नई दिल्ली से ग्राउंड ज़ीरो की विशेष रिपोर्ट: अंतरराष्ट्रीय राजनीति की शतरंज पर इन दिनों चालें बेहद तेजी से बदल रही हैं। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक बार फिर अपनी बेबाक और यथार्थवादी शैली में वैश्विक महाशक्तियों की असलियत दुनिया के सामने रख दी है। 'द फ्रीलान्स' की इस विशेष पड़ताल में हम यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे अमेरिकी रणनीतिक नीतियां उसे वैश्विक पटल पर अकेला कर रही हैं और दूसरी तरफ ड्रैगन यानी चीन अपनी आर्थिक व सामरिक ताकत का दायरा तेजी से बढ़ा रहा है।
होर्मुज संकट और अमेरिका का बढ़ता अकेलापन
पश्चिम एशिया के संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिका की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। हालिया कूटनीतिक हलकों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, अमेरिका को अपने पारंपरिक सहयोगियों जैसे जापान और ऑस्ट्रेलिया से भी अपेक्षित सैन्य व कूटनीतिक मदद मिलने से इनकार का सामना करना पड़ा है। ट्रंप प्रशासन के मंत्रियों और रणनीतिकारों ने भी अब यह स्वीकार करना शुरू कर दिया है कि संकट के इस दौर में भारत की कूटनीतिक और रणनीतिक ताकत का लोहा पूरी दुनिया मान रही है। अमेरिका का यह अकेलापन अचानक नहीं आया है, बल्कि यह दशकों की आक्रामक विदेश नीतियों का परिणाम है।
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एस. जयशंकर का कड़ा प्रहार: 'अमेरिका ने खुद को बनाया अकेली ताकत'
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने हालिया बयानों में इस बात पर जोर दिया है कि अमेरिका ने जानबूझकर और अपनी प्राथमिकताओं के तहत खुद को एक अकेली ताकत के रूप में ढाला है। जयशंकर के मुताबिक, बहुध्रुवीय (Multipolar) दुनिया के इस दौर में कोई भी एक देश अकेले पूरी दुनिया को नियंत्रित नहीं कर सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि वाशिंगटन की नीतियां अक्सर ऐसे हालात पैदा करती हैं जहां वह अपने ही सहयोगियों से कट जाता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर गठबंधन तेजी से टूट और नए सिरे से बन रहे हैं।
चीन की बढ़ती ताकत और वैश्विक रणनीतिक चुनौतियां
एक तरफ जहां पश्चिमी देश अंदरूनी राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, वहीं चीन ने अपनी महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड पहल और आक्रामक सामरिक विस्तार के जरिए वैश्विक प्रभाव क्षेत्र को काफी चौड़ा कर दिया है। बीजिंग लगातार उन खाली जगहों को भर रहा है जिन्हें अमेरिका या उसके सहयोगी छोड़ रहे हैं। विदेश मंत्री जयशंकर ने चीन के इस उभार को बहुत बारीकी से रेखांकित किया है। उनका मानना है कि भारत जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह समय अत्यधिक सतर्कता और रणनीतिक स्वायत्तता बरतने का है।
भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और भविष्य का प्रभाव
इन तमाम भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति (Strategic Autonomy) के दम पर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में अपनी जगह मजबूत कर ली है। न तो रूस के साथ पारंपरिक संबंधों से दूरी और न ही पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारियों से समझौता—भारत ने संतुलन का एक अनूठा उदाहरण पेश किया है। होर्मुज संकट से लेकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) तक, आज हर बड़ी ताकत नई दिल्ली के रुख का इंतजार करती है।
'कूटनीति में कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता, केवल स्थायी हित होते हैं।' जयशंकर के बयानों ने आज के भू-राजनीतिक परिदृश्य में इसी यथार्थ को फिर से जीवंत कर दिया है।
निष्कर्ष: बदलती दुनिया में भारत की भूमिका
अमेरिका के एकाधिकार के कमजोर होने और चीन के आक्रामक उभार के इस दौर में, भारत की भूमिका एक 'बैलेंसिंग पावर' की हो गई है। हमारी ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि आने वाले समय में वैश्विक कूटनीति का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को कितनी कुशलता से साधता है।








