राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचार और उनकी आधुनिक प्रासंगिकता
हर साल दो अक्टूबर का दिन भारतीय इतिहास में एक विशेष महत्व रखता है। यह वह तारीख है जब देश ने दो महान विभूतियों—राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को जन्म लेते देखा। मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें पूरी दुनिया बापू और महात्मा के रूप में जानती है, ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण सत्य, अहिंसा और न्याय के लिए समर्पित कर दिया। आज जब हम उनकी जयंती मना रहे हैं, तो यह सोचना अनिवार्य हो जाता है कि क्या आधुनिक समाज उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर सही मायने में चल रहा है या फिर उनके विचार केवल किताबी पन्नों और जयंती के भाषणों तक सिमट कर रह गए हैं।
गुजरात के पोरबंदर की उस ऐतिहासिक धरती से शुरू हुआ उनका सफर दक्षिण अफ्रीका के नस्लभेदी शासन के खिलाफ संघर्ष से होते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की धुरी बन गया। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ किसी भी प्रकार की हिंसा का सहारा नहीं लिया, बल्कि सत्याग्रह और शांतिपूर्ण विरोध को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। आज के तकनीकी युग और भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहाँ मनुष्य और मनुष्य के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं, बापू के संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गए हैं।
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का संदेश: वैश्विक संघर्षों के बीच शांति की पुकार
गांधी जयंती की पूर्व संध्या पर देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अपने संदेश में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि आज दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और टकराव का भयानक माहौल बना हुआ है। ऐसे कठिन समय में महात्मा गांधी का अहिंसा का मार्ग ही मानवता को बचा सकता है। राष्ट्रपति ने कहा कि जब देश वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' बनने के अपने गौरवशाली लक्ष्य की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है, तब यह अत्यंत आवश्यक है कि हमारी विकास यात्रा में सहानुभूति, समानता और समावेशिता जैसे मानवीय मूल्य मजबूती से जुड़े रहें।
राष्ट्रपति ने इस बात पर भी जोर दिया कि समावेशी विकास का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा जब समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक प्रगति का लाभ पहुंचे। बापू का 'सर्वोदय' का सपना यही था कि समाज के हर वर्ग को आगे बढ़ने का समान अवसर मिले। आज के कूटनीतिक और भू-राजनीतिक तनावों के दौर में राष्ट्रप्रमुख का यह वक्तव्य पूरी दुनिया को एक नैतिक संदेश देता है कि संवाद और शांति ही समस्याओं का एकमात्र स्थायी समाधान हैं।
छात्रों और युवाओं में उत्साह: स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में गूंजे बापू के आदर्श
देश के विभिन्न हिस्सों में शिक्षण संस्थानों ने गांधी जयंती को बेहद रचनात्मक और प्रेरणादायक तरीके से मनाया। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के स्कूलों में विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। कई विद्यालयों में बच्चों ने नुक्कड़ नाटक और नाट्य मंचन के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के उन स्वर्णिम पलों को दोबारा जीवंत कर दिया, जब पूरा देश महात्मा गांधी के एक आह्वान पर सड़क पर उतर आया था।
दांडी यात्रा और नमक सत्याग्रह के दृश्यों को मंच पर देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। शिक्षकों और प्राचार्यों ने अपने संबोधन में बच्चों को समझाया कि कैसे साधारण वेशभूषा में रहने वाले एक इंसान ने अपने अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। इस प्रकार के आयोजनों का उद्देश्य नई पीढ़ी को देश के स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्षों से परिचित कराना और उनमें राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करना है.
अहिंसा और समाज: क्या हम बापू के आदर्शों को अपने आचरण में उतार पाए हैं?
जब भी हम गांधी जयंती मनाते हैं, तो सरकारी दफ्तरों से लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक बापू के कोट्स और नारे छाए रहते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हमने उनके विचारों की गहराई को समझा है? महात्मा गांधी के लिए अहिंसा का मतलब केवल किसी को शारीरिक रूप से चोट न पहुंचाना नहीं था। उनके अनुसार अहिंसा का सीधा संबंध प्रेम, सत्य, आत्मसंयम और दूसरों के विचारों के प्रति सम्मान से था।
आज के समय में जब सामाजिक और राजनीतिक असहिष्णुता बढ़ रही है, तब गांधी का दर्शन हमें आईना दिखाता है। समाजशास्त्रियों और विचारकों का मानना है कि यदि हम अपनी असहमति को दुश्मनी में बदलने के बजाय संवाद के जरिए सुलझाना सीख जाएं, तो समाज में व्याप्त नफरत और तनाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। गांधीजी का यह स्पष्ट मत था कि जिस प्रकार का रास्ता या साधन हम चुनेंगे, परिणाम भी वैसा ही होगा।
"अहिंसा मानव जाति के लिए सबसे बड़ी ताकत है। यह मनुष्य द्वारा रेषित विनाश के सभी हथियारों से कहीं अधिक शक्तिशाली है।" — महात्मा गांधी, दार्शनिक एवं राष्ट्रपिता
स्वच्छता से लेकर आजीविका तक: गांधीवादी योजनाओं का प्रभाव
महात्मा गांधी के विचार केवल वैचारिक बहसों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि समय-समय पर देश की कई बड़ी नीतियों और योजनाओं की रीढ़ भी बने हैं। दो अक्टूबर के ही दिन आरंभ किया गया 'स्वच्छ भारत मिशन' इस बात का प्रमाण है कि कैसे बापू के स्वच्छता के प्रति आग्रह को एक विशाल जनआंदोलन में बदला जा सकता है। इसी प्रकार, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की गारंटी देने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) ने देश के करोड़ों गरीब परिवारों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई है।
इन योजनाओं की सफलता और विफलता पर भले ही राजनीतिक गलियारों में बहस होती रही हो, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इनके मूल में गांधीजी की ग्राम-स्वराज और अंतिम व्यक्ति के कल्याण की परिकल्पना ही निहित थी। आज जब देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है, तो गांधी के कुटीर उद्योग और स्थानीय उत्पादों के उपयोग का विचार फिर से प्रासंगिक होता जा रहा है।
निष्कर्ष: बापू के विचारों पर चलकर ही बनेगा एक बेहतर और समावेशी भविष्य
महात्मा गांधी की 157वीं जयंती महज एक औपचारिकता या छुट्टी का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्मविश्लेषण का एक ऐसा अवसर है जो हमें अपनी प्राथमिकताओं और सामाजिक उत्तरदायित्वों की याद दिलाता है। चाहे वह व्यक्तिगत जीवन का अनुशासन हो, सामाजिक सौहार्द बनाए रखना हो या फिर देश के विकास में अपना योगदान देना हो, बापू के बताए रास्ते आज भी अचूक हैं। यदि प्रत्येक नागरिक उनके बताए सत्य, अहिंसा और सादगी के मार्ग पर चलने का संकल्प ले ले, तो न केवल देश बल्कि पूरी दुनिया में शांति और समृद्धि का एक नया अध्याय लिखा जा सकता है।








