त्योहारों के बीच रेल यात्रियों की बढ़ी मुश्किलें, समय पर नहीं पहुंच रही हैं स्पेशल ट्रेनें
भारतीय रेलवे द्वारा हर साल त्योहारों के सीजन में यात्रियों की अतिरिक्त भीड़ को संभालने के लिए विशेष गाड़ियों का संचालन किया जाता है। हालांकि, मौजूदा व्यवस्था में इन स्पेशल ट्रेनों का हाल बेहाल नजर आ रहा है। सीमित संख्या में चलाई जा रही ये ट्रेनें अपने निर्धारित समय से कई-कई घंटे की देरी से पटरियों पर दौड़ रही हैं, जिससे आम जनता की मुसीबतें काफी बढ़ गई हैं। सफर करने वाले लोग घंटों रेलवे स्टेशनों पर इंतजार करने को मजबूर हैं।
यात्रियों का कहना है कि त्योहार के इस पवित्र समय में जब परिवार के साथ समय बिताने की जल्दी होती है, तब रेलवे की यह लेट-लतीफी किसी बड़ी सजा से कम नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से लेकर रेलवे के सहायता केंद्रों तक यात्रियों का गुस्सा साफ तौर पर देखा जा सकता है। लोग अब यह सवाल उठाने लगे हैं कि जब ये ट्रेनें समय पर गंतव्य तक पहुंचा ही नहीं सकतीं, तो इनका संचालन करने का क्या औचित्य है?
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घंटों की देरी से चल रही हैं प्रमुख फेस्टिवल स्पेशल ट्रेनें
देश के विभिन्न हिस्सों से चल रही कई प्रमुख त्योहार स्पेशल गाड़ियों की स्थिति बेहद खराब है। उदाहरण के लिए, पूर्णिया कोर्ट से नई दिल्ली के बीच संचालित होने वाली फेस्टिवल स्पेशल ट्रेन संख्या 05580 अपने तय समय से लगभग आठ घंटे की देरी से चल रही है। इस ट्रेन में यात्रा कर रहे एक यात्री दौरम ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए बताया कि जो सफर सामान्य रूप से तीस घंटे में पूरा होना चाहिए, वह अब अड़तीस से चालीस घंटे तक खिंच गया है।
इसी तरह, आनंद विहार टर्मिनस की ओर जाने वाली त्योहार स्पेशल ट्रेन संख्या 05579 के यात्रियों को भी तीन घंटे से ज्यादा की देरी का सामना करना पड़ा। पूर्वांचल एक्सप्रेस से सफर कर रहे यात्री शंकर कुमार ने बताया कि ट्रेन के आठ घंटे लेट होने की वजह से वह समय पर अपने दफ्तर नहीं पहुंच सके, जिसके परिणामस्वरूप उनका एक दिन का वेतन काट लिया गया। सहरसा से अमृतसर जाने वाली गरीब रथ एक्सप्रेस के यात्रियों का भी कमोबेश यही हाल रहा है।
कनेक्टिंग ट्रेन छूटने का डर और यात्रियों का फूटा आक्रोश
लंबी दूरी की यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए सबसे बड़ी समस्या आगे की यात्रा या कनेक्टिंग ट्रेनों को लेकर खड़ी हो जाती है। ट्रेन संख्या 12203 सहरसा-अमृतसर गरीब रथ एक्सप्रेस के यात्री अमित महतो ने रेल प्रशासन के सामने अपनी पीड़ा रखते हुए कहा कि ट्रेन के दस घंटे विलंब से चलने के कारण उनकी अगली कनेक्टिंग ट्रेन छूटने का खतरा पैदा हो गया है। ऐसी स्थिति में यात्रियों की यात्रा की योजना पूरी तरह से चरमरा जाती है।
यात्रियों का यह भी कहना है कि यदि रेलवे प्रशासन त्योहारों के दौरान सुचारू संचालन सुनिश्चित नहीं कर सकता है, तो ऐसी स्पेशल ट्रेनों को चलाने का कोई फायदा नहीं है। लोगों ने मांग की है कि या तो रेलवे समय सारणी में सुधार करे या फिर ऐसी ट्रेनों का संचालन बंद कर दे, ताकि यात्रियों को इस प्रकार की मानसिक और आर्थिक परेशानियों का सामना न करना पड़े।
"यह ट्रेन तीस घंटे का सफर अड़तीस से चालीस घंटे में तय कर रही है, जिससे हम सभी को भारी परेशानी हो रही है। या तो रेलवे इसका समय सुधारे या फिर ऐसी ट्रेन चलाना बंद कर दे, हमारे नुकसान की भरपाई कौन करेगा?" — दौरम, रेल यात्री
लोको पायलटों पर बढ़ा अतिरिक्त दबाव, टेल लैंप आदेश पर मचा बवाल
केवल यात्री ही नहीं, बल्कि रेलवे के कर्मचारी भी मौजूदा व्यवस्था से खासे नाराज चल रहे हैं। हाल ही में रेलवे बोर्ड की तरफ से एक नया आदेश जारी किया गया है, जिसने लोको पायलटों और सहायक लोको पायलटों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इस नए निर्देश के तहत, अब बिना ट्रेन मैनेजर (गार्ड) और ब्रेक वैन के दौड़ने वाली मालगाड़ियों के पिछले हिस्से में लोको पायलटों को ही लाल दिखने वाली टेल लैंप लगानी होगी।
रेलवे बोर्ड की उपनिदेशक यातायात श्वेता शर्मा की ओर से सभी जोनल मुख्यालयों को इस संबंध में आदेश जारी किए गए हैं। देश भर के लोको पायलट इस आदेश का विरोध करते हुए इसे अपनी सुरक्षा और कार्यभार के खिलाफ बता रहे हैं। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि इंजन से उतरकर पथरीले और कच्चे रास्तों से होते हुए मालगाड़ी के आखिरी डिब्बे तक जाना और वहां टेल लैंप लगाना बेहद जोखिम भरा काम है।
सुरक्षा के लिहाज से क्यों जरूरी है टेल लैंप और क्या हैं चिंताएं
रेलवे नियमों के अनुसार, मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों के सबसे आखिरी कोच में रात के समय टेल लैंप का जलना अनिवार्य होता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि ट्रेन का कोई भी डिब्बा रास्ते में छूटा नहीं है और पूरी रैक सुरक्षित रूप से आगे बढ़ रही है। रास्ते में पड़ने वाले सभी स्टेशनों के स्टेशन मास्टर इसी लाल रोशनी को देखकर यह आश्वस्त होते हैं कि गाड़ी पूरी तरह सुरक्षित गुजर रही है। कोहरे के मौसम में यह लाल बत्ती लगभग पंद्रह मीटर पहले ही दिखाई दे जाती है।
हालांकि, लोको पायलट संघ का तर्क है कि यह काम ऑपरेटिंग विभाग का है जिसे जबरन ड्राइवरों पर थोपा जा रहा है। इससे न केवल समय और श्रम की बर्बादी होती है, बल्कि संरक्षा के दृष्टिकोण से भी यह बेहद खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि ड्राइवर को यह पता नहीं चल पाता कि चलती ट्रेन में वह लैंप जल भी रही है या नहीं। कुल मिलाकर, त्योहारों के इस सीजन में यात्रियों की नाराजगी और कर्मचारियों के विरोध के बीच रेलवे प्रबंधन के सामने कई गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।




