महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों बेहद दिलचस्प और तनावपूर्ण दौर से गुजर रही है। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट के सामने एक तरफ कानूनी लड़ाई है तो दूसरी तरफ घर के भीतर ही बगावत का सामना करना पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान शिंदे गुट ने साफ तौर पर कहा है कि शिवसेना के असली नाम और चुनाव चिन्ह पर उनका स्वाभाविक हक बनता है। इस मामले पर लगातार सुनवाई हो रही है और अदालत के रुख पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
दूसरी तरफ चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वाले मामलों पर भी अदालत में बहस जारी है। कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि विधानसभा स्पीकर के अयोग्य न ठहराने के फैसले पर कोई नया मोड़ आता है, तो चुनाव आयोग द्वारा दिए गए धनुष-बाण चुनाव चिन्ह के आवंटन पर भी असर पड़ सकता है। शिंदे खेमा पूरी मजबूती से अपनी दलीलें रख रहा है और उनका दावा है कि पार्टी के अधिकांश विधायक और सांसद उनके साथ हैं, इसलिए पार्टी संगठन पर उनका दावा पूरी तरह से वैध है।
महायुति गठबंधन में सीटों को लेकर रार और बागियों की चुनौती
राजनीतिक मोर्चे पर सिर्फ कानूनी लड़ाई ही नहीं बल्कि गठबंधन के भीतर भी हलचल कम नहीं है। आगामी विधान परिषद चुनाव से पहले महायुति गठबंधन के अंदर खाने सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। कई सीटों पर सहयोगी दलों के बीच आपसी खींचतान खुलकर सामने आ गई है। स्थिति तब और पेचीदा हो गई जब कई बागी उम्मीदवारों ने भी अपना नामांकन पत्र दाखिल कर दिया है। इससे चुनाव का मुकाबला काफी दिलचस्प और कड़ा हो गया है।
गठबंधन के नेताओं के लिए इन बागियों को मनाना और अपने अधिकृत उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। विपक्षी दल इस अंदरूनी कलह पर पैनी नजर बनाए हुए हैं और इसे सरकार की कमजोरी के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। एकनाथ शिंदे और उनके सहयोगियों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे समय रहते समन्वय बिठाएं ताकि चुनाव में किसी भी तरह के नुकसान से बचा जा सके।
सूखे की मार और किसानों को राहत देने का राजनीतिक दांव
राजनीतिक और कानूनी उठापटक के बीच सरकार जनता से जुड़े मुद्दों पर भी सक्रिय नजर आ रही है। राज्य के कई हिस्सों में सूखे जैसे हालात और किसानों की समस्याओं को लेकर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने किसानों को सीधा भरोसा दिलाया है कि इस मुश्किल वक्त में सरकार पूरी तरह से उनके साथ खड़ी रहेगी। शिंदे ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसानों को किसी भी तरह की निराशा नहीं होने दी जाएगी और उनकी दिवाली फीकी नहीं पड़ने दी जाएगी।
सरकार की ओर से किसानों को राहत पैकेज और जरूरी सहायता पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं ताकि ग्रामीण इलाकों में बढ़ रहे असंतोष को थामा जा सके। एक तरफ जहां राजनीतिक दल चुनावी जोड़-तोड़ में व्यस्त हैं, वहीं आम जनता और किसानों के बीच जमीन पर काम दिखाने का दबाव भी सरकार पर बना हुआ है। द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में कई और बड़े उलटफेर देखने को मिल सकते हैं।





