नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — द फ्रीलान्स की पड़ताल में सामने आया है कि भारत में धान के भंडारण को लेकर एक बड़ी चिंता उभर रही है। गूगल ट्रेंड्स पर पिछले कुछ घंटों में 'धान्यम निलवा' शब्द तेजी से खोजा जा रहा है। यह शब्द तेलुगु भाषा का है, जिसका मतलब 'धान्य भंडारण' या 'चावल का स्टॉक' होता है। इस अचानक बढ़ी खोज से साफ है कि देश के बड़े हिस्से में लोग धान के स्टॉक की स्थिति को लेकर परेशान हैं। यह चिंता सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं है। आम उपभोक्ता भी जानना चाहते हैं कि क्या आने वाले समय में चावल की उपलब्धता और कीमतों पर कोई असर पड़ेगा। हमारी टीम ने इस मुद्दे की गहराई से पड़ताल की है।
देश के कई राज्यों में धान की कटाई का काम लगभग पूरा हो चुका है। किसान अपनी मेहनत का फल बेचने के लिए तैयार हैं। लेकिन सरकारी खरीद केंद्रों पर अक्सर लंबी कतारें दिख रही हैं। कई जगहों पर खरीद प्रक्रिया धीमी चल रही है। इससे किसानों को अपना धान बेचने में दिक्कत हो रही है। कुछ जगहों पर तो धान खुले में पड़ा है। बेमौसम बारिश या नमी से उसके खराब होने का डर है। यह स्थिति किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। उन्हें अपनी फसल को सुरक्षित रखने की चिंता सता रही है।
धान के भंडारण पर क्यों बढ़ी चिंता?
धान्य भंडारण पर चिंता बढ़ने के कई कारण हैं। पहला, कई राज्यों में इस साल बेमौसम बारिश हुई है। इससे खेत में कटी हुई धान की फसल को नुकसान पहुंचा है। जो धान मंडियों तक पहुंचा भी है, उस पर नमी का असर दिख रहा है। दूसरा, सरकारी खरीद केंद्रों पर भंडारण की पर्याप्त जगह नहीं है। गोदाम भरे हुए हैं या उनकी क्षमता कम है। इससे धान को तुरंत स्टोर नहीं किया जा रहा है। तीसरा, खरीद प्रक्रिया में देरी से किसान परेशान हैं। उन्हें अपनी फसल बेचने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। कई बार तो उन्हें अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ती है। यह सब मिलकर 'धान्यम निलवा' की खोज को बढ़ा रहा है।
किसानों का कहना है कि उन्हें अपनी फसल बेचने के लिए कई दिन तक इंतजार करना पड़ता है। कुछ किसान तो हफ्तों तक मंडियों में डेरा डाले रहते हैं। इस दौरान उनके धान की गुणवत्ता खराब होने का खतरा रहता है। नमी या कीट लगने से फसल खराब हो सकती है। इससे उन्हें भारी नुकसान होता है। सरकार की तरफ से तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर भी धान नहीं बिक पाता। बिचौलिए इसका फायदा उठाते हैं। वे किसानों से कम दाम पर धान खरीद लेते हैं। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति और खराब हो जाती है।
सरकारी खरीद और किसानों की उम्मीदें
सरकार हर साल किसानों से धान खरीदती है। यह धान भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों में रखा जाता है। फिर इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत बांटा जाता है। लेकिन इस साल खरीद प्रक्रिया में कुछ दिक्कतें आ रही हैं। कई राज्यों से खबरें आ रही हैं कि खरीद लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है। किसानों को उम्मीद थी कि सरकार उनकी सारी फसल खरीदेगी। लेकिन देरी और नियमों के चलते उनकी उम्मीदें टूट रही हैं। कुछ जगहों पर धान में नमी की मात्रा ज्यादा बताकर खरीद से मना किया जा रहा है। इससे किसान और भी हताश हो रहे हैं।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि वे खरीद प्रक्रिया को तेज करने की कोशिश कर रहे हैं। वे भंडारण की जगह बढ़ाने पर भी काम कर रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। गोदामों की कमी एक पुरानी समस्या है। नई फसल आने पर यह समस्या और बढ़ जाती है। खासकर उन राज्यों में जहां धान की पैदावार बहुत ज्यादा होती है। वहां किसानों को अपनी फसल रखने की जगह नहीं मिलती। इससे उन्हें मजबूरन खुले में धान रखना पड़ता है। यह मौसम की मार झेलने को मजबूर करता है।
आगे क्या होगा? सरकार और जनता की राह
इस स्थिति का असर आने वाले समय में चावल की कीमतों पर पड़ सकता है। अगर धान का सही भंडारण नहीं हुआ तो बाजार में चावल की कमी हो सकती है। इससे कीमतें बढ़ सकती हैं। यह आम आदमी की जेब पर सीधा असर डालेगा। सरकार को इस पर तुरंत ध्यान देना होगा। भंडारण क्षमता बढ़ानी होगी। खरीद प्रक्रिया को और तेज और पारदर्शी बनाना होगा। किसानों को उनकी फसल का सही दाम मिलना चाहिए। यह देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी बहुत जरूरी है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि यह सिर्फ एक मौसमी समस्या नहीं है। यह भारत की कृषि व्यवस्था में गहरे बैठे मुद्दों को दिखाता है। हमें भंडारण के लिए आधुनिक तकनीक अपनानी होगी। कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाओं को बढ़ाना होगा। किसानों को अपनी फसल को सुरक्षित रखने के लिए जागरूक करना होगा। सरकार और किसानों के बीच बेहतर तालमेल बहुत जरूरी है। तभी हम ऐसी चिंताओं से बच पाएंगे और देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत कर पाएंगे। 'धान्यम निलवा' की यह खोज एक चेतावनी है, जिस पर तुरंत ध्यान देना होगा।










