नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली से लेकर तमाम राजनीतिक मंचों पर इन दिनों हलचल बहुत तेज है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सार्वजनिक जीवन और प्रशासनिक पदों पर रहते हुए अपने 25 साल पूरे कर लिए हैं। इस बीच उनके भाषणों और बयानों की गूंज हर तरफ सुनाई दे रही है। हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अपने संकल्प को दोहराते हुए कहा कि वे भारत के विकास के लिए न तो कभी थकेंगे और न ही रुकेंगे। उनके इस बयान और 'वी विल डू इट' वाले अंदाज ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
लेकिन इस सियासी चमक-धमक के बीच देश की संसद से आ रही खबरें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। संसद का मानसून सत्र समाप्त होने के बाद से कामकाज ठप सा पड़ा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार संसद बिना किसी बैठक के इतने लंबे समय तक बंद रही है कि पिछले 37 साल का पुराना रिकॉर्ड टूट गया है। देश के सर्वोच्च कानून बनाने वाले सदन की इस खामोशी पर आम जनता और राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं। एक तरफ सरकार अपने कामों का हिसाब दे रही है, तो दूसरी तरफ विधाई कार्यों की यह लंबी छुट्टी कई बड़े सवाल खड़े कर रही है।
संसद की लंबी खामोशी और टूटा 37 साल का रिकॉर्ड
संसदीय मामलों पर नजर रखने वाले जानकारों का कहना है कि संसद का इतने दिनों तक बिना बैठक के चलना देश के लोकतांत्रिक इतिहास में एक बड़ी घटना है। नियम और परंपराओं के मुताबिक सदन के सत्र और कामकाज का एक तय शेड्यूल होता है। लेकिन मौजूदा हालात में नीतिगत फैसले और जरूरी विधेयकों पर चर्चा का दायरा सिमटता दिख रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों से सांसद अपने अपने क्षेत्रों में लौट चुके हैं, लेकिन संसद के गलियारों में पसरा यह सन्नाटा जनता के बीच चर्चा का मुख्य विषय बन गया है। विपक्षी दल इसे सरकार की उदासीनता करार दे रहे हैं।
इस बीच दिल्ली की सड़कों पर राजनीतिक सरगर्मी एक अलग रूप में दिखाई दे रही है। वामपंथी दलों और कुछ अन्य राजनीतिक संगठनों ने राजधानी में एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की है। इस दौरान उन्होंने सरकार के खिलाफ तीखा हमला बोलते हुए पुराने आंदोलनों की याद दिलाई। नेताओं ने दो टूक शब्दों में कहा कि उन्होंने पहले भी अपनी ताकत के बल पर सरकार को झुकाया था और वे अपनी मांगों को मनवाने के लिए फिर से सड़कों पर उतरेंगे। प्रदर्शनकारियों का यह तेवर आने वाले दिनों में किसी बड़े राजनीतिक टकराव का संकेत दे रहा है।
सड़कों पर उतरने की तैयारी और वाम दलों की हुंकार
राजधानी दिल्ली में आयोजित इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक नीतियों को लेकर सरकार को घेरा गया। संगठनों का कहना है कि आम आदमी की आवाज को दबाया जा रहा है और संसद में बहस के दरवाजे बंद किए जा रहे हैं। ऐसे में उनके पास सड़कों पर संघर्ष करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। पुलिस और प्रशासन भी इन संभावित प्रदर्शनों को लेकर पूरी तरह सतर्क हो गया है और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी तैयारियों में जुट गया है ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके।
स्थानीय स्तर पर भी राजनीतिक उठापटक कम नहीं है। विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों से लगातार नए राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की मांगें सामने आ रही हैं। हाल ही में हिंदू क्रांति दल जैसे संगठनों ने भी अपनी खास मांगों को लेकर आवाज उठाई है और स्थानीय प्रशासन पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। ये क्षेत्रीय मांगें राष्ट्रीय राजनीति के बड़े परिदृश्य के साथ मिलकर देश के चुनावी और सामाजिक ताने-बाने को लगातार प्रभावित कर रही हैं।
विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच संतुलन
एक तरफ जहां सरकार देश को दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बनाने और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर सुलगते हुए मुद्दे सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां पेश कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के 25 साल के सफर और उनके भविष्य के संकल्पों का जनता पर क्या असर होगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन फिलहाल संसद की बंदी और सड़कों पर सुलग रहे विरोध प्रदर्शनों ने देश की राजनीति को बेहद दिलचस्प मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जिस पर हर देशवासी की पैनी नजर बनी हुई है।





