नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और फैसलों को लेकर तकरार अब सड़कों पर उतर आई है। एक तरफ जहां कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दल लगातार मुखर होकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ बड़े राजनीतिक दलों ने इस लड़ाई को अदालत तक ले जाने से किनारा कर लिया है। राजनीतिक गलियारों में यह बड़ा सवाल बना हुआ है कि आखिर वो कौन सी पांच बड़ी विपक्षी पार्टियां हैं जिन्होंने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट न जाने का फैसला किया है। इन दलों में आम आदमी पार्टी और डीएमके जैसे नाम शामिल हैं, जिन्होंने इस मामले में कानूनी रास्ता अपनाने के बजाय राजनीतिक मंचों पर ही अपनी आवाज उठाने का विकल्प चुना है।
इस पूरे घटनाक्रम पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव समेत सत्ता पक्ष के कई बड़े नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। भोपाल में पत्रकारों से बात करते हुए सीएम मोहन यादव ने राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के विरोध प्रदर्शन को लोकतंत्र के खिलाफ बताया और कहा कि संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाने की यह राजनीति देश की जनता देख रही है। दूसरी तरफ, तमिलनाडु की राजनीति से एक बड़ा अपडेट सामने आया है जहां अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी टीवीके यानी तमिझा वेत्री कड़गम भी अब इंडिया ब्लॉक के पाले में आती दिख रही है। इस नए राजनीतिक समीकरण के बाद क्षेत्रीय दलों की रणनीतियों में भी बड़ा बदलाव देखा जा रहा है, जिसका सीधा असर दिल्ली के सत्ता गलियारों तक महसूस किया जा रहा है।
विपक्षी खेमे में ब बंटी रणनीति के मायने
कानूनी जानकारों और वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट न जाने के पीछे इन पांचों दलों की अपनी सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है। आम आदमी पार्टी और डीएमके जैसे दल पहले भी कई मामलों में केंद्र सरकार और संवैधानिक संस्थाओं से सीधी राजनीतिक दो-दो हाथ करने के पक्ष में रहे हैं। उनका मानना है कि अदालती लड़ाइयों में लंबा समय लग जाता है, जबकि जनता के बीच जाकर इन मुद्दों को गर्माने से सीधा चुनावी फायदा मिल सकता है। यही वजह है कि इन दलों ने अदालत का दरवाजा खटखटाने के बजाय सड़क पर उतरकर विरोध जताने का रास्ता चुना है ताकि आम जनता के बीच सीधे तौर पर अपनी बात पहुंचाई जा सके।
हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि विपक्षी गठबंधन यानी इंडिया ब्लॉक के भीतर सभी दल हर मुद्दे पर एक जैसी राय नहीं रखते हैं। कांग्रेस पार्टी जहां हर मोर्चे पर आक्रामक तेवर अपनाए हुए है, वहीं क्षेत्रीय दल अपनी स्थानीय प्राथमिकताओं और चुनावी नफा-नुकसान को ध्यान में रखकर अपने कदम उठा रहे हैं। विजय की टीवीके पार्टी का इस समीकरण से जुड़ना और अन्य क्षेत्रीय दलों का रुख इस बात का गवाह है कि आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय क्षत्रपों की भूमिका बेहद अहम होने वाली है। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इस तकरार में सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक घमासान मचा हुआ है और हर पार्टी अपनी चाल बहुत सावधानी से चल रही है।
सड़क से संसद तक तेज होगा सियासी घमासान
द फ्रीलान्स की पड़ताल बताती है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक तूल पकड़ सकता है क्योंकि संसद का सत्र हो या सड़क पर होने वाले प्रदर्शन, विपक्ष इसे एक बड़े मुद्दे के रूप में भुनाने की फिराक में है। आम आदमी पार्टी और डीएमके जैसे बड़े क्षेत्रीय दल भले ही अभी सुप्रीम कोर्ट नहीं गए हैं, लेकिन उनके तेवर किसी भी हाल में नरम पड़ने वाले नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अदालती रास्ता अख्तियार न करने से विपक्ष को अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने और सरकार पर वैचारिक दबाव बनाने की पूरी आज़ादी मिल जाती है, जिसे वे हाथ से जाने नहीं देना चाहते।
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि राहुल गांधी के नेतृत्व में चल रहा यह अभियान आगे क्या नया मोड़ लेता है और क्या बाकी विपक्षी दल भी आने वाले समय में अपने रुख में कोई बदलाव करते हैं या नहीं। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रही इस तकरार ने एक बार फिर यह साबित कर ता है कि भारतीय राजनीति में संस्थाओं और विपक्ष के बीच का यह टकराव थमने वाला नहीं है। जनता के बीच जाकर अपनी बात मनवाने की यह सियासत आने वाले चुनावों की दिशा और दशा दोनों तय करेगी, जिस पर हर राजनीतिक पंडित की पैनी नजर बनी हुई है।








