जब कागजी दांवपेंच और प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार बन जाए आम आदमी का जीवन
देश के एक बड़े सूबे में विकास कार्यों के तमाम दावों और दावतों के बीच ऐसी कई बस्तियां आज भी मौजूद हैं, जहां आधुनिकता की बयार तो दूर, बुनियादी जरूरतों के लाले पड़े हुए हैं। जिला मुख्यालयों से लेकर ग्रामीण अंचलों तक सड़क, बिजली और पानी पहुंचाने के चाहे जितने भी दावे किए जाएं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी होती है। एक ऐसा ही बानगी भरा मामला उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले की एक वीरान पड़ी कॉलोनी का है, जहां बीते बारह से पंद्रह वर्षों से सैकड़ों परिवार नारकीय जीवन जीने को विवश हैं।
इस आधुनिक दौर में जहां लोग हाई-वे, एक्सप्रेस-वे और बुलेट ट्रेन की रफ्तार की बात करते हैं, वहीं इस बस्ती के लोग अपने घरों से बाहर निकलने के लिए घुटनों तक भरे गंदे पानी और कीचड़ भरी पगडंडियों का सामना करने को अभिशप्त हैं। बरसात के दिनों में हालात इतने बदतर हो जाते हैं कि लोगों का घर से बाहर निकलना तक दूभर हो जाता है। बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है और बुजुर्ग एवं बीमार लोग अपने ही घरों में कैद होकर रह जाते हैं। इस व्यवस्थागत नाकामी के पीछे सबसे बड़ा कारण प्रशासनिक उदासीनता और विभागों के बीच जिम्मेदारी का फेर है।
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अजीबोगरीब प्रशासनिक पेंच: न ग्रामीण इलाका, न नगर पालिका का हिस्सा
इस पूरी समस्या की जड़ एक ऐसा प्रशासनिक घालमेल है, जिसके चलते यह इलाका किसी भी विकास योजना के दायरे में नहीं आ पा रहा है। फर्रुखाबाद रोड से सटी हुई इस रिहायशी बस्ती को करीब पंद्रह साल पहले बसाया गया था, लेकिन विडंबना यह है कि इतने लंबे अरसे के बाद भी इसे आधिकारिक तौर पर स्थानीय नगर निकाय या नगर पालिका परिषद द्वारा अपने अधीन नहीं लिया गया है। परिणाम यह है कि ग्रामीण इलाकों के विकास के लिए आने वाला फंड यहां खर्च नहीं हो सकता और शहरी निकाय का हिस्सा न होने के कारण नगर पालिका भी यहां की जिम्मेदारी लेने से कन्नी काट लेती है।
स्थानीय नागरिकों का दर्द झलकता है जब वे बताते हैं कि वे हर चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं और नगर पालिका के चुनावों में वोट भी डालते हैं, लेकिन जब उनके अधिकारों और हक की बारी आती है, तो सिस्टम की फाइलें बंद हो जाती हैं। कॉलोनी में रहने वाले लोगों की सुधि लेने वाला कोई नहीं है। न तो क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि इस वीरान इलाके की तरफ रुख करते हैं और न ही प्रशासनिक अमले के किसी अधिकारी को यहां के बाशिंदों की सुध लेने की फुर्सत मिलती है।
बरसात आते ही तालाब बन जाती हैं गलियां, घरों में कैद हो जाती है जिंदगी
मौसम कोई भी हो, इस कॉलोनी के लोगों की मुसीबतें कभी कम नहीं होतीं। गर्मियों में धूल और गड्ढे परेशान करते हैं, तो मानसून की पहली बारिश के साथ ही यह पूरी बस्ती किसी डूबते हुए टापू जैसी नजर आने लगती है। सड़क और नाली का कोई नामोनिशान न होने के कारण बरसात का पानी गलियों में भर जाता है और देखते ही देखते लोगों के घरों के दरवाजों तक पहुंच जाता है। घुटनों तक भरे गंदे पानी में से गुजरकर रोजमर्रा का सामान लाना या बच्चों को स्कूल भेजना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता।
निवासियों का कहना है कि जलभराव की इस गंभीर समस्या के कारण आए दिन जहरीले जीवों के घरों में घुसने का खतरा बना रहता है। छोटे-छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर माता-पिता हमेशा सहमे रहते हैं। कई बार आपातकालीन स्थिति में जब किसी मरीज को अस्पताल ले जाना होता है, तो एंबुलेंस तक इस कॉलोनी के अंदर आने से कतराती है, क्योंकि यहां कोई पक्की सड़क ही नहीं है। इस अमानवीय स्थिति के बीच जीने को मजबूर इन परिवारों का धैर्य अब जवाब देने लगा है।
जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के चक्कर काटकर थक चुके हैं पीड़ित लोग
अपनी इस लाचारी को दूर करने के लिए कॉलोनी के लोगों ने प्रशासन के हर दरवाजे पर दस्तक दी है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्होंने मौजूदा चेयरमैन से लेकर तमाम प्रशासनिक अधिकारियों तक अपनी फरियाद पहुंचाई है। कई बार मुख्यमंत्री पोर्टल पर भी ऑनलाइन शिकायतें दर्ज कराई गईं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन के सिवाय हाथ कुछ नहीं लगा। नेताओं और अधिकारियों के झूठे दिलासों से तंग आ चुके इन नागरिकों का सिस्टम से भरोसा उठता जा रहा है।
"हम पिछले कई सालों से नरक जैसी जिंदगी जी रहे हैं। चुनाव के वक्त सभी नेता वोट मांगने आते हैं, लेकिन जीतने के बाद कोई यह देखने नहीं आता कि हम किस हाल में हैं। हमारी कॉलोनी को नगर पालिका में जोड़ने और सड़क बनवाने के लिए हमने हर जगह गुहार लगा ली, लेकिन सिवाय आश्वासन के कुछ नहीं मिला।"— राकेश कुमार सिंह (लालू), स्थानीय निवासी
इस प्रकार की उपेक्षा यह दर्शाती है कि आम नागरिकों के कल्याण के दावे कागजों तक ही सीमित क्यों रह जाते हैं। जब तक स्थानीय निकाय और जिला प्रशासन मिलकर इस इलाके की कानूनी स्थिति को स्पष्ट नहीं करेंगे और इसे नगर पालिका के दायरे में शामिल कर बुनियादी सुविधाएं मुमुहैया नहीं कराएंगे, तब तक इन दो सौ परिवारों का जीवन ऐसे ही संघर्षों के बीच गुजरता रहेगा।
सुरक्षा और भविष्य को लेकर बड़े सवाल, कब जागेगा प्रशासन?
गीतापुरम कॉलोनी के इन हालात ने स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जब एक ही शहर के भीतर सैकड़ों परिवार बुनियादी सुविधाओं से वंचित हों और जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लें, तो सुशासन के दावों पर सवाल उठना लाजिमी है। स्थानीय लोग अब केवल एक ही उम्मीद लगाए बैठे हैं कि राज्य सरकार या जिला प्रशासन का कोई संवेदनशील अधिकारी उनकी इस पीड़ा को समझेगा और इस कागजी उलझन को सुलझाकर उन्हें इस नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाएगा।
आने वाले दिनों में यदि इस क्षेत्र में सड़क निर्माण और जल निकासी की पुख्ता व्यवस्था नहीं की गई, तो जनता का आक्रोश सड़कों पर भी फूट सकता है। विकास की दौड़ में पीछे छूट चुके इन इंसानों का दर्द यह बयां करता है कि असली विकास तभी सार्थक माना जाएगा जब समाज के सबसे आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति तक उसकी बयार पहुंचेगी।








