चेन्नई से हमारे विशेष संवाददाता की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु के परंदूर में प्रस्तावित नए एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को लेकर पिछले कुछ दिनों से हलचल बहुत तेज हो गई है। हाल ही में आई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, परंदूर एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डालने की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। इस बीच, तमिलनाडु सरकार ने प्रोजेक्ट साइट के पास ही एक नया सिपकॉट औद्योगिक पार्क बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सरकारी गजट नोटिफिकेशन के मुताबिक, सिपकॉट मदूर के लिए 8.382 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया जाएगा। इस कदम के बाद स्थानीय लोगों और जमीन देने वाले किसानों के बीच यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या सरकार अब इस इलाके में एयरपोर्ट की जगह उद्योग लगाने की योजना पर काम कर रही है।
इस पूरे मामले पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार के रुख में थोड़ा अंतर भी देखने को मिल रहा है। केंद्र सरकार के स्तर पर यह साफ किया गया है कि तमिलनाडु की तरफ से अभी तक परंदूर एयरपोर्ट की जगह बदलने यानी रिलोकेशन का कोई आधिकारिक अनुरोध नहीं किया गया है। वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार के गलियारों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि प्रोजेक्ट के भविष्य को लेकर एक आधिकारिक सरकारी आदेश जल्द जारी हो सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि सरकार इस परियोजना के भविष्य पर नए सिरे से विचार कर रही है, क्योंकि इसके लिए पहले ही करीब 1700 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जा चुका है। ऐसे में अचानक औद्योगिक पार्क के लिए जमीन अधिग्रहण का नोटिफिकेशन आना कई तरह के राजनीतिक और प्रशासनिक संकेत दे रहा है.
परंदूर और आसपास के गांवों में किसानों की बढ़ती चिंताएं
जमीनी हकीकत जानने के लिए जब हमारी टीम ने परंदूर और आसपास के गांवों का दौरा किया, तो वहां का माहौल काफी तनावपूर्ण और असमंजस से भरा नजर आया। पिछले दो साल से अपने खेतों और घरों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे स्थानीय किसान अब एक बार फिर असमंजस में हैं। किसानों का कहना है कि प्रशासन की तरफ से उन्हें साफ-साफ नहीं बताया जा रहा है कि उनका इलाका एयरपोर्ट के लिए लिया जाएगा या फिर इसे औद्योगिक पार्क के नाम पर किसी और योजना में इस्तेमाल किया जाएगा। किसानों ने साफ कर दिया है कि वे अपनी उपजाऊ जमीन और पुरखों की निशानियां किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। वे लगातार प्रशासनिक अधिकारियों से मिलकर लिखित स्पष्टीकरण की मांग कर रहे हैं, लेकिन उन्हें हर बार टाल दिया जाता है।
स्थानीय किसान संघ के नेताओं का आरोप है कि सरकार पहले एयरपोर्ट के नाम पर उनकी जमीन कम कीमत पर लेना चाहती थी और अब उद्योगों के नाम पर नया जाल बिछाया जा रहा है। गांव के बुजुर्गों और युवाओं दोनों का गुस्सा इस बात को लेकर है कि विकास के बड़े दावों के बीच उनकी आजीविका को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है। धान के खेतों और पानी के स्रोतों के बीच रहने वाले इन लोगों का जीवन पूरी तरह खेती पर निर्भर है। यदि यहां सिपकॉट का औद्योगिक पार्क बनता है या फिर एयरपोर्ट का काम आगे बढ़ता है, तो उनका पूरा सामाजिक और आर्थिक ढांचा बिखर जाएगा। महिलाएं और युवा भी अब इस अनिश्चितता के खिलाफ बड़े आंदोलन की तैयारी करने लगे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि रातों-रात उनके घरों पर बुलडोजर चल सकता है।
प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज
राजनीतिक मोर्चे पर भी इस मुद्दे को लेकर बयानबाजी और सरगर्मी तेज हो गई है। विपक्षी दल और स्थानीय नेता सरकार के इन विरोधाभासी बयानों और नोटिफिकेशनों को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। एक तरफ केंद्र कह रहा है कि प्रोजेक्ट रद्द नहीं हुआ है और दूसरी तरफ राज्य सरकार छोटे-छोटे हिस्सों में जमीन का इस्तेमाल बदलने के आदेश दे रही है, जिससे जनता का भरोसा उठ रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों का पक्ष जानने की कोशिश की गई तो उन्होंने आधिकारिक रूप से ज्यादा कुछ बोलने से इनकार कर दिया, लेकिन दबी जुबान में यह जरूर माना कि प्रोजेक्ट के आकार और उसकी उपयोगिता पर उच्च स्तर पर मंथन चल रहा है।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ हो जाता है कि परंदूर एयरपोर्ट और सिपकॉट औद्योगिक पार्क का यह पूरा ताना-बाना आम जनता के लिए सिवाए परेशानी के कुछ नहीं लेकर आया है। जब तक सरकार आगे आकर पारदर्शी तरीके से पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं करती, तब तक इस इलाके में बेचैनी और अफवाहों का बाजार गर्म रहेगा। हमारी टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे ही कोई नया आधिकारिक आदेश आएगा, हम सबसे पहले जमीनी सच आपके सामने लेकर आएंगे। किसानों और स्थानीय नागरिकों की इस लड़ाई में उनका पक्ष रखना ही हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है, ताकि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग आम आदमी की आवाज सुन सकें।







