अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा तेजी
वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने एक बार फिर ऊर्जा बाजार को हिलाकर रख दिया है। कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में लगी आग थमने का नाम नहीं ले रही है, जिसके चलते दुनिया भर के ईंधन बाजारों में भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही है। सप्लाई चेन बाधित होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड और अन्य प्रमुख क्रूड बास्केट के दाम आसमान छू रहे हैं। इसका सीधा असर भारत जैसे आयातक देशों पर पड़ रहा है, जहां ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा बाहर से आयात किया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के दुष्परिणामों और मिडिल ईस्ट की अनिश्चितता के कारण तेल उत्पादक देशों से होने वाली आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे कूटनीति गतिरोध के कारण भी बाजार में स्थिरता नहीं आ पा रही है। ऐसी स्थिति में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं लगातार गहरी होती जा रही हैं, जिसका खामियाजा अब खुदरा ईंधन बाजारों को भुगतना पड़ रहा है।
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रिलायंस और नायरा एनर्जी के पंपों पर तेल की बिक्री पर कैपिंग
बढ़ती लागत और खुदरा कीमतों में लंबे समय से कोई बड़ा बदलाव न होने के कारण निजी क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों पर भारी वित्तीय दबाव बन गया है। इस संकट से निपटने के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL), रिलायंस-बीपी मोबिलिटी और नायरा एनर्जी (Nayara Energy) ने अपने चुनिंदा फ्यूल स्टेशनों पर पेट्रोल और डीजल की बिक्री सीमित करना शुरू कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन कंपनियों ने जमाखोरी रोकने और ईंधन की सुचारू उपलब्धता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया है।
नायरा एनर्जी के पेट्रोल पंपों पर अब ग्राहकों को केवल 30 लीटर तक ही पेट्रोल मिल पा रहा है, जबकि डीजल की मात्रा भी सीमित कर दी गई है। इसी प्रकार, रिलायंस और बीपी के संयुक्त उद्यम ने भी औद्योगिक और गैर-परिवहन उपयोगकर्ताओं की बढ़ती मांग के बीच आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए सख्त दिशा-निर्देश लागू किए हैं। पिछले कुछ महीनों में इस तरह की पाबंदियां दूसरी बार देखने को मिल रही हैं, जिससे व्यावसायिक वाहनों और ट्रांसपोर्टर्स की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
खुदरा विक्रेताओं को हो रहा है भारी वित्तीय घाटा
घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम लंबे समय से लगभग स्थिर बने हुए हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चा तेल बहुत महंगा हो चुका है। हालांकि रिफाइनर सैद्धांतिक रूप से अपने दाम तय करने के लिए स्वतंत्र होते हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से सरकारी और निजी दोनों तरह की कंपनियां बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप ही निर्णय लेती हैं। लागत मूल्य से कम कीमत पर ईंधन बेचे जाने के कारण खुदरा विक्रेताओं को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
रेटिंग एजेंसियों और बाजार विश्लेषकों का अनुमान है कि निजी खुदरा विक्रेताओं को प्रति लीटर ईंधन की बिक्री पर तगड़ा घाटा हो रहा है। यही वजह है कि निजी कंपनियों ने अपने नेटवर्क पर आपूर्ति सीमित करने का रास्ता चुना है ताकि घाटे को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सके। रूस और अमेरिका जैसे बड़े देशों द्वारा ईंधन के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों ने भी स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है।
"ऊर्जा बाजारों में मौजूदा अस्थिरता और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी हैं। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति सामान्य नहीं होती, तब तक खुदरा ईंधन विक्रेताओं को इस प्रकार के दबावों का सामना करना पड़ेगा।" — ऊर्जा बाजार विशेषज्ञ
सरकारी तेल कंपनियों के पंपों पर राहत, लेकिन कब तक?
राहत की बात यह है कि देश के नब्बे प्रतिशत से अधिक खुदरा ईंधन बाजार पर कब्जा रखने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों—इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL)—के पेट्रोल पंपों पर फिलहाल किसी भी तरह की पाबंदी या कोटा प्रणाली लागू नहीं की गई है। इन सरकारी पंपों पर उपभोक्ताओं को उनकी आवश्यकतानुसार सामान्य रूप से पेट्रोल और डीजल मिल रहा है।
हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो सरकारी कंपनियों के लिए भी कीमतों और आपूर्ति को लंबे समय तक स्थिर रख पाना बेहद कठिन हो जाएगा। आम नागरिकों और वाहन चालकों को सलाह दी जा रही है कि वे ईंधन की खपत को लेकर सतर्क रहें और किसी भी तरह की अफवाहों से बचें। सरकार और नियामक संस्थाएं स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं ताकि देश के भीतर ऊर्जा की आपूर्ति सुचारू रूप से चलती रहे।








