होम/देश/मिट्टी में मिला सोना: घोड़ा-बग्गी चलाने वाले देवेंद्र की ऐसे बदली किस्मत, 2 लाख के लोन से खड़ा किया कारोबार
देशपढ़ने में समय: 6 मिनट

मिट्टी में मिला सोना: घोड़ा-बग्गी चलाने वाले देवेंद्र की ऐसे बदली किस्मत, 2 लाख के लोन से खड़ा किया कारोबार

पुश्तैनी काम मंदा पड़ने के बाद घोड़ा-बग्गी चलाने को मजबूर हुए देवेंद्र कुमार की जिंदगी उत्तर प्रदेश सरकार की एक योजना ने बदल दी। मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना से मिले दो लाख रुपये के ऋण ने उनके मिट्टी के बर्तन और कलाकृतियों के कारोबार को नई उड़ान दी, जिससे आज वे आत्मनिर्भर बन चुके हैं।
✍️
नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•29 सितंबर 2026 • अपडेटेड•33
🌐Read in English →
शेयर करें:
मिट्टी में मिला सोना: घोड़ा-बग्गी चलाने वाले देवेंद्र की ऐसे बदली किस्मत, 2 लाख के लोन से खड़ा किया कारोबार
📷 मिट्टी में मिला सोना: घोड़ा-बग्गी चलाने वाले देवेंद्र की ऐसे बदली किस्मत, 2 लाख के लोन से खड़ा किया कारोबार — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • सहारनपुर के जड़ौदा पांडा गांव के रहने वाले देवेंद्र कुमार कभी आर्थिक तंगी के कारण घोड़ा-बग्गी चलाने को मजबूर थे।
  • उत्तर प्रदेश सरकार की मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना के तहत उन्हें 2 लाख रुपये का लोन मिला, जिससे उन्होंने अपना बंद पुश्तैनी काम दोबारा शुरू किया।
  • आज उनके द्वारा बनाए गए फ्लावर पॉट, गमले, फैंसी कैंपर और मूर्तियां दूसरे राज्यों और शहरों में भी खूब पसंद किए जा रहे हैं।

पुश्तैनी काम में छाई मंदी और संघर्ष के दिन

जीवन में कई बार हालात ऐसे मोड़ ले आते हैं कि इंसान को अपने खानदानी पेशे को छोड़कर रोजी-रोटी के लिए पूरी तरह अलग राह चुननी पड़ती है। कुछ ऐसी ही दास्तान उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के जड़ौदा पांडा गांव के रहने वाले देवेंद्र कुमार की है। देवेंद्र का परिवार पीढ़ियों से माटीकला यानी मिट्टी के बर्तन और अन्य कलाकृतियां बनाने का काम करता आ रहा था। बचपन से ही उन्होंने अपने पिता को चाक पर मिट्टी गढ़ते और सुंदर आकृतियां बनाते देखा था। समय के साथ उनके पिता के साथ एक दुर्घटना हो गई, जिसके बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी देवेंद्र के कंधों पर आ गई। उन्होंने इस पुश्तैनी काम को आगे बढ़ाया, लेकिन बाजार में आधुनिक बर्तनों के आने और मांग घटने के कारण उनका कारोबार धीरे-धीरे मंदा पड़ने लगा।

हालात इतने बदतर हो गए कि तैयार माल बिकता ही नहीं था और घर का खर्च चलाना भी पहाड़ जैसा लगने लगा। मेहनत के मुताबिक मुनाफा न मिलने के कारण आखिरकार देवेंद्र को अपना यह पुश्तैनी काम बंद करना पड़ा। परिवार का पेट पालने के लिए उन्होंने सड़कों पर घोड़ा-बग्गी चलाना शुरू कर दिया। दिनभर धूप और धूल में कड़ा संघर्ष करने के बाद भी उतनी आमदनी नहीं हो पाती थी जिससे परिवार की बुनियादी जरूरतें आसानी से पूरी हो सकें। हालांकि, उनके मन में हमेशा अपने खानदानी हुनर को दोबारा जिंदा करने की कसक बनी रहती थी, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते वे लाचार थे।

