संसदीय लोकतंत्र और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर मंडराते सवाल
भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ माने जाने वाले चुनाव आयोग की निष्पक्षता और कार्यशैली इन दिनों सियासी गलियारों में सबसे बड़ा चर्चा का विषय बनी हुई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों का गुस्सा लगातार उफान पर है। विपक्षी दलों का आरोप है कि संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता प्रभावित हो रही है। इसी कड़ी में गुरुवार को एक बार फिर विपक्षी नेताओं ने एकजुट होकर आगे की लड़ाई का खाका खींचा।
देश की राजधानी में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक का मुख्य एजेंडा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की समीक्षा करना और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को बचाना था। नेताओं का स्पष्ट मानना है कि यदि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का ढांचा ही कमजोर हो जाएगा, तो आम जनता का लोकतंत्र से विश्वास उठने लगेगा। यही कारण है कि अब विपक्षी खेमा इस मुद्दे पर किसी भी प्रकार का समझौता करने के मूड में नहीं दिखाई दे रहा है।
दोपहर के भोजन पर मंथन: राहुल गांधी और विपक्षी दिग्गजों की गुप्त मंत्रणा
गुरुवार को आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक में राजनीतिक दिग्गजों का जमावड़ा देखने को मिला। दोपहर के भोजन के दौरान हुई इस अनौपचारिक और फिर औपचारिक चर्चा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने प्रमुख भूमिका निभाई। उनके साथ विभिन्न विपक्षी दलों के कई शीर्ष नेता भी इस मंथन का हिस्सा बने। बंद कमरे में हुई इस बैठक में इस बात पर लंबी चर्चा हुई कि आखिर किस प्रकार चुनाव आयोग के फैसलों और कार्यशैली के खिलाफ देशव्यापी जनमत तैयार किया जाए।
सूत्रों के अनुसार, बैठक के दौरान पिछले चुनावों के अनुभवों, प्रशासनिक मशीनरी के कथित दुरुपयोग और विपक्षी दलों की शिकायतों पर चुनाव आयोग के रवैये को लेकर विस्तार से रिपोर्ट रखी गई। सभी नेताओं ने एक स्वर में माना कि यदि समय रहते आवाज बुलंद नहीं की गई, तो आगामी चुनावी लड़ाइयों में स्तर समान नहीं रह पाएगा। बैठक में मौजूद नेताओं ने अपने-अपने राज्यों के जमीनी हालात से भी सभी को अवगत कराया।
इस्तीफे की मांग को लेकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन का नया ब्लूप्रिंट
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग अब केवल बयानों तक सीमित नहीं रहने वाली है, बल्कि विपक्ष इसे एक बड़े जन आंदोलन का रूप देने की तैयारी में है। बैठक में तय किया गया कि जनता के बीच जाकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े सवालों को उठाया जाएगा। इसके लिए नुक्कड़ सभाओं, प्रेस वार्ताओं और डिजिटल अभियानों का सहारा लिया जाएगा ताकि आम नागरिक तक यह संदेश स्पष्ट रूप से पहुंच सके कि स्वतंत्र संस्थाओं का संरक्षण क्यों जरूरी है।
विपक्षी गठबंधन के रणनीतिकारों का मानना है कि केवल संसद के भीतर विरोध जताना काफी नहीं है। जब तक जनता सड़क पर आकर समर्थन नहीं देगी, तब तक सरकार और संवैधानिक पदों पर बैठे जिम्मेदार लोग इस गंभीर विषय पर गंभीरता नहीं दिखाएंगे। आने वाले दिनों में कुछ संयुक्त रैलियों और बड़े प्रदर्शनों का ऐलान भी किया जा सकता है, जिसकी रूपरेखा लगभग तैयार कर ली गई है।
संसद के आगामी सत्र में सरकार को घेरने की पुख्ता तैयारी
सड़क के साथ-साथ संसद के भीतर भी इस मुद्दे पर जोरदार हंगामा होने के पूरे आसार हैं। विपक्षी दल एकजुट होकर संसद के पटल पर मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज से जुड़े सवालों और शिकायतों की फेरिस्त रखने की योजना बना रहे हैं। उनका इरादा इस मामले पर सरकार से सीधा जवाब मांगने का है।
"देश के संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा करना हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है। जब चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर ही दाग लगने लगे, तो खामोश बैठना देशद्रोह के बराबर है। हम इस लड़ाई को हर स्तर पर मजबूती से लड़ेंगे।" — विपक्षी दल के वरिष्ठ नेता
संसदीय मामलों के जानकारों का कहना है कि विपक्ष का यह आक्रामक रुख आने वाले दिनों में राजनीतिक तापमान को और ज्यादा बढ़ाने का काम करेगा। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव के नए दौर की शुरुआत हो चुकी है, जिसका सीधा असर देश की राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ना तय है।
भविष्य की राजनीतिक दिशा और जनता की अदालत में मामला
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब गेंद पूरी तरह से जनता की अदालत में है। एक तरफ जहां विपक्ष इसे लोकतंत्र बचाने की अंतिम लड़ाई बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस सियासी घमासान से देश की प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्थाओं पर भी बहस तेज हो गई है। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि विपक्षी दलों की यह रणनीति ज़मीन पर कितना असर दिखा पाती है और सरकार इस राजनीतिक दबाव का किस प्रकार सामना करती है।











