तेल अवीव से ग्राउंड रिपोर्ट — इजराइल की राजनीति में इस समय भूचाल आया हुआ है। ठीक 20 दिन बाद देश में नए चुनाव होने हैं। हमास के अचानक हुए हमलों ने पूरे देश की सुरक्षा व्यवस्था को हिला दिया है। इस भयानक हमले के बाद इजराइल की जनता का मूड पूरी तरह बदल चुका है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है। सुरक्षा में चूक की वजह से नेतन्याहू को राजनीतिक मोर्चे पर भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
देश के मौजूदा राजनीतिक समीकरण तेजी से उलट-पुलट रहे हैं। युद्ध और सुरक्षा संकट के इस दौर में पारंपरिक वामपंथी दल काफी कमजोर हो गए हैं। इजराइल के मतदाता अब सुरक्षा को लेकर कोई भी जोखिम मोल नहीं लेना चाहते हैं। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में दक्षिणपंथी और कट्टर राष्ट्रवादी ताकतों का पलड़ा भारी नजर आ रहा है। देश का हर नागरिक इस समय केवल एक ही सवाल पूछ रहा है कि क्या खुफिया तंत्र की नाकामी के लिए सरकार की जवाबदेही तय होगी या नहीं।
नेतन्याहू की पकड़ कमजोर और राजनीतिक जमीन खिसक रही
बेंजामिन नेतन्याहू को इजराइल का सबसे ताकतवर नेता माना जाता रहा है। लेकिन सात अक्टूबर के बाद हालात बिल्कुल बदल गए हैं। जनता के बीच उनकी छवि को तगड़ा झटका लगा है। विपक्षी दल इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं और चुनाव प्रचार का मुख्य एजेंडा सुरक्षा चूक ही बन गया है। विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में नेतन्याहू का लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक सफर खत्म हो सकता है। गठबंधन की राजनीति में नए समीकरण बन रहे हैं और कई छोटे दल इस बार बाजी पलट सकते हैं।
सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे आम लोगों का कहना है कि सरकार ने जनता की सुरक्षा के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ किया है। तेल अवीव और येरुशलम की सड़कों पर लगातार सरकार विरोधी रैलियां हो रही हैं। बंधकों के परिवारों का दर्द और गुस्सा सीधे तौर पर चुनावी नतीजों को प्रभावित कर रहा है। नेतन्याहू के पास अपनी साख बचाने के लिए बहुत कम समय बचा है। विपक्षी नेता इस आपदा को एक बड़े राजनीतिक अवसर के रूप में भुनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।
अरब पार्टियों की बदलती भूमिका और चुनावी समीकरण
इस चुनाव में इजराइल की अरब पार्टियों की भूमिका भी बेहद अहम हो गई है। युद्ध के माहौल के बाद अरब नागरिकों और यहूदी बहुसंख्यक आबादी के बीच की खाई और गहरी हुई है। राजनीतिक दलों के बीच ध्रुवीकरण अपने चरम पर पहुंच चुका है। वामपंथी और उदारवादी दल जो शांति वार्ता की बात करते थे, उन्हें जनता का समर्थन नहीं मिल पा रहा है। लोग अब अधिक आक्रामक और सुरक्षा केंद्रित नेतृत्व चाहते हैं, जिससे चुनाव परिणाम पूरी तरह अप्रत्याशित हो सकते हैं।
मतदाता सूची में शामिल युवा वर्ग इस बार सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा। युवाओं का एक बड़ा हिस्सा मौजूदा नेतृत्व से बेहद नाराज है। वे बदलाव चाहते हैं लेकिन युद्ध की स्थिति के कारण कोई साफ विकल्प भी नहीं सूझ रहा है। आने वाले बीस दिन इजराइल के भविष्य की दिशा तय करेंगे। नेतन्याहू अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं और उनकी हर चाल पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।
युद्ध के साये में लोकतंत्र और भविष्य की अनिश्चितता
युद्ध के बीच चुनाव कराना अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती है। देश का एक बड़ा हिस्सा अब भी विस्थापित है और कई इलाकों में तनाव लगातार बना हुआ है। इसके बावजूद चुनाव आयोग ने तय समय पर मतदान कराने की पूरी तैयारी कर ली है। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके। इजराइल की जनता इस बार केवल सरकार नहीं चुन रही, बल्कि देश की सुरक्षा नीति का भविष्य तय कर रही है।
द फ्रीलान्स की टीम ग्राउंड जीरो से लगातार इन सभी राजनीतिक बदलावों पर नजर बनाए हुए है। जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, बयानों का दौर तेज होता जा रहा है। नेतन्याहू अपनी साख बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। लेकिन जमीन पर जो गुस्सा उबल रहा है, वह बताता है कि इस बार इजराइल की राजनीति में एक बहुत बड़ा फेरबदल होना लगभग तय है। चुनाव के नतीजे मध्य पूर्व की पूरी राजनीति को एक नई दिशा दे सकते हैं।