संबंधित खबरें

खादी ग्रामोद्योग में सरकारी नौकरी पाने का सुनहरा मौका: 40 हजार तक सैलरी, बिना परीक्षा ऐसे करें आवेदन

खादी ग्रामोद्योग में सरकारी नौकरी पाने का सुनहरा मौका: 40 हजार तक सैलरी, बिना परीक्षा ऐसे करें आवेदन

छोटी बचत योजनाओं पर बड़ा फैसला कल: सुकन्या समृद्धि और पीपीएफ निवेशकों को मिल सकती है खुशखबरी, जानें क्या हैं संकेत

छोटी बचत योजनाओं पर बड़ा फैसला कल: सुकन्या समृद्धि और पीपीएफ निवेशकों को मिल सकती है खुशखबरी, जानें क्या हैं संकेत

डायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद जरूरी है '15-15 का नियम', शुगर लेवल अचानक गिरने पर ऐसे बचाएं जान

डायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद जरूरी है '15-15 का नियम', शुगर लेवल अचानक गिरने पर ऐसे बचाएं जान

रॉबर्ट कियोसाकी की बड़ी चेतावनी: मार्केट क्रैश से बेघर हो सकते हैं लाखों लोग, सोना और बिटकॉइन खरीदने की सलाह

रॉबर्ट कियोसाकी की बड़ी चेतावनी: मार्केट क्रैश से बेघर हो सकते हैं लाखों लोग, सोना और बिटकॉइन खरीदने की सलाह

भारतीय शेयर बाजार से 24 महीनों में निकाले ₹3.84 लाख करोड़: जीडीपी ग्रोथ के बावजूद क्यों मुंह मोड़ रहे विदेशी निवेशक?

भारतीय शेयर बाजार से 24 महीनों में निकाले ₹3.84 लाख करोड़: जीडीपी ग्रोथ के बावजूद क्यों मुंह मोड़ रहे विदेशी निवेशक?

महज 2 करोड़ के बजट में बनी फिल्म 'हनुमान अंश': बॉक्स ऑफिस पर मचाया तहलका, कमाई जान उड़ जाएंगे होश

महज 2 करोड़ के बजट में बनी फिल्म 'हनुमान अंश': बॉक्स ऑफिस पर मचाया तहलका, कमाई जान उड़ जाएंगे होश

ओटीटी का बढ़ता शिकंजा: क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स बदल रहे हैं भारतीय सिनेमा का गणित?

ओटीटी का बढ़ता शिकंजा: क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स बदल रहे हैं भारतीय सिनेमा का गणित?

ओटीटी बनाम सिनेमाघर: बदलता समीकरण और बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड्स पर मंडराता खतरा

ओटीटी बनाम सिनेमाघर: बदलता समीकरण और बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड्स पर मंडराता खतरा

मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना बनी जीवन का टर्निंग पॉइंट

देवेंद्र के संघर्ष भरे जीवन में बदलाव तब आया जब उन्हें साल 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी 'मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना' के बारे में जानकारी मिली। बिना देर किए उन्होंने खादी ग्रामोद्योग विभाग में इस योजना के तहत आवेदन किया। सरकारी प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद उन्हें विभाग की ओर से दो लाख रुपये का ऋण मिला। यह राशि उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं थी। इस आर्थिक मदद ने उनके टूटे हुए हौंसलों को एक बार फिर पंख दे दिए और उन्होंने अपने बंद पड़े पुश्तैनी कारोबार को नए सिरे से स्थापित करने का पक्का इरादा कर लिया।

ऋण की राशि हाथ आते ही उन्होंने सबसे पहले अपने काम के दायरे को आधुनिक जरूरतों के हिसाब से बदला। अब वे केवल पारंपरिक मटके या दीये ही नहीं बना रहे थे, बल्कि बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए दो दर्जन से अधिक प्रकार के आधुनिक और आकर्षक उत्पाद तैयार करने लगे। उनके हुनर ने एक बार फिर करवट ली और उनके हाथों से बने गमले, फ्लावर पॉट, पानी के फैंसी कैंपर, डिजाइनर ग्लास, गुल्लक और विभिन्न प्रकार की मूर्तियां बाजार में छाने लगीं। उनकी मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे उनकी कला लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने लगी।

