हैदराबाद और विजयवाड़ा से हमारे फील्ड नेटवर्क के अनुसार, दक्षिण भारत के इन दो प्रमुख राज्यों में धान की खरीद का मुद्दा इस समय सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक हलचल बन गया है। तेलंगाना में धान ना खरीदे जाने से नाराज किसानों ने कई जगहों पर मुख्य मार्गों को जाम कर दिया है। किसानों का आरोप है कि समय पर सरकारी खरीद केंद्र न खुलने के कारण उन्हें अपनी उपज बिचौलियों को कम दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। राज्य में विपक्षी दल इस मुद्दे को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर हैं और किसानों की बदहाली का आरोप लगा रहे हैं।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस विरोध प्रदर्शन के बीच बीआरएस नेताओं और कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में भी लिया है। पूर्व मंत्रियों और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने राज्य सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि चुनाव के समय किसानों से जो बड़े-बड़े वादे किए गए थे, वे धरातल पररे पूरी तरह फेल साबित हो रहे हैं। धान के एक-एक दाने की खरीद का वादा करने वाली सरकार आज किसानों को सड़कों पर धकेल चुकी है।
सड़कों पर उतरे किसान और पुलिस के साथ खींचतान
राजधानी हैदराबाद के सचिवालय के पास उस समय भारी तनाव फैल गया जब विपक्षी नेताओं ने किसानों के समर्थन में प्रदर्शन किया। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए कई प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया। किसानों का कहना है कि धान की कटाई का सीजन अपने चरम पर है, लेकिन मंडियों में बारदानों की कमी और नमी के नाम पर अनाज की खरीद रोकी जा रही है। किसान भारी धूप और खुले आसमान के नीचे अपनी ट्रॉलियों में धान भरकर सरकारी केंद्रों के बाहर दिन-रात खड़े रहने को मजबूर हैं।
स्थानीय किसानों से बातचीत में यह बात सामने आई कि सरकारी पोर्टल और ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की तकनीकी पेंचीदगियों के कारण उनका पंजीकरण समय पर नहीं हो पा रहा है। जो किसान पहले ही अपनी फसल मंडियों तक ला चुके हैं, उन्हें टोकन मिलने में हफ्तों का इंतजार करना पड़ रहा है। बिचौलिए इस स्थिति का फायदा उठाकर कम कीमत पर किसानों की मेहनत खरीद रहे हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में भारी आर्थिक संकट पैदा हो गया है।
आंध्र प्रदेश में नए कृषि कदम और बकाये का भुगतान
एक तरफ जहां तेलंगाना में विरोध के सुर तेज हैं, वहीं पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में सरकार ने किसानों को राहत देने के लिए नए कदम उठाने का दावा किया है। राज्य सरकार ने पिछले बकाये का भुगतान तेजी से करने और किसानों के समर्थन में नई योजनाओं का ऐलान किया है। अधिकारियों का कहना है कि किसानों के खातों में सीधे पैसे भेजे जा रहे हैं ताकि उन्हें किसी भी प्रकार की वित्तीय समस्या का सामना न करना पड़े। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर कई किसान अभी भी सरकारी दावों और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर को लेकर असमंजस में हैं।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण भारत में धान की खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। जब तक खरीद प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध नहीं होगी, तब तक ऐसे विरोध प्रदर्शन थमने वाले नहीं हैं। राजनीतिक दलों की बयानबाजी के बीच असली पिसान किसानों का हो रहा है जिनकी सालभर की मेहनत मौसम की मार और सरकारी पाबंदियों के बीच उलझ कर रह गई है।
प्रशासन की मुश्किलें और आगे की रणनीति
जिला प्रशासन और नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों का कहना है कि वे लगातार मंडियों का दौरा कर रहे हैं और धान उठान के काम में तेजी लाई जा रही है। मौसम विभाग की चेतावनी के बाद मंडियों में खुले में पड़े धान को बचाने के लिए तिरपाल और अन्य इंतजाम किए जा रहे हैं। हालांकि, किसानों का गुस्सा इस बात से है कि प्रशासनिक अमला तब हरकत में आता है जब बात सड़कों पर विरोध प्रदर्शन तक पहुंच जाती है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से और अधिक तूल पकड़ सकता है। विपक्षी दल इसे बड़ा मुद्दा बनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में हैं। दूसरी ओर, सरकारों के लिए यह परीक्षा की घड़ी है कि वे धान की हर एक बाली का सही मूल्य देकर किसानों के इस भारी असंतोष को कैसे शांत करती हैं।








