वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत का बड़ा रुख और अमेरिकी टैरिफ का साया
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के पटल पर इन दिनों ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई है। अमेरिका की ओर से रूस और ईरान जैसे देशों से तेल आयात करने वाले राष्ट्रों पर भारी-भरकम शुल्क यानी 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने के नए विधायी प्रस्तावों पर चर्चा गर्म है। इस बीच, भारत सरकार ने अपनी विदेश नीति और आर्थिक प्राथमिकताओं को लेकर एकदम बेबाक रुख अपना लिया है। नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि वह बाहरी दबावों के आगे झुककर अपनी ऊर्जा सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद उपजे वैश्विक प्रतिबंधों के दौर में भारत ने रणनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए किफायती दरों पर रूसी कच्चा तेल आयात किया। इस कदम से न केवल देश के भीतर पेट्रोल और डीजल की कीमतें नियंत्रण में रखने में मदद मिली, बल्कि घरेलू महंगाई को भी एक बड़े झटके से बचाया गया। अब जब अमेरिकी नीति के तहत नए प्रतिबंधों और शुल्कों की तलवार लटक रही है, तो भारत का यह कड़ा रुख दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों का ध्यान आकर्षित कर रहा है।
देश की वित्तीय कमान संभालने वाली केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस पूरे घटनाक्रम पर सरकार की स्थिति एकदम स्पष्ट कर दी है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया के तमाम देश अपनी ऊर्जा नीतियों को नए सिरे से परिभाषित करने में जुटे हैं और भू-राजनीतिक समीकरण हर रोज बदल रहे हैं।
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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का दो टूक बयान: अचानक बंद नहीं हो सकता आयात
हाल ही में आयोजित 'बिजनेसलाइन चेंजमेकर अवॉर्ड्स' कार्यक्रम के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बेहद मुखर अंदाज में देश की ऊर्जा नीति की वकालत की। उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि भारत सरकार रातों-रात या अचानक रूस से कच्चे तेल का आयात बंद करने का जोखिम नहीं उठा सकती। साथ ही, उन्होंने यह भी जोड़ा कि इतनी बड़ी मात्रा में ऊर्जा आपूर्ति के लिए तुरंत किसी अन्य वैकल्पिक सप्लायर पर पूरी तरह शिफ्ट हो जाना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
वित्त मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि निर्णय लेते वक्त देश की भौगोलिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को ध्यान में रखना सबसे जरूरी है। भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा का निरंतर प्रवाह केवल एक कारोबारी सौदा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता की रीढ़ है। यदि अचानक से ऐसे आपूर्ति मार्गों को बाधित किया जाता है, तो इसका सीधा असर आम आदमी की जेब और देश के औद्योगिक उत्पादन पर पड़ेगा।
सरकार का यह पक्ष यह भी रेखांकित करता है कि भारत की विदेश नीति पूरी तरह से स्वायत्त है और वह अपने नागरिकों के आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर ही फैसले लेती है, न कि किसी बाहरी महाशक्ति के दबाव में।
"हम देश की 140 करोड़ आबादी की ऊर्जा जरूरतों और घरेलू सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं कर सकते। भारत अचानक रूस से कच्चा तेल खरीदना न तो बंद कर सकता है और न ही तुरंत दूसरे सप्लायर्स पर शिफ्ट हो सकता है। हमारे लिए देशहित सबसे ऊपर है।" — निर्मला सीतारमण, केंद्रीय वित्त मंत्री
140 करोड़ भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू बाजार का संतुलन
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक देश है। देश की कुल जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से मंगाया जाता है। ऐसे में यदि आयात के स्रोतों में अचानक कोई बड़ा व्यवधान आता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी आघात लग सकता है। वित्त मंत्री ने अपने संबोधन में इसी बुनियादी वास्तविकता को रेखांकित किया कि देश की 140 करोड़ जनता की रसोई, गाड़ियां और कारखाने सुचारू रूप से चलते रहें, इसके लिए ऊर्जा के सस्ते और भरोसेमंद स्रोत बेहद आवश्यक हैं।
पिछले कुछ वर्षों में, रूस से रियायती दरों पर मिलने वाले कच्चे तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को काफी राहत दी है। इस आयात के जरिए देश की सरकारी और निजी तेल कंपनियों ने भारी विदेशी मुद्रा बचाई है, जिसका लाभ अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचा है। यदि इन सप्लाइ लाइन्स को अचानक काट दिया जाता, तो घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतें आसमान छूने लगतीं, जिससे ट्रांसपोर्टेशन महंगा होता और हर रोज इस्तेमाल होने वाली चीजों के दाम भी बढ़ जाते।
अर्थशास्त्रियों का भी यही मानना है कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए महंगाई पर लगाम कसना सर्वोच्च प्राथमिकता है। वैश्विक उथल-पुथल के बीच ऊर्जा की कीमतों में स्थिरता बनाए रखना देश के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है।
दुनिया के हर कोने से तेल खरीदने की खुली नीति
भारत ने अपनी कूटनीतिक स्वतंत्रता का परिचय देते हुए यह संदेश भी दे दिया है कि वह किसी एक देश या गुट के पाले में बंधकर नहीं रहने वाला है। वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत दुनिया के हर उस हिस्से से तेल खरीदेगा जहां से यह आसानी से, सुगमता से और सबसे उपयुक्त शर्तों पर उपलब्ध होगा। यह नीतिगत दृष्टिकोण भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' (बहु-संरेखण) की विदेश नीति का सटीक उदाहरण है, जहां संबंध सभी से रखे जाते हैं लेकिन प्राथमिकता हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों को दी जाती है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, पश्चिमी देश चाहते हैं कि रूस पर आर्थिक शिकंजा कसने के लिए सभी देश उससे दूरी बना लें। लेकिन भारत जैसे विकासशील और विशाल राष्ट्र के सामने अपनी ऊर्जा सुरक्षा की बड़ी नैतिक और व्यावहारिक बाध्यता है। नई दिल्ली ने कई मंचों से यह बात साबित की है कि वह अपने नागरिकों के हितों की कीमत पर पश्चिमी देशों के राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा नहीं बनेगा।
आने वाले दिनों में अमेरिका और पश्चिमी देशों की तरफ से इस रुख पर किस तरह की प्रतिक्रिया आती है, यह देखना दिलचस्प होगा। हालांकि, भारत के नीति-निर्माताओं ने अपनी प्राथमिकताओं को लेकर दुनिया के सामने एकदम स्पष्ट रेखा खींच दी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए राष्ट्रीय हित ही सर्वोपरि है।








