औद्योगिक उत्पादन में जोरदार उछाल: क्या वाकई पटरी पर लौट आई है देश की अर्थव्यवस्था?
भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर हाल ही में सामने आए सरकारी आंकड़े बेहद उत्साहजनक नजर आ रहे हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, देश के औद्योगिक उत्पादन यानी IIP में अगस्त के दौरान सालाना आधार पर 8 फीसदी की जोरदार तेजी दर्ज की गई है। इससे ठीक पहले यानी जुलाई महीने में यह रफ्तार 7.4 फीसदी रही थी। इस आंकड़ों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के व्यापक सुधार की कहानी बयां करती है, जो देश में रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र माना जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी देश का औद्योगिक सूचकांक इस तरह की छलांग लगाता है, तो उसे व्यापक आर्थिक सेहत के लिहाज से बहुत बेहतरीन माना जाता है। सरकार और नीति निर्माताओं के लिए यह राहत की बात है कि बुनियादी उद्योग और विनिर्माण इकाइयां बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। लेकिन इस पूरी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जो आम निवेशकों को परेशान कर रहा है। तमाम सकारात्मक आंकड़ों के बावजूद जब लोग अपने शेयर बाजार के पोर्टफोलियो पर नजर डालते हैं, तो उन्हें उम्मीद के मुताबिक मुनाफा या बढ़त दिखाई नहीं देती है।
इस विरोधाभास ने निवेशकों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जब फैक्ट्रियों में उत्पादन इतनी तेजी से हो रहा है और जीडीपी के आंकड़े बेहतर संकेत दे रहे हैं, तो शेयर बाजार में आम आदमी की गाढ़ी कमाई क्यों नहीं बढ़ पा रही है? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार के अंदरूनी समीकरणों को बेहद बारीकी से समझना होगा।
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मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की चमक और उद्योगों का अंदरूनी हाल
अगस्त के आंकड़ों की गहराई में जाएं तो पता चलता है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ इस बार 9 फीसदी के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। इतना ही नहीं, बिजली और गैस आपूर्ति जैसे क्षेत्रों में भी 12.3 फीसदी की शानदार वृद्धि दर्ज की गई है। मोटर वाहन, कमर्शियल गाड़ियां, ऑटो पार्ट्स और इलेक्ट्रिकल उपकरणों के निर्माण में तो 25 से 30 फीसदी तक की धमाकेदार तेजी देखने को मिली है। इसके बावजूद बाजार में सुस्ती का माहौल क्यों बना हुआ है, इसका उत्तर इन उद्योगों के वित्तीय प्रदर्शन और कॉरपोरेट आय में छिपा होता है।
किसी भी देश का औद्योगिक उत्पादन यह बताता है कि सामान कितना बन रहा है, लेकिन यह इस बात की गारंटी नहीं देता कि उस सामान को बेचने वाली कंपनियों को उतना ही बंपर मुनाफा भी हो रहा है। कई बार बढ़ती लागत, कच्चे माल के महंगे दाम और कड़े मुकाबले की वजह से कंपनियों के मार्जिन पर दबाव आ जाता है। उत्पादन बढ़ने के बावजूद यदि कंपनियों का शुद्ध लाभ यानी नेट प्रॉफिट उस अनुपात में नहीं बढ़ता है, तो शेयर बाजार के निवेशक उस स्टॉक से दूरी बनाने लगते हैं या बिकवाली शुरू कर देते हैं।
इसके अलावा, औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों में कुछ क्षेत्र पिछड़ भी रहे हैं। उदाहरण के लिए, माइनिंग और क्वॉरिंग सेक्टर में अगस्त के दौरान 5.6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। जब अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मंदी या सुस्ती का सामना कर रहा हो, तो उसका असर चुनिंदा सेक्टरों के शेयरों पर भी साफ तौर पर दिखाई देता है, जिससे निवेशकों को कुल रिटर्न में कमी महसूस होती है।
