मदीना/रियाद: पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र पर तनाव की सुइयां एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गई हैं। यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने इस बार उस पवित्र स्थल को सीधे तौर पर अपनी हिंसा की जद में ले लिया है, जिसकी धार्मिक और आध्यात्मिक महत्ता पूरी इस्लामिक दुनिया के लिए सर्वोपरि है। हमारी ऑन-द-ग्राउंड खोजी रिपोर्टिंग और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सूत्रों से मिले इनपुट के मुताबिक, सऊदी अरब के मदीना शहर में स्थित पैगंबर की मस्जिद (Al-Masjid an-Nabawi) को बिजली आपूर्ति करने वाले मुख्य पावर स्टेशन पर एक भीषण ड्रोन हमला किया गया है।
सीमा लांघने का आरोप: मुस्लिम देशों में भड़का गुस्सा
इस ताजा घटनाक्रम के बाद से खाड़ी देशों और व्यापक मुस्लिम जगत में कूटनैतिक हलचल तेज हो गई है। विभिन्न क्षेत्रीय ताकतों का मानना है कि हूतियों ने इस हमले के जरिए तमाम लाल रेखाएं (Red Lines) पार कर दी हैं। मक्का के बाद इस्लाम के दूसरे सबसे पवित्र शहर मदीना के नागरिक और धार्मिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना न केवल युद्ध के नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि इसने करोड़ों मुसलमानों की आस्था को भी सीधे तौर पर आहत किया है। कई इस्लामिक देशों ने आधिकारिक बयानों में इस कायराना हरकत की कड़ी भर्त्सना की है।
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ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा प्रहार: तेल टर्मिनलों तक फैला दायरा
खुफिया और सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह हमला महज एक अकेला कृत्य नहीं है, बल्कि सऊदी अरब के ऊर्जा तंत्र को पंगु बनाने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। मदीना में पावर स्टेशन पर ड्रोन हमले से ठीक पहले या उसके साथ ही सऊदी अरब के महत्वपूर्ण तेल टर्मिनलों को भी निशाना बनाने की खबरें सामने आई हैं। यमन से लगातार हो रहे इन बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों की नींद उड़ा दी है। हालांकि, सऊदी वायु रक्षा प्रणालियों (Air Defense Systems) ने कई खतरों को हवा में ही नाकाम करने का दावा किया है, लेकिन रणनीतिक प्रतिष्ठानों के पास इस तरह के ड्रोन का पहुंच जाना सुरक्षा तंत्र की बड़ी चूक को दर्शाता है।
मक्का के बाद मदीना: हूतियों की बदलती युद्धनीति
यह पहला मौका नहीं है जब सऊदी अरब के धार्मिक केंद्रों या उनके आसपास के इलाकों को युद्ध की आंच का सामना करना पड़ा हो। इससे पहले मक्का की तरफ भी मिसाइलें दागे जाने के आरोप हूतियों पर लग चुके हैं। लेकिन इस बार मदीना के पावर ग्रिड को विशेष रूप से चिन्हित करना यह साबित करता है कि विद्रोही गुट मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं। पैगंबर की मस्जिद से जुड़े बुनियादी ढांचे पर हमला करने से दुनिया भर में शिया-सुन्नी विमर्श से परे एक कड़ा संदेश गया है कि यह संघर्ष अब केवल राजनीतिक या क्षेत्रीय नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील होता जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और आगे की राह
इस घटना के बाद संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देशों के राजनयिकों पर दबाव बढ़ गया है कि वे यमन संघर्ष के स्थायी समाधान के लिए हूतियों पर नकेल कसें। सऊदी नीत गठबंधन सेना (Arab Coalition) की तरफ से जवाबी कार्रवाई की तीव्रता बढ़ाए जाने के पूरे आसार हैं। हालांकि, सवाल यह बना हुआ है कि क्या इन हमलों से सऊदी अरब की आर्थिक सुधार योजनाओं (Vision 2030) और क्षेत्रीय शांति प्रयासों को झटका लगेगा? हमारी फील्ड जांच बताती है कि जब तक यमन में ईरान और क्षेत्रीय ताकतों का छद्म युद्ध थमता नहीं है, तब तक खाड़ी देशों की संप्रभुता और धार्मिक स्थल इस तरह के ड्रोन खतरों के साए में ही रहेंगे।








