सिनेमा के महागुरु मिथुन चक्रवर्ती का संघर्ष
भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में किसी कलाकार का स्टार बनना आसान नहीं होता। इसके पीछे बरसों की मेहनत, अनगिनत रातें और कभी न खत्म होने वाला संघर्ष छिपा होता है। आज के समय में 'महागुरु' के नाम से पहचाने जाने वाले दिग्गज अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती का सफर भी कुछ ऐसा ही असाधारण और प्रेरणादायक रहा है। पर्दे पर अपनी दमदार एक्टिंग और अनोखे डांस मूव्स से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले इस अभिनेता ने वह दौर भी देखा है, जहां दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था।
हाल ही में एक खास बातचीत के दौरान फिल्मी दुनिया के कई अनसुने और गहरे पन्नों से पर्दा उठा है। जाने-माने निर्देशकों और कलाकारों के बयानों ने एक बार फिर उस दौर की याद ताजा कर दी है, जब मिथुन चक्रवर्ती अपनी पहचान बनाने के लिए मायानगरी की सड़कों की धूल छान रहे थे। यह कहानी सिर्फ एक स्टार के कामयाब होने की नहीं है, बल्कि उस अटूट जि ल्दबाजी और हौसले की है जिसने नामुमकिन को मुमकिन बना दिखाया।
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जब एक वक्त के खाने के लिए नाचते थे परिवार के लोग
फिल्मी गलियारों में अक्सर संघर्ष की कहानियां सुनने को मिलती हैं, लेकिन कुछ किस्से रूह को झकझोर देते हैं। एक हालिया वीडियो व्लॉग में मशहूर फिल्ममेकर फराह खान ने मिथुन चक्रवर्ती के शुरुआती जीवन के दिनों को याद करते हुए एक ऐसा सच सामने रखा, जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह गया। फराह ने बताया कि उनके अंकल केके शुक्ला अमिताभ बच्चन के लिए स्क्रिप्ट लिखा करते थे। उस दौर में मिथुन चक्रवर्ती के पिता भी फिल्मी पार्टियों में सिर्फ इसलिए जाया करते थे ताकि उनके बेटे को रात का भरपेट खाना मिल सके।
फराह के मुताबिक, उस जमाने में हालात इतने तंग थे कि मिथुन के पिता उस परफॉर्मेंस के बदले कोई फीस नहीं मांगते थे, बल्कि उनका एकमात्र मकसद परिवार के लिए भोजन का इंतजाम करना होता था। यह ऐसा कड़ा यथार्थ था जो चमक-दमक भरी दुनिया के बिल्कुल उलट था। इस खुलासे ने साबित कर दिया कि स्टारडम की इस भव्य इमारत की नींव कितनी艱िनाइयों और आंसुओं पर टिकी हुई है।
फुटपाथ और बगीचों को बनाया था अपना आशियाना
जब फराह खान ने इन पुरानी बातों का जिक्र किया, तो मिथुन चक्रवर्ती ने खुद भी अपने संघर्ष के पन्नों को पलटा। उन्होंने बताया कि वह दौर केवल पैसों की तंगी का नहीं था, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई थी। अभिनेता ने साझा किया कि वह कई बार इतने थक जाते थे कि चलते-चलते ही सड़क के किनारे या किसी पार्क के बगीचे में सो जाते थे। जब सुबह उनकी आंख खुलती थी, तो आसमान के नीचे खुद को किसी फुटपाथ पर पाते थे।
"यह संघर्ष से भी आगे की बात है। मेरा मतलब है कि वह सड़कों पर, फुटपाथ पर सो चुका है। मैं सड़क पर, बगीचे में सोया हूं। कई बार चलते-चलते इतना थक जाता था कि फुटपाथ पर ही सो जाता था। जब मेरी आंख खुलती थी, तो मैं खुद को फुटपाथ पर पाता था।" — मिथुन चक्रवर्ती, अभिनेता
इस तरह के अनुभव किसी भी इंसान को अंदर से या तो तोड़ देते हैं या फिर फौलाद बना देते हैं। मिथुन ने इस कठिनाई को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल दिया। उन्होंने हर अपमान और हर ठोकर से सीख ली और आगे बढ़ते चले गए।
जूनियर आर्टिस्ट से मेगास्टार बनने का अद्भुत सफर
सिनेमा के इतिहास में बहुत कम ऐसे नाम दर्ज हैं जिन्होंने अपनी शुरुआत बिल्कुल निचले पायदान से यानी एक अदना से जूनियर आर्टिस्ट के रूप में की हो और बाद में बॉक्स ऑफिस के बेताज बादशाह बने हों। फराह खान ने भी इस बात पर जोर दिया कि मिथुन इस इंडस्ट्री के इकलौते ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने ग्राउंड जीरो से उठकर यह मुकाम हासिल किया है। साल 1976 में मृणाल सेन के निर्देशन में बनी कलात्मक और राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली फिल्म 'मृगया' से उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखा।
