संसद से सर्वोच्च अदालत तक विपक्ष का मार्च और गरमाई सियासत
देश की राजधानी दिल्ली में एक बार फिर राजनीतिक पारा अपने उफान पर है। संसद के शीतकालीन सत्र और अन्य राष्ट्रीय मुद्दों के बीच विपक्ष के तेवर लगातार आक्रामक बने हुए हैं। इसी कड़ी में विपक्षी दलों के नेताओं ने संसद परिसर से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक एक मार्च निकाला। इस मार्च का उद्देश्य विभिन्न राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दों पर सरकार को घेरना तथा न्यायपालिका का ध्यान आकर्षित करना बताया गया। हालांकि, इस राजनीतिक कदम ने सत्ता पक्ष को एक बार फिर आक्रामक होने का पूरा मौका दे दिया है।
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने विपक्ष के इस प्रदर्शन को पूरी तरह से राजनीतिक स्टंट करार दिया है। सत्ताधारी दल का कहना है कि संसद भवन जैसी देश की सर्वोच्च विधायी संस्था को छोड़कर इस प्रकार सड़कों पर मार्च निकालना केवल अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की एक हताश कोशिश मात्र है। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा दोनों पक्षों के बीच बहस का एक बड़ा केंद्र बनने जा रहा है, जिससे संसद की कार्यवाही पर भी असर पड़ सकता है।
निशिकांत दुबे का राहुल गांधी पर अब तक का सबसे तीखा हमला
विपक्ष के इस मार्च के ठीक बाद भाजपा के आक्रामक सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा सांसद राहुल गांधी पर बेहद तीखा और व्यक्तिगत टिप्पणी वाला हमला बोला। अपने बयानों के लिए हमेशा चर्चा में रहने वाले निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी की राजनीतिक समझ और उनके फैसलों पर सवाल खड़े किए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि विपक्षी खेमे के तौर-तरीके देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं के गरिमा के अनुकूल नहीं हैं। दुबे के इस बयान ने तुरंत राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी और मीडिया की सुर्खियां बटोरनी शुरू कर दीं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि निशिकांत दुबे का यह बयान केवल एक जुबानी हमला नहीं है, बल्कि यह भाजपा की उस सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह राहुल गांधी को हर मोर्चे पर घेरने का प्रयास कर रही है। जब भी विपक्ष एकजुट होकर सरकार के खिलाफ कोई सड़क मार्ग या बड़ा आंदोलन खड़ा करने की कोशिश करता है, भाजपा के आक्रामक नेता तुरंत मोर्चा संभाल लेते हैं। इस ताज़ा बयानबाजी के बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर भी काफी नाराजगी देखने को मिल रही है और उनके प्रवक्ता लगातार पलटवार कर रहे हैं।
"जो लोग देश के संविधान और संसद की मर्यादा को ताक पर रखकर केवल अपनी राजनीति चमकाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालते हैं, उन्हें जनता की वास्तविक समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे नेताओं की कार्यशैली पर सवाल उठाना हर जिम्मेदार जनप्रतिनिधि का कर्तव्य है।" — निशिकांत दुबे, सांसद, लोकसभा
न्यायपालिका के मंच का राजनीतिक इस्तेमाल करने का आरोप
सत्तारूढ़ दल के नेताओं का यह भी आरोप है कि विपक्ष जानबूझकर न्यायपालिका जैसी स्वतंत्र संस्थाओं को अपने राजनीतिक फायदे के लिए बीच में घसीटने का प्रयास कर रहा है। भाजपा का तर्क है कि जब देश में संसद जैसी मजबूत बहस की जगह मौजूद है, तो वहां अपनी बात रखने के बजाय सड़क पर उतरना और अदालतों के दरवाजे पर राजनीतिक प्रदर्शन करना संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं के बिल्कुल खिलाफ है।
दूसरी ओर, विपक्षी दलों का यह कहना है कि उन्हें संसद के भीतर उनकी आवाज दबाई जा रही है और जरूरी मुद्दों पर चर्चा नहीं होने दी जा रही है। इसी मजबूरी के चलते उन्हें जनता की अदालत और देश की न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ा। विपक्ष का यह भी दावा है कि मौजूदा सरकार संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को कमजोर कर रही है, जिसके खिलाफ आवाज उठाना उनका लोकतांत्रिक हक है।
आगामी चुनावों और संसद सत्र पर पड़ेगा गहरा असर
निशिकांत दुबे और राहुल गांधी के बीच छिड़ी इस ताजा राजनीतिक जंग का सीधा असर आगामी संसद सत्र और चुनावी राज्यों की राजनीति पर पड़ना तय है। दोनों ही दल इस मुद्दे को अपने-अपने पक्ष में भुनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। भाजपा जहां इसे विपक्ष की राजनीतिक दिशाहीनता और बचकानी हरकत के रूप में पेश कर रही है, वहीं कांग्रेस इसे सरकार की तानाशाही और डर का नतीजा बता रही है।
देश की आम जनता एक बार फिर इन नेताओं के बयानों और प्रदर्शनों के बीच अपनी रोजमर्रा की समस्याओं के समाधान की उम्मीद लगाए बैठी है, लेकिन सियासत के इस नए दौर ने साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष और भी ज्यादा तीव्र होने वाला है।












