नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति और कानूनी गलियारों से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई याचिका की तमाम कमियों को पूरी तरह दूर कर लिया गया है। कोर्ट के दफ्तर ने इन सभी तकनीकी कमियों को ठीक करने के बाद फाइल को आगे की प्रक्रिया के लिए तैयार कर लिया है। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद अब बहुत जल्द इस मामले पर सुनवाई की संभावित तारीख सामने आ सकती है। वकीलों और जानकारों का मानना है कि अदालत जल्द ही इस याचिका को सुनवाई के लिए सूची में शामिल कर सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। अदालत परिसर में उनकी मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। हालांकि, उनका सुप्रीम कोर्ट पहुंचना किस खास कानूनी मामले से जुड़ा है, इस पर अभी आधिकारिक और पूरी जानकारी आनी बाकी है। लेकिन इतना तय है कि देश की सबसे बड़ी अदालत में इन दिनों बड़े और संवेदनशील मामलों पर लगातार नजर बनी हुई है। आम नागरिक भी यह जानना चाहते हैं कि इन याचिकाओं का देश की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा।
क्यों ज्यादातर याचिकाओं पर तुरंत सुनवाई नहीं करता सुप्रीम कोर्ट
आम जनता के मन में अक्सर यह बड़ा सवाल उठता है कि किसी भी बड़े नेता या पार्टी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट तुरंत सुनवाई क्यों नहीं करता है। इसके पीछे अदालत के अपने कड़े नियम और तय प्रक्रियाएं होती हैं। किसी भी याचिका को कोर्ट में दाखिल करने से पहले उसकी जांच की जाती है। यदि याचिका में कोई तकनीकी कमी या कागजात पूरे नहीं होते हैं, तो रजिस्ट्री विभाग उसे वापस कर देता है। कमियां दूर होने के बाद ही फाइल को अदालत के सामने पेश किया जाता है। इसके अलावा देश भर के हजारों पुराने मुकदमे पहले से ही लंबित रहते हैं। इसलिए अर्जेंट या तुरंत सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश के सामने खास गुहार लगानी पड़ती है।
न्यायिक प्रक्रिया की इस लंबी और जटिल प्रणाली को लेकर राजनीतिक दलों और वकीलