नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की सर्वोच्च अदालत में आज एक ऐसी घटना घटी जिसने सबको चौंका दिया। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की बेंच में सुनवाई चल रही थी। माहौल पहले से ही थोड़ा गरम था। इसी बीच अचानक एक वरिष्ठ महिला वकील ने बहस के दौरान माइक्रोफोन छीन लिया। इस तीखी बहस और हंगामे के बाद वरिष्ठ एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने जंतर-मंतर प्रदर्शन केस से खुद को पूरी तरह अलग करने का फैसला कर लिया। वकीलों के बीच की यह खींचतान अब अदालत के गलियारों से बाहर निकलकर आम चर्चा का विषय बन गई है।
यह पूरा मामला जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में डी-नोटिफाई करने से जुड़ा हुआ है। अदालत में सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि क्या जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल से हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी पुराने आदेश का गलत हवाला दिया गया था। इस पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कड़ा जवाब मांगा है। अदालत यह जानना चाहती है कि आखिर किस आधार पर और किसकी अनुमति से इस ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन स्थल को लेकर प्रशासनिक कदम उठाए गए।
मुख्य न्यायाधीश की बेंच में क्यों बढ़ा वकीलों का तनाव?
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने साफ शब्दों में कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में शामिल होना वकीलों और आम नागरिकों का मौलिक अधिकार है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि देश के नागरिकों और वकीलों के इस लोकतांत्रिक अधिकार का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन अदालत के भीतर ही वकीलों के बीच जिस तरह की नोंकझोक और माइक छीनने की घटना सामने आई, उसने न्यायिक अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यही वजह है कि गोपाल शंकरनारायणन जैसे वरिष्ठ वकील ने इस संवेदनशील मामले से अपना किनारा कर लेना ही बेहतर समझा।
दूसरी ओर, सुरक्षा और प्रशासनिक पाबंदियों को लेकर भी अदालत में तीखे सवाल पूछे गए। लाइव लॉ और अन्य कानूनी पोर्टलों की रिपोर्ट के मुताबिक, वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने यह मुद्दा उठाया कि सुप्रीम कोर्ट के बाहर भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 लागू करने से पहले क्या मुख्य न्यायाधीश या संबंधित सक्षम अधिकारी से कोई औपचारिक इजाजत ली गई थी या नहीं। पुलिस और प्रशासन के इन कदमों पर अब कानूनी जानकारों की पैनी नजर बनी हुई है कि वे अदालत के इन तीखे सवालों का क्या जवाब देते हैं।
जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल विवाद और आगे की कानूनी राह
जंतर-मंतर हमेशा से देश की राजधानी में विरोध प्रदर्शनों का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। लेकिन पिछले कुछ महीनों में इसे लेकर प्रशासनिक नियमों और पाबंदियों में काफी बदलाव देखने को मिले हैं। वकीलों का एक धड़ा इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला मानता है, तो प्रशासन कानून और व्यवस्था का हवाला देता है। सुप्रीम कोर्ट की इस ताजा सुनवाई ने इस पूरे विवाद को एक बार फिर राष्ट्रीय सुर्खियों में ला खड़ा कर दिया है।
गोपाल शंकरनारायणन के इस केस से हटने के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि याचिकाकर्ता पक्ष इस मामले में अपनी कानूनी रणनीति कैसे आगे बढ़ाता है। अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने को कहा है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि देश की राजधानी में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने के नियमों में क्या कोई बड़ा बदलाव आता है या प्रशासन अपनी पुरानी व्यवस्था पर ही कायम रहता है। द फ्रीलान्स की टीम इस मामले की हर कानूनी अपडेट पर लगातार नजर बनाए हुए है।




