भारतीय राजनीति में तीसरे वर्ष का अभिशाप और ऐतिहासिक सबक
स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास पर नजर डालें तो जनवरी 1966 में इंदिरा गांधी के राजनीतिक उभार से लेकर आज तक, लगभग हर प्रमुख सरकार ने अपने शासनकाल के तीसरे वर्ष में आकर भारी दबाव और ठहराव का सामना किया है। यह वह समय होता है जब शुरुआती जोश और लोकलुभावन वादों का असर कम होने लगता है, और जनता के बीच सत्ता विरोधी रुझान दबी जुबान से ही सही, बाहर आने लगते हैं। इतिहास गवाह है कि केवल वही सियासी नेतृत्व इस चक्रव्यूह से बाहर निकल पाए जिन्होंने वक्त की नजाकत को समझते हुए अपनी नीतियों और कार्यशैली में बड़े बदलाव किए।
उदाहरण के लिए, वर्ष 1969 में इंदिरा गांधी ने अपनी ही पार्टी के भीतर आंतरिक कलह का सामना करते हुए ऐतिहासिक विभाजन का रास्ता चुना और वामपंथी झुकाव के जरिए अपनी जमीन बचाई। हालांकि, इसके बावजूद व्यवस्थागत दबाव पूरी तरह टले नहीं। इसी तरह, राजीव गांधी को 1984 के आम चुनाव में 415 सीटों का प्रचंड बहुमत मिला था, लेकिन महज तीन साल यानी 1987 तक पहुंचते-पहुंचते उनकी सरकार भी अपनी दिशा और प्रशासनिक पकड़ खोती चली गई। पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 1991 के आर्थिक उदारीकरण के साथ शानदार शुरुआत की, मगर 1993 तक आते-आते अयोध्या विवाद और राजनीतिक उठापटक के कारण सरकार की चूलें हिल गईं।
मौजूदा राजनीतिक दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भी कुछ इसी तरह की परिस्थितियां आकार ले रही हैं। हालांकि, पिछले दो कार्यकालों की बात करें तो पहले कार्यकाल में नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट जैसी घटनाओं ने राजनीतिक नैरेटिव को पूरी तरह बदल दिया था। लेकिन दूसरे कार्यकाल में ऐसा कोई नाटकीय मोड़ नहीं आया, जिसका परिणाम 2024 के लोकसभा चुनावों में बहुमत के आंकड़े से पीछे रहने के रूप में सामने आया। अब वर्तमान कार्यकाल का तीसरा वर्ष एक बार फिर रणनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर कड़ी अग्निपरीक्षा बनकर खड़ा है।
संबंधित खबरें
चुनाव आयोग की भूमिका और संस्थान की गरिमा पर छिड़ी बहस
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता हमेशा से इसकी सबसे बड़ी ताकत रही है। देश के मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संविधान के सबसे सुरक्षित और संरक्षित पदों में शुमार होता है, जहां उन्हें आसानी से पदमुक्त नहीं किया जा सकता। हालिया समय में ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल और चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर जिस प्रकार की तीखी प्रतिक्रियाएं और सार्वजनिक बहसें देखने को मिल रही हैं, उसने इस संवैधानिक संस्था को एक बार फिर केंद्र में ला खड़ा किया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि देश के चुनाव आयुक्तों का इतिहास अमूमन शांत और गरिमामई रहा है। टीएन शेषन जैसे गिने-चुने नामों को छोड़कर अधिकांश मुख्य चुनाव आयुक्त बिना किसी बड़े विवाद के अपना कार्यकाल पूरा करके विदा हुए। वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष भी आने वाले महीनों में कई राज्यों के महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों की निष्पक्ष निगरानी की बड़ी जिम्मेदारी है। यदि चुनाव परिणामों में किसी भी प्रकार का विवाद उत्पन्न होता है, तो उसकी सीधी आंच चुनाव आयोग की साख और केंद्र सरकार दोनों पर आ सकती है।
"देश के चुनाव आयोग और संवैधानिक संस्थानों की गरिमा को बनाए रखना हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल शर्त है, जिस पर किसी भी परिस्थिति में आंच नहीं आनी चाहिए।" — वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
आर्थिक विकास बनाम रोजगार: आम आदमी की जेब का सच
एक तरफ जहां देश की समग्र आर्थिक वृद्धि दर संतोषजनक बनी हुई है, वहीं दूसरी तरफ आम आदमी के स्तर पर धरातलीय वास्तविकताएं कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। रोजगार के नए अवसरों का सृजन और वेतन वृद्धि की रफ्तार उस गति से नहीं बढ़ रही है जितनी तेजी से महंगाई और जीवनयापन का खर्च बढ़ रहा है। यही वह बिंदु है जहां सबसे अधिक नाराजगी और जन असंतोष जन्म लेता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि थकी हुई और पुरानी नीतियों पर चल रही सरकारों के लिए यह सबसे कमजोर कड़ी साबित होती है। राज्यों के स्तर पर कई मुख्यमंत्रियों का सुस्त नेतृत्व और प्रशासनिक मशीनरी की सुस्ती भी केंद्र सरकार के लिए चिंता का विषय बन रही है। जब तक जमीनी स्तर पर रोजगार और आर्थिक राहत के ठोस परिणाम दिखाई नहीं देंगे, तब तक नीतिगत उपलब्धियों को जनता के बीच प्रभावी ढंग से स्थापित करना कठिन होगा।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की जटिल भूलभुलैया और वैश्विक चुनौतियां
घरेलू मोर्चे के साथ-साथ वैश्विक कूटनीति के स्तर पर भी भारत के सामने आने वाले दिन बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग की आक्रामक नीतियां और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बनते नए समीकरणों के बीच भारत को बेहद सधी हुई विदेश नीति अपनानी होगी। पारंपरिक कूटनीतिक समझौतों और महाशक्तियों के आपसी समीकरणों के इस दौर में संतुलन साधना आसान नहीं होगा।
वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति मजबूत जरूर है, लेकिन बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच देश के रणनीतिक हितों की रक्षा करना विदेश मंत्रालय के लिए एक बड़ी परीक्षा होगी। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से लेकर रक्षा और व्यापारिक समझौतों तक, हर कदम पर फूंक-फूंक कर कदम रखने की आवश्यकता है ताकि देश की आर्थिक और सामरिक सुरक्षा अभेद्य बनी रहे।
आगामी विधानसभा चुनावों का चक्रव्यूह और राजनीतिक रणनीतियां
केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ दल के लिए आने वाला समय चुनावी लिहाज से बेहद व्यस्त रहने वाला है। उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों के बाद कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राजनीतिक रूप से अत्यधिक संवेदनशील राज्यों में चुनाव होने हैं। इन सभी राज्यों के चुनावी परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर गहरा असर पड़ेगा।
यदि इन चुनावों में विपक्षी दल सफलता हासिल करते हैं, तो वे इसे मोदी सरकार के पतन की शुरुआत के रूप में प्रचारित करेंगे। वहीं, यदि सत्तारूढ़ दल जीत दर्ज करता है, तो चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने का नया दौर शुरू हो जाएगा। सकारात्मक पक्ष यह है कि फिलहाल पार्टी संगठन, सहयोगी दल और मंत्रिमंडल पूरी तरह एकजुट हैं और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर कोई आंतरिक चुनौती नहीं है, जो इस मुश्किल दौर में सबसे बड़ा संबल साबित हो सकती है।