गांव की सीमाओं को लांघकर दूसरे शहरों तक पहुंचे उत्पाद

कभी जिस काम को खरीदने के लिए गांव के इक्का-दुक्का लोग ही आते थे, उसकी गूंज अब दूर-दूर तक सुनाई दे रही है। आज देवेंद्र की बनाई गई मिट्टी की कलाकृतियों की मांग केवल सहारनपुर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि चरथावल, मुजफ्फरनगर और पड़ोसी राज्य हरियाणा के करनाल जैसे बड़े शहरों से भी उन्हें बंपर ऑर्डर मिल रहे हैं। हाल ही में करनाल से उन्हें गमलों का एक बहुत बड़ा ऑर्डर मिला, जिसके तहत एक पूरी गाड़ी भरकर सामान भेजा गया।

माटीकला के इस काम ने उन्हें एक और बड़ा अवसर दिया जब उन्हें राजधानी लखनऊ में अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने वहां कई खूबसूरत उत्पाद भेजने के साथ-साथ एक विशेष मंदिर का मॉडल भी तैयार करके भेजा, जिसे प्रशासनिक स्तर पर बेहद सराहा गया। देवेंद्र के लिए यह पल किसी सपने के सच होने जैसा था, क्योंकि उनका पारंपरिक हुनर अब राज्य स्तर पर अपनी पहचान बना चुका था।

दूसरों को भी दे रहे हैं रोजगार और संवार रहे हैं भविष्य

यह सफलता सिर्फ एक कारोबार के फिर से शुरू होने की कहानी नहीं है, बल्कि एक परिवार के संघर्ष से लेकर आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणादायक गाथा है। देवेंद्र बताते हैं कि इसी काम की बदौलत उन्होंने अपने बच्चों की शादियां की और पूरे परिवार को एक मजबूत आर्थिक संबल दिया। उनके दो बेटे नौकरी कर रहे हैं, जबकि घर के अन्य सदस्य और उनकी पत्नी भी माटीकला के इस काम में पूरी तन्मयता से हाथ बंटाते हैं।

खास बात यह है कि जो शख्स कभी खुद दो वक्त की रोटी के लिए घोड़ा-बग्गी चलाता था, आज वह अन्य लोगों के लिए भी रोजगार का जरिया बन चुका है। वर्तमान में देवेंद्र के साथ चार अन्य स्थानीय लोग भी काम कर रहे हैं, जिससे उनके घर का चूल्हा भी जल रहा है। हालांकि देवेंद्र का मानना है कि यदि उन्हें भविष्य में और बड़ा ऋण या सहायता मिले, तो वे एक बड़ा प्लांट स्थापित कर सकते हैं क्योंकि उनके पास काम और डिमांड दोनों की कोई कमी नहीं है।

"सरकार की माटीकला योजना ने हमारे बिखरे हुए जीवन को फिर से समेटने का मौका दिया। कभी हालात ऐसे थे कि घोड़ा-बग्गी चलाकर गुजारा करना पड़ता था, लेकिन आज मेरे बनाए उत्पाद दूसरे शहरों में जा रहे हैं और मैं दूसरों को भी रोजगार दे पा रहा हूं।" — देवेंद्र कुमार, माटीकला उद्यमी

पारंपरिक हुनर को नई पहचान देने की मिसाल

देवेंद्र कुमार की यह कहानी उन तमाम युवाओं और कारीगरों के लिए एक बड़ी मिसाल है जो विपरीत परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देते हैं। लगन, मेहनत और सरकार द्वारा समय पर मिली आर्थिक सहायता ने साबित कर दिया कि यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो माटी जैसी साधारण चीज से भी सोना उगाया जा सकता है। आज उनका पुश्तैनी कारोबार पूरी शान के साथ फल-फूल रहा है और उनकी जिंदगी एक नए रास्ते पर चल पड़ी है।

