नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — सोशल मीडिया के चर्चित चेहरे और यूट्यूबर ध्रुव राठी एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक घेरे में आ गए हैं। ताजा घटनाक्रम के तहत, गूगल ने दिल्ली हाईकोर्ट को आधिकारिक रूप से यह जानकारी दी है कि ध्रुव राठी के कुछ विवादित वीडियो पर भारत के भीतर रोक लगा दी गई है। यह मामला देवी-देवताओं पर की गई कथित टिप्पणियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े एक वायरल वीडियो से जुड़ा हुआ है। देश की प्रमुख अदालतों में इस तरह के मामलों की सुनवाई के बीच डिजिटल प्लेटफॉर्म्स द्वारा की गई यह कार्रवाई काफी अहम मानी जा रही है।
मामले की शुरुआत तब हुई जब सोशल मीडिया पर अपलोड किए गए कुछ वीडियो में धार्मिक भावनाओं को आहत करने और राजनीतिक हस्तियों के खिलाफ भ्रामक टिप्पणियां करने के आरोप लगे। इसके खिलाफ कई मंचों से शिकायतें दर्ज कराई गईं और अदालत का दरवाजा भी खटखटाया गया। सुनवाई के दौरान अदालत के निर्देशों का पालन करते हुए गूगल ने भारत में उन विशिष्ट वीडियो तक पहुंच को सीमित या प्रतिबंधित कर दिया है, जिन पर आपत्ति जताई गई थी। इस कानूनी कदम से डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स के बीच एक बार फिर ऑनलाइन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी सीमाओं को लेकर बहस छिड़ गई है।
देवी-देवताओं पर टिप्पणी और वीडियो पर कानूनी शिकंजा
ध्रुव राठी अपने वीडियो में अक्सर समसामयिक मुद्दों, राजनीति और सामाजिक विषयों पर बेबाक राय रखते हैं। उनके वीडियो को देश-विदेश में लाखों लोग देखते हैं और शेयर करते हैं। हालांकि, उनके कई बयानों और वीडियो को लेकर अक्सर विवाद भी खड़े होते रहे हैं। ताजा विवाद तब और बढ़ गया जब उनके द्वारा बनाए गए कुछ वीडियो में हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयानों को पेश करने के तरीके पर सवाल उठाए गए। आलोचकों का कहना है कि डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करके समाज में गलत संदेश फैलाया जा रहा है, जिस पर लगाम लगनी जरूरी है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक और फिल्मी जगत की हस्तियां भी खुलकर अपनी राय रख रही हैं। हाल ही में एक लोकप्रिय धारावाहिक की जानी-मानी अभिनेत्री ने भी ध्रुव राठी के बयानों पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने सवाल उठाया कि विदेश में बैठकर देश की छवि को प्रभावित करने वाले बयानों से क्या हासिल होता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इन बयानों के बाद दो धड़े बन गए हैं। एक तरफ ध्रुव राठी के समर्थक हैं जो इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके विरोधी हैं जो देश के कानूनों और धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने की बात पर जोर दे रहे हैं।
गूगल और दिल्ली हाईकोर्ट की कार्यवाही के मायने
दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही इन कानूनी प्रक्रियाओं के बीच इंटरनेट कंपनियों की भूमिका पर भी सबकी नजरें टिकी हैं। भारत सरकार लगातार यह कहती रही है कि सोशल मीडिया कंपनियों को देश के कानूनों का पालन करना होगा और आपत्तिजनक या भड़काऊ सामग्री पर तुरंत रोक लगानी होगी। गूगल द्वारा दी गई यह जानकारी दर्शाती है कि घरेलू कानूनों और अदालत के आदेशों के आगे अब बड़ी तकनीकी कंपनियों को भी झुकना पड़ रहा है। देश के आईटी नियमों के तहत अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर नियंत्रण और सख्त होता जा रहा है।
आम जनता के बीच भी इस बात को लेकर खासी चर्चा है कि सोशल मीडिया पर परोसी जाने वाली सामग्री कितनी प्रामाणिक और कानूनी रूप से सही है। लोग अब इस बात पर बहस कर रहे हैं कि डिजिटल क्रिएटर्स को अपनी बात रखने की पूरी आजादी होनी चाहिए, लेकिन साथ ही देश की एकता, संस्कृति और कानून का दायरा भी पार नहीं होना चाहिए। 'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड पड़ताल में यह बात साफ उभर कर आई है कि आने वाले दिनों में डिजिटल कंटेंट रेगुलेशन को लेकर नियम और अधिक कड़े हो सकते हैं।
भविष्य की डिजिटल राजनीति और सेंसरशिप की बहस
यह पूरा मामला सिर्फ एक यूट्यूबर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय की डिजिटल राजनीति की दिशा तय करेगा। जैसे-जैसे चुनाव और राजनीतिक सरगर्मी बढ़ती है, सोशल मीडिया का असर आम मतदाताओं पर सबसे ज्यादा पड़ता है। ऐसे में हर बड़े बयान और वीडियो पर कानूनी और राजनीतिक नजर रखना अब अनिवार्य हो गया है। आने वाले हफ्तों में दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई होगी, जहां यह तय किया जाएगा कि इस तरह के मामलों में आगे की कानूनी दिशा क्या होगी।


