नई दिल्ली/पटना: 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड इन्वेस्टिगेटिव टीम जब ग्रामीण इलाकों की पड़ताल पर उतरी, तो प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-Kisan) की आगामी 24वीं किस्त से जुड़ी एक बेहद गंभीर तस्वीर सामने आई। एक तरफ जहां त्योहारी सीजन यानी दिवाली से पहले किसानों के खातों में 2,000 रुपये की किस्त आने की सुगबुगाहट तेज है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत प्रशासनिक लापरवाही और तकनीकी जटिलताओं की एक लंबी दाستانی बयां कर रही है। देश के विभिन्न हिस्सों से मिल रही रिपोर्टों के मुताबिक, करोड़ों किसानों के लिए यह किस्त राहत लेकर आने के बजाय एक नए इम्तिहान जैसी बन गई है।
मैदान से रिपोर्ट: ई-केवाईसी का अटका हुआ चक्र
बिहार के कई जिलों से आ रहे आंकड़े चौंकाने वाले हैं। राज्य में पहले ही लगभग 13 लाख किसानों के नाम अयोग्य घोषित कर सूची से बाहर किए जा चुके हैं, और अब ताजा आंकड़ों के अनुसार लगभग 18 लाख अन्य किसानों पर योजना से बाहर होने का तलवार लटक रही है। ऐसा ही हाल उत्तर प्रदेश और अन्य कृषि प्रधान राज्यों के विभिन्न प्रखंडों का है। उदाहरण के लिए, एक विशिष्ट प्रखंड (जैसे नगरा) में ही 11,000 से अधिक किसानों की ई-केवाईसी (e-KYC) प्रक्रिया अभी भी लंबित पाई गई है। यदि यह औपचारिकता समय रहते पूरी नहीं की जाती है, तो इन किसानों को आगामी किस्त से सीधे तौर पर वंचित होना पड़ेगा।
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चार बड़े अपडेट और किसानों के सामने खड़ी चुनौतियां
कृषि मंत्रालय और स्थानीय प्रशासन लगातार किसानों को सचेत कर रहे हैं कि वे समय रहते अपने दस्तावेज दुरुस्त कर लें। इस पूरी प्रक्रिया में मुख्य रूप से चार बड़े बदलाव और कार्य सामने आए हैं:
- अनिवार्य ई-केवाईसी: बायोमीट्रिक या ओटीपी आधारित ई-केवाईसी के बिना सिस्टम किस्त ट्रांसफर को स्वीकार नहीं कर रहा है।
- भू-सत्यापन (Land Seeding): जमीन के दस्तावेजों का पोर्टल पर अपडेट न होना सबसे बड़ा अड़चन बना हुआ है।
- आधार और बैंक खाता लिंक होना: डीबीटी (Direct Benefit Transfer) के लिए आधार मैपिंग का सक्रिय होना अनिवार्य है।
- सूची से नाम हटना: मृत किसानों या आयकर दाताओं के नाम सूची से छांटने की प्रक्रिया में कई जीवित और पात्र किसानों के नाम भी गलती से प्रभावित हो रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के बीच घरेलू मोर्चे पर संघर्ष
एक दिलचस्प विरोधाभास यह है कि केंद्रीय स्तर पर कृषि मंत्रालय वैश्विक मोर्चे पर बड़े कदम उठा रहा है। हाल ही में कृषि मंत्री ने नीदरलैंड्स के साथ कृषि क्षेत्र में मजबूत साझेदारी और तकनीकी आदान-प्रदान की बड़ी घोषणा की है। ड्रिप इरिगेशन, आधुनिक कृषि तकनीक और सप्लाई चेन को बेहतर बनाने के लिए यह कूटनीतिक और आर्थिक कदम सराहनीय है, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर बैठा एक साधारण किसान अपनी छोटी सी ई-केवाईसी की तकनीकी समस्या से जूझता रहेगा, तब तक नीतिगत घोषणाओं का यह चमकता आवरण ग्रामीण चौपालों पर फीका ही नजर आएगा।
"सरकार भले ही डिजिटल इंडिया और पारदर्शी डीबीटी के जरिए बिचौलियों को खत्म करने का दावा कर रही हो, लेकिन सुदूर ग्रामीण इलाकों में कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) की कमी और इंटरनेट की सुस्त रफ्तार के कारण आम किसान आज भी चिलचिलाती धूप में कागजात लेकर धक्के खाने को मजबूर है।"
दिवाली से पहले आने वाली इस 24वीं किस्त से किसानों को अपनी फसल की बुवाई और त्योहारों के खर्चों के लिए बड़ी उम्मीदें हैं। लेकिन यदि प्रशासन ने युद्ध स्तर पर कैंप लगाकर इन लंबित ई-केवाईसी और भूमि सत्यापन के मामलों का निस्तारण नहीं किया, तो यह दीवाली कई अन्नदाताओं के लिए फीकी साबित हो सकती है। 'द फ्रीलान्स' इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और जमीनी अपडेट आप तक पहुंचाता रहेगा।








