नई दिल्ली। देश की राजनीति में इन दिनों भारत निर्वाचन आयोग की कार्यशैली को लेकर जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। चुनाव आयोग के हालिया फैसलों, आंतरिक मामलों और राजनीतिक दलों को लेकर लिए गए कदमों पर अब खुलकर सवाल उठने लगे हैं। यह विवाद केवल विपक्षी दलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सत्ताधारी एनडीए गठबंधन के भीतर से भी आयोग की कार्यप्रणाली पर स्पष्टीकरण मांगने की मांग उठ चुकी है। पिछले कुछ दिनों में आए फैसलों ने चुनावी व्यवस्था पर नई बहस को जन्म दे दिया है।
मामले की शुरुआत तब हुई जब चुनाव आयोग के भीतर पूर्ण आयोग के फैसलों में असहमति और मतभेदों की खबरें मीडिया में सामने आईं। हालांकि आयोग ने इन रिपोर्टों पर सफाई देते हुए कहा कि पूर्ण आयोग के निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं, लेकिन अंदरखाने चल रही सुगबुगाहट ने सियासी गलियारों में सुई की रफ्तार से चर्चाएं तेज कर दीं। इस बीच, तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज करने के एक कड़े फैसले ने ममता बनर्जी की पार्टी को सकते में डाल दिया है। इस कार्रवाई के बाद से सियासी दलों में खलबली मची हुई है।
एनडीए सहयोगियों की नाराजगी और स्पष्टीकरण की मांग
विपक्ष के साथ-साथ अब सरकार समर्थित दलों की तरफ से भी चुनाव आयोग के कुछ फैसलों पर चिंता जताई जा रही है। हाल ही में चिराग पासवान की पार्टी समेत एनडीए के कुछ अन्य सहयोगी दलों ने भी चुनाव आयोग के सामने कई मामलों में स्पष्टीकरण की मांग रखी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सत्ता पक्ष के सहयोगियों द्वारा आयोग के समक्ष इस तरह की मांग रखना एक असामान्य घटना है, जो प्रशासनिक और चुनावी निष्पक्षता पर नए सवाल खड़े करती है।
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ हुई सख्त कार्रवाई के बाद ममता बनर्जी ने राजनीतिक दूरियों को दरकिनार करते हुए विपक्षी नेताओं से संपर्क साधना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में ममता बनर्जी ने सीपीआईएम नेता एमए बेबी से फोन पर बातचीत की। चुनाव आयोग के फैसलों के खिलाफ अब वैचारिक रूप से विरोधी दल भी एक मंच पर आते दिख रहे हैं। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि आयोग के जरिए राजनीतिक रूप से दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है और निष्पक्षता प्रभावित हो रही है।
सार्वजनिक बयानों और विरोध प्रदर्शनों का बढ़ता दौर
क्षेत्रीय स्तर पर भी चुनाव आयोग के फैसलों के खिलाफ मुखर विरोध देखने को मिल रहा है। विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और सार्वजनिक मंचों पर कुछ नेताओं ने आयोग के रुख पर तीखी टिप्पणियां की हैं। क्षेत्रीय दलों के नेताओं का आरोप है कि कुछ खास दलों को फायदा पहुंचाने के लिए फैसले लिए जा रहे हैं, जिससे चुनावी लोकतंत्र की मूल भावना को ठेस पहुंच रही है। इन तीखे बयानों ने प्रशासनिक हलकों में भी हलचल बढ़ा दी है।
आने वाले दिनों में यह विवाद और गहराने के पूरे आसार हैं क्योंकि देश में चुनावी सरगर्मी लगातार बनी हुई है। सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि निर्वाचन आयोग इन तमाम राजनीतिक सवालों और सहयोगियों की आपत्तियों पर क्या आधिकारिक रुख अपनाता है। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे ही कोई नया अपडेट आएगा, पाठकों तक सबसे पहले पहुंचाया जाएगा।





