नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आज का नजारा आम दिनों से पूरी तरह अलग है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विभिन्न संगठनों और कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन का ऐलान किया है। हालांकि दिल्ली पुलिस ने इस प्रदर्शन के लिए औपचारिक अनुमति नहीं दी है। अनुमति न मिलने के बाद से ही राजनीतिक हलकों और प्रदर्शनकारियों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक देश में अपनी बात रखने के अधिकार को दबाया जा रहा है।
घटनास्थल पर स्थिति को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों को भारी संख्या में तैनात किया गया है। जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग तक के पूरे इलाके को सुरक्षा छावनी में बदल दिया गया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कानून और व्यवस्था बनाए रखना उनकी पहली प्राथमिकता है। बिना अनुमति के किसी भी तरह की भीड़ को इकट्ठा होने की इजाजत नहीं दी जाएगी। पुलिस ने एहतियात के तौर पर कई रास्तों पर बैरिकेडिंग भी कर दी है।
प्रशासन का कड़ा पहरा और ड्रोन से निगरानी
सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने के लिए पुलिस प्रशासन आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है। आसमान में ड्रोन कैमरों के जरिए च चप्पे पर नजर रखी जा रही है ताकि किसी भी अप्रिय घटना से तुरंत निपटा जा सके। इसके अलावा स्थानीय पुलिस थानों के दलों को भी अलर्ट मोड पर रखा गया है। उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में तैलिक महासंघ के जिलाध्यक्ष को दिल्ली के इस प्रदर्शन में शामिल होने से रोकने के लिए घर में नजरबंद किए जाने की भी खबर सामने आई है, जिससे विरोध के सुर और तेज हो गए हैं।
कार्यकर्ता सौरव दास और अभिजीत दीपके जैसे नेताओं ने प्रशासन के इस रवैये पर तीखा ऐतराज जताया है। उनका साफ कहना है कि अगर आवाज दबाने की कोशिश की गई तो पूरा देश जंतर-मंतर बन जाएगा। नेताओं का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन सरकार के इशारे पर काम कर रहा है और जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का यह भी दावा है कि वे हर हाल में अपना विरोध दर्ज कराएंगे और पीछे हटने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
महिला पत्रकारों पर हमले के आरोप पर क्राइम ब्रांच की जांच
इस पूरे घटनाक्रम के बीच जंतर-मंतर से एक और गंभीर मामला सामने आया है। यहां पिछले दिनों कुछ महिला पत्रकारों के साथ कथित यौन हमले और बदसलूकी के आरोप लगे थे। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने जांच अब क्राइम ब्रांच को सौंप दी है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि वीडियो फुटेज और अन्य डिजिटल सबूतों के आधार पर आरोपियों की पहचान की जा रही है। इस घटना ने प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा और व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
दूसरी ओर, सोशल मीडिया और जमीन पर कुछ अन्य घटनाएं भी चर्चा का विषय बनी हुई हैं। जंतर-मंतर के पास पुलिस की बस को रोकने और कथित तौर पर रिया अहीर की नकल करने वाली एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर का मामला भी सामने आया है, जिसके बाद उसे ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है। इन तमाम घटनाओं और विवादों के बीच जंतर-मंतर का इलाका राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र बन गया है।
कानून व्यवस्था और अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस
जंतर-मंतर पर चल रहे इस खींचतान ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की आजादी और पुलिस प्रशासन के अधिकारों के बीच की बहस को जिंदा कर दिया है। एक तरफ जहां सरकार और पुलिस का तर्क है कि सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए प्रतिबंध जरूरी हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी नेता और सामाजिक कार्यकर्ता इसे तानाशाही रवैया बता रहे हैं। आने वाले घंटों में यह देखना अहम होगा कि क्या प्रदर्शनकारी अपनी योजना पर कायम रहते हैं या प्रशासन उन्हें रोकने में पूरी तरह कामयाब होता है। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है।




