नई दिल्ली/कीव — दुनिया भर में सैटेलाइट इंटरनेट का सपना दिखाने वाले एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक इस समय बड़े विवाद के घेरे में आ गई है। पूर्वी यूरोप के युद्धक्षेत्र यूक्रेन से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है जहाँ यूक्रेन की सेना के लिए जीवन रेखा माने जाने वाले स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड में भारी कटौती कर दी गई है। इस अचानक हुए बदलाव से रूस के खिलाफ जंग लड़ रही यूक्रेनी सेना के जमीनी ऑपरेशनों पर सीधा असर पड़ा है। मोर्चे पर तैनात सैनिक और कमांडर समय पर डेटा साझा नहीं कर पा रहे हैं, जिससे उनकी सामरिक क्षमता कमजोर होती दिख रही है। मस्क के इस कदम ने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या निजी हाथों में मौजूद तकनीक युद्ध के मैदान में किसी भी देश को संकट में डाल सकती है।
यूक्रेनी मीडिया और रक्षा सूत्रों के अनुसार, जब देश की सेना रूस के खिलाफ अपने सबसे संवेदनशील अभियानों को अंजाम दे रही थी, ठीक उसी समय इंटरनेट की रफ्तार बहुत धीमी हो गई। स्टारलिंक के जरिए ड्रोन को नियंत्रित करना और दुश्मन की हरकतों पर नजर रखना आसान होता है, लेकिन स्पीड घटने से ये सभी तकनीकें बीच रास्ते में ही हांफने लगीं। यूक्रेन के अधिकारियों ने कई बार कंपनी से संपर्क साधा, लेकिन स्पष्ट तकनीकी कारण या तो बताए नहीं गए या फिर वे नाकाफी साबित हुए। जानकारों का मानना है कि एलन मस्क की नीतियां और उनके निजी फैसले किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को एक झटके में हिला सकते हैं। इस घटना के बाद से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस तेज हो गई है कि क्या युद्ध जैसे हालात में प्राइवेट कंपनियों पर पूरी तरह भरोसा करना सुरक्षित है या नहीं।
भारत में स्टारलिंक की एंट्री पर क्यों उठे नए सवाल
इस पूरी घटना का असर केवल यूक्रेन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा कनेक्शन भारत से भी जुड़ रहा है। एलन मस्क की कंपनी भारत सरकार से लाइसेंस हासिल करने की कोशिश में जुटी है ताकि देश के दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में हाई-स्पीड सैटेलाइट इंटरनेट पहुंचाया जा सके। भारत के टेलीकॉम बाजार में पहले से ही रिलायंस जियो, एयरटेल और वोडाफोन जैसी बड़ी कंपनियां मौजूद हैं, जो सस्ते और भरोसेमंद प्लान देती हैं। लेकिन मस्क की सर्विस आने से सीधे आसमान से बिना टावर के इंटरनेट मिलने का दावा किया जा रहा है। यूक्रेन में हुई ताजा घटना के बाद भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और नीति निर्माताओं की नींद उड़ गई है। सवाल यह उठ रहा है कि अगर कल को भारत की सुरक्षा या कूटनीतिक मोर्चे पर कोई तनाव पैदा होता है, तो क्या मस्क अपनी मर्जी से भारत में भी इंटरनेट की स्पीड घटा सकते हैं या सर्विस बंद कर सकते हैं।
भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी ट्राई और देश के गृह मंत्रालय के सामने अब सबसे बड़ा सिरदर्द यह तय करना है कि विदेशी सैटेलाइट कंपनियों को देश की सरजमीं पर कितना नियंत्रण दिया जाए। भारत में नियम बहुत सख्त हैं और हर कंपनी को डेटा लोकलाइजेशन यानी देश के भीतर ही सर्वर लगाने की शर्त माननी पड़ती है। मस्क की कंपनी पहले इन शर्तों को लेकर थोड़ा हिचकिचा रही थी, लेकिन अब भारत के विशाल बाजार को देखते हुए वे झुकने को तैयार दिख रहे हैं। इसके बावजूद यूक्रेन के अनुभव से यह सबक साफ मिलता है कि अंतरिक्ष आधारित तकनीक पर पूरी तरह निर्भर होना खतरनाक हो सकता है। भारत जैसे विशाल और संवेदनशील देश में राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किए बिना किसी भी विदेशी प्लेयर को अनुमति देना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
युद्ध के मैदान से लेकर कॉर्पोरेट गलियारों तक मस्क की दादागिरी
एलन मस्क हमेशा से अपने फैसलों के लिए जाने जाते हैं, चाहे वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स को खरीदना हो या फिर स्पेसएक्स के रॉकेट लॉन्च करना। लेकिन यूक्रेन में जो हुआ उसने यह दिखा दिया है कि एक अकेला कारोबारी किस हद तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति और युद्ध के नतीजों को प्रभावित कर सकता है। जब युद्ध की शुरुआत हुई थी, तब मस्क ने खुद यूक्रेन को मुफ्त में हजारों स्टारलिंक टर्मिनल भेजे थे और इसे मदद का बड़ा जरिया बताया था। लेकिन वक्त के साथ खर्चे बढ़ने और सामरिक जिम्मेदारियों के उलझनों के बीच अब सेवाओं में कटौती की खबरें आने लगी हैं। आलोचकों का कहना है कि मस्क अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं और मूड के हिसाब से स्विच ऑन और ऑफ का खेल खेल रहे हैं, जो किसी भी संप्रभु देश के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता।
भारत के आम उपभोक्ताओं के लिए स्टारलिंक का आना एक नए तकनीकी युग की शुरुआत जैसा लग सकता है, जहां बिना किसी फाइबर या केबल के सीधे आसमान से तेज इंटरनेट मिलेगा। लेकिन इस सुविधा की कीमत कितनी चुकानी पड़ सकती है, इसका अंदाजा यूक्रेन के संकट से लगाया जा सकता है। भारत के आम नागरिक जब इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे, तो वे चाहेंगे कि उनकी सेवा हमेशा चालू रहे और उस पर किसी बाहरी दबाव का साया न हो। देश के बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मस्क को भारत में अपने कदम जमाने के लिए यहां के नियमों का पूरी सख्ती से पालन करना होगा। सरकार भी यह सुनिश्चित करने में जुटी है कि देश की डिजिटल रीढ़ किसी विदेशी अरबपति के हाथ की कठपुतली न बने।
आगे क्या होगा और भारत सरकार का अगला कदम
आने वाले हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि भारत सरकार स्टारलिंक को देश में काम करने का लाइसेंस देती है या नहीं। केंद्रीय संचार मंत्रालय सभी सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर इस मामले की अंदरूनी जांच कर रहा है। यूक्रेन के संकट ने दुनिया भर के देशों को यह सिखा दिया है कि अंतरिक्ष और तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना कितना जरूरी है। भारत ने भी अपने खुद के सैटेलाइट कम्युनिकेशंस नेटवर्क को मजबूत करने पर जोर देना शुरू कर दिया है ताकि भविष्य में किसी भी बाहरी कंपनी की मनमानी से बचा जा सके। 'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड पड़ताल से यह स्पष्ट है कि तकनीक और सुरक्षा का यह खेल अभी और लंबा चलेगा, और भारत इस मामले में कोई भी जोखिम उठाने के मूड में बिल्कुल नहीं है।



