताजा विवाद चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों और जंतर-मंतर पर जुटने वाले लोगों की संख्या पर लगी पाबंदियों को लेकर है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के नाम पर नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का दायरा लगातार छोटा किया जा रहा है?
स्थिति यह है कि दिल्ली पुलिस ने अब जंतर-मंतर या नई दिल्ली के किसी भी हिस्से में प्रदर्शन करने के लिए दस दिन पहले आवेदन करना अनिवार्य कर दिया है। इसके साथ ही एक बार में एक हजार से ज्यादा लोगों के जुटने पर भी रोक लगा दी गई है। पिछले कुछ दिनों में चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे विपक्षी नेताओं और नागरिक अधिकार समूहों को जब पुलिस ने अनुमति देने से मना किया, तो यह मामला खुलकर सामने आ गया। राहुल गांधी समेत कई बड़े नेता इन पाबंदियों के खिलाफ खुलकर बोलते नजर आए और उन्होंने पुलिस कार्रवाई को तानाशाही करार दिया।
जंतर-मंतर पर नए नियम और पुलिस की दलीलें
दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि ये नियम किसी की आवाज दबाने के लिए नहीं, बल्कि राजधानी में यातायात व्यवस्था बनाए रखने और सुरक्षा पुख्ता करने के लिए हैं। उनका तर्क है कि बिना पूर्व सूचना के अचानक बड़ी भीड़ के इकट्ठा होने से वीवीआईपी इलाकों में भारी जाम लग जाता है और आम जनता को भारी परेशानी होती है। पुलिस का यह भी दावा है कि आवेदन मिलने पर तय नियमों के तहत ही अनुमति दी जाती है, ताकि कानून-व्यवस्था की स्थिति पर पूरा नियंत्रण रखा जा सके। हालांकि, अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि अनुमति देने या न देने के लिए तय किए गए ये मानक बहुत अस्पष्ट हैं और इनका इस्तेमाल विरोध की हर आवाज को कुचलने के लिए किया जा रहा है।
दूसरी तरफ, इस मामले से जुड़े कानूनी जानकारों और मानवाधिकार संगठनों का साफ कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। यदि प्रशासन हर बार नियमों का हवाला देकर प्रदर्शन की इजाजत ही नहीं देगा, तो सरकार के खिलाफ असंतोष जताने का लोकतांत्रिक रास्ता ही बंद हो जाएगा। हाल ही में सिटिजन्स फॉर पीस एंड जस्टिस यानी सीजेपी और अन्य संगठनों को जब प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिली, तो उन्होंने इसे सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बड़ा हमला बताया। उनका कहना है कि विरोध की आवाज को दबाना स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं हो सकता है।
सड़कों पर उतरते नेता और प्रशासन का कड़ा रुख
विपक्षी दलों के नेताओं का लगातार सड़कों पर उतरना और पुलिस द्वारा उन्हें हिरासत में लेना अब एक नियमित प्रक्रिया सी बन गई है। राहुल गांधी ने हाल ही में जंतर-मंतर जाने के दौरान अपने ऊपर दर्ज हो रहे मुकदमों पर बेबाक अंदाज में कहा कि हर एफआईआर उनके लिए किसी मेडल से कम नहीं है। यह बयान इस बात का गवाह है कि आने वाले दिनों में राजनीतिक टकराव और ज्यादा गहराने वाला है। एक तरफ जहां सरकार और पुलिस अपनी प्रशासनिक मजबूरियों का हवाला दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसे तानाशाही रवैया बताकर जनता के बीच ले जाने की तैयारी कर रहा है।
मैदान पर तैनात पुलिसकर्मियों और विरोध प्रदर्शन करने वाले आम नागरिकों के बीच का यह तनाव आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है। स्थानीय स्तर पर दुकानदारों और दैनिक यात्रियों का भी मानना है कि प्रदर्शनों के कारण होने वाला जाम उनके काम को प्रभावित करता है, लेकिन लोकतंत्र में विरोध का हक भी सुरक्षित रहना चाहिए। संतुलन बनाने की यह चुनौती अब केवल दिल्ली पुलिस के सामने नहीं, बल्कि देश की पूरी न्याय व्यवस्था और लोकतांत्रिक ढांचे के सामने एक बड़ा सवाल बन चुकी है। द फ्रीलान्स की टीम इस मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है और आगे भी जमीनी हकीकत आप तक पहुंचाती रहेगी।
मौलिक अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच की खींचतान
संविधान के जानकारों का यह भी मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह से रोक देना या असंभव शर्तें थोड़ देना नागरिक अधिकारों का हनन है। जब दस दिन पहले की अनुमति और एक हजार लोगों की सीमा जैसी शर्तें थोपी जाती हैं, तो अचानक उभरने वाले मुद्दों पर जनता का गुस्सा सड़क पर नहीं आ पाता। यही वजह है कि दिल्ली की इन सड़कों पर चल रही यह रस्साकशी आने वाले समय में अदालती लड़ाइयों का रूप ले सकती है। नागरिक समाज और प्रशासन के बीच यह संतुलन कब और कैसे बनेगा, यह देखना अभी बाकी है।