हालांकि, असली मास अपील उन्हें साल 1979 में आई स्पाई थ्रिलर फिल्म 'सुरक्षा' से मिली। इस फिल्म ने उनके करियर की गाड़ी को ऐसी रफ्तार दी कि उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अस्सी के दशक में तो मिथुन चक्रवर्ती का ऐसा सिक्का चला कि वह बॉलीवुड के सबसे व्यस्त कलाकारों की सूची में सबसे ऊपर आ गए। 'डिस्को डांसर', 'डांस डांस', 'प्यार झुकता नहीं' और 'कसम पैदा करने वाले की' जैसी फिल्मों ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया।
एक दिन में चार फिल्मों की शूटिंग और बेजोड़ कार्यशैली
अस्सी का दशक पूरी तरह से मिथुन चक्रवर्ती के नाम रहा था। आलम यह था कि वह एक ही वक्त में दर्जनों फिल्मों में साइन किए जा रहे थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उस सुनहरे दौर में उन्होंने एक दशक के भीतर सौ से ज्यादा फिल्मों में काम किया। कई बार ऐसा भी वक्त आया जब वह एक ही दिन में अलग-अलग शिफ्ट्स में चार-चार फिल्मों की शूटिंग संभालते थे। न सिर्फ हिंदी सिनेमा बल्कि बंगाली और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी उनका जलवा लगातार कायम रहा।
हिंदी सिनेमा के अलावा उन्होंने क्षेत्रीय सिनेमा को भी नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनके काम के प्रति इस समर्पण ने उन्हें सहकर्मियों और निर्माताओं की पहली पसंद बना दिया। गौरांग चक्रवर्ती से लेकर 'मिथुन दा' और फिर 'महागुरु' बनने का यह सफर इस बात का सुबूत है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी परिस्थिति इंसान को उसके लक्ष्य से नहीं डिगा सकती।
जब शाहरुख खान की फिल्म के सेट पर मच गई थी भगदड़
मिथुन चक्रवर्ती के स्टारडम का आलम यह है कि आज भी जब वह किसी सेट पर पहुंचते हैं, तो वहां मौजूद लोगों का उत्साह देखने लायक होता है। फराह खान ने शाहरुख खान की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'ओम शांति ओम' के मशहूर गाने 'दीवानगी दीवानगी' की शूटिंग का एक दिलचस्प किस्सा साझा किया। इस गाने में बॉलीवुड के करीब 32 दिग्गज कलाकार एक साथ नजर आए थे। लेकिन जब सेट पर मिथुन चक्रवर्ती की एंट्री हुई, तो वहां का माहौल पूरी तरह बदल गया।
फराह ने बताया कि सेट पर मौजूद लाइटमैन, कैमरामैन और अन्य तकनीकी कर्मचारी अपने काम छोड़कर मिथुन दा के साथ तस्वीरें खिंचवाने के लिए दौड़ पड़े। स्थिति ऐसी हो गई थी कि खुद सुपरस्टार शाहरुख खान को उन सभी लोगों के लिए कैमरा थामना पड़ा ताकि कोई निराश न लौटे। उस गाने में एक दृश्य दिखाया गया है जहां एक महिला फैन दीवानगी के मारे बेहोश होकर गिर जाती है, और फराह का कहना है कि वह कोई काल्पनिक सीन नहीं था, बल्कि सेट पर उस दिन वास्तव में वैसा ही माहौल बन गया था।
पद्म भूषण और दादासाहेब फाल्के सम्मान तक का सफर
अपने करियर के दौरान तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और चार बार फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने वाले मिथुन चक्रवर्ती ने अभिनय के साथ-साथ एक सफल उद्यमी और निर्माता के रूप में भी अपनी पहचान बनाई है। हिंदी के साथ-साथ भोजपुरी, तेलुगु, तमिल, कन्नड़, पंजाबी और बंगाली फिल्मों में अपने अभिनय का परचम लहराने वाले इस दिग्गज को साल 2024 में देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान 'पद्म भूषण' से नवाजा गया। इसके साथ ही भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें 'दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड' से भी सम्मानित किया गया।
फुटपाथ की रातों से शुरू हुआ यह सफर आज देश के सबसे बड़े सम्मानों तक जा पहुंचा है। मिथुन चक्रवर्ती की यह जीवनी उन तमाम नौजवानों के लिए एक खुली किताब की तरह है जो अभावों के बीच बड़े सपने देखने की हिम्मत रखते हैं। उनका जीवन सिखाता है कि सफलता किस्मत से नहीं, बल्कि खून-पसीने की मेहनत और कभी न हार मानने वाले जज्बे से हासिल होती है।