द फ्रीलांस पत्रकारिता नीति (Editorial Commitment):हम निष्पक्ष, सटीक और तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समाचार रिपोर्ट विभिन्न प्रमाणित समाचार एजेंसियों, आधिकारिक बयानों और स्थानीय संवाददाताओं से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार की गई है।
✍️

नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस

सत्यापित संपादकीय डेस्क

राजनीतिक, नीतिगत एवं राष्ट्रीय सरोकार रिपोर्टिंग टीम

द फ्रीलांस की राष्ट्रीय संपादकीय डेस्क देश की राजनीति, संसद, नीतिगत फैसलों, केंद्रीय योजनाओं और जनसरोकार से जुड़े बड़े मुद्दों पर 24/7 निष्पक्ष, तथ्यपरक और खोजी रिपोर्टिंग करती है। यह टीम दोहरे तथ्य-सत्यापन के कठोर सिद्धांतों का पालन करती है।

संबंधित खबरें (Related Articles)

खादी ग्रामोद्योग में सरकारी नौकरी पाने का सुनहरा मौका: 40 हजार तक सैलरी, बिना परीक्षा ऐसे करें आवेदनEDUCATION

खादी ग्रामोद्योग में सरकारी नौकरी पाने का सुनहरा मौका: 40 हजार तक सैलरी, बिना परीक्षा ऐसे करें आवेदन

21 सित॰229
छोटी बचत योजनाओं पर बड़ा फैसला कल: सुकन्या समृद्धि और पीपीएफ निवेशकों को मिल सकती है खुशखबरी, जानें क्या हैं संकेतNATIONAL

छोटी बचत योजनाओं पर बड़ा फैसला कल: सुकन्या समृद्धि और पीपीएफ निवेशकों को मिल सकती है खुशखबरी, जानें क्या हैं संकेत

29 सित॰45
डायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद जरूरी है '15-15 का नियम', शुगर लेवल अचानक गिरने पर ऐसे बचाएं जानNATIONAL

डायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद जरूरी है '15-15 का नियम', शुगर लेवल अचानक गिरने पर ऐसे बचाएं जान

29 सित॰33
रॉबर्ट कियोसाकी की बड़ी चेतावनी: मार्केट क्रैश से बेघर हो सकते हैं लाखों लोग, सोना और बिटकॉइन खरीदने की सलाहNATIONAL

रॉबर्ट कियोसाकी की बड़ी चेतावनी: मार्केट क्रैश से बेघर हो सकते हैं लाखों लोग, सोना और बिटकॉइन खरीदने की सलाह

29 सित॰46
भारतीय शेयर बाजार से 24 महीनों में निकाले ₹3.84 लाख करोड़: जीडीपी ग्रोथ के बावजूद क्यों मुंह मोड़ रहे विदेशी निवेशक?NATIONAL

भारतीय शेयर बाजार से 24 महीनों में निकाले ₹3.84 लाख करोड़: जीडीपी ग्रोथ के बावजूद क्यों मुंह मोड़ रहे विदेशी निवेशक?

29 सित॰27
महज 2 करोड़ के बजट में बनी फिल्म 'हनुमान अंश': बॉक्स ऑफिस पर मचाया तहलका, कमाई जान उड़ जाएंगे होशNATIONAL

महज 2 करोड़ के बजट में बनी फिल्म 'हनुमान अंश': बॉक्स ऑफिस पर मचाया तहलका, कमाई जान उड़ जाएंगे होश

29 सित॰33
ओटीटी का बढ़ता शिकंजा: क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स बदल रहे हैं भारतीय सिनेमा का गणित?NATIONAL

ओटीटी का बढ़ता शिकंजा: क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स बदल रहे हैं भारतीय सिनेमा का गणित?

29 सित॰34
ओटीटी बनाम सिनेमाघर: बदलता समीकरण और बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड्स पर मंडराता खतराNATIONAL

ओटीटी बनाम सिनेमाघर: बदलता समीकरण और बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड्स पर मंडराता खतरा

29 सित॰34