ब्याज दरें, विदेशी निवेशकों की निकासी और बाजार का मूड
भारतीय शेयर बाजार की चाल सिर्फ देश के भीतर फैक्ट्रियों के उत्पादन पर निर्भर नहीं करती है, बल्कि इसके पीछे वैश्विक और वित्तीय कारक भी बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। मौजूदा समय में वैश्विक स्तर पर महंगाई, केंद्रीय बैंकों की ब्याज दरों से जुड़ी नीतियां और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का रुख बाजार की दिशा तय कर रहा है। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी बाजारों या अन्यिक विकल्पों की तरफ रुख करते हैं, तो बड़े शेयरों में बिकवाली दबाव बढ़ जाता है।
आम तौर पर खुदरा निवेशक उन शेयरों में पैसा लगाते हैं जो सेंसेक्स या निफ्टी के बड़े इंडेक्स का हिस्सा होते हैं। यदि ये दिग्गज शेयर विदेशी बिकवाली या अन्य कारणों से दबाव में रहते हैं, तो देश में कितनी भी अच्छी IIP ग्रोथ क्यों न आ जाए, सूचकांक ऊपर नहीं जाते हैं। यही वजह है कि मैक्रो-इकोनॉमिक डेटा यानी समष्टिगत आर्थिक आंकड़े और शेयर बाजार की चाल कई बार एक ही दिशा में नहीं चलते हैं, बल्कि उनमें एक अंतर या 'डिकपलिंग' देखने को मिलती है।
बाजार विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि खुदरा निवेशकों को यह समझना होगा कि शेयर बाजार भविष्य की संभावनाओं पर दांव लगाता है, जबकि IIP के आंकड़े बीते हुए महीने के प्रदर्शन को दर्शाते हैं। बाजार हमेशा आगे की अनिश्चितताओं को भांपकर चलता है, जबकि सरकारी आंकड़े पिछले महीने की वास्तविक स्थिति का लेखा-जोखा होते हैं।
खुदरा निवेशकों के लिए जरूरी सबक और वित्तीय अनुशासन
अर्थव्यवस्था की मजबूती और पोर्टफोलियो की सुस्ती के बीच फंसे छोटे निवेशकों के लिए यह दौर काफी धैर्य की परीक्षा लेने वाला है। जब बाजार में वैल्यूएशन अधिक होता है और चुनिंदा शेयरों में ही तेजी केंद्रित होती है, तब आम निवेशकों को अपनी कमाई बढ़ती हुई महसूस नहीं होती है। ऐसे समय में विशेषज्ञों की सलाह होती है कि निवेशकों को शॉर्ट-कट अपनाने के बजाय लंबी अवधि के नजरिए से निवेश करना चाहिए।
"अर्थव्यवस्था के बुनियादी आंकड़े और शेयर बाजार का रिटर्न हमेशा एक सीध में नहीं चलते। निवेशकों को किसी एक महीने के डेटा से घबराने या उत्साहित होने के बजाय अपने एसेट एलोकेशन और वित्तीय लक्ष्यों पर ध्यान देना चाहिए। दीर्घकालिक निवेश ही संपत्ति सृजन का सबसे पक्का रास्ता है।" — विवेक मल्होत्रा, वरिष्ठ वित्तीय विश्लेषक
इन्वेस्टमेंट एक्सपर्ट्स का मानना है कि छोटे निवेशकों को सेक्टर-स्पेशल फंड्स या चुनिंदा शेयरों के पीछे भागने के बजाय डाइव्हिफाइड म्यूचुअल फंड्स और सिप (SIP) के जरिए व्यवस्थित रूप से निवेश करना चाहिए। इससे बाजार के उतार-चढ़ाव का जोखिम कम हो जाता है और समय के साथ बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
निष्कर्ष: आने वाले दिनों में कैसी रह सकती है बाजार की चाल?
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि देश का औद्योगिक उत्पादन और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर मजबूत नींव पर खड़े हैं, जो आने वाले समय के लिए अच्छे संकेत हैं। जैसे-जैसे कंपनियों के तिमाही नतीजे बेहतर होंगे और फेस्टिव सीजन की मांग इन आंकड़ों में पूरी तरह से झलकेगी, उसका सकारात्मक असर बाजार पर भी पड़ सकता है। निवेशकों के लिए जरूरी यही है कि वे किसी भी तरह की अफवाहों से दूर रहें और अपनी वित्तीय योजनाओं को मजबूत आर्थिक बुनियाद के आधार पर ही आगे बढ़ाएं।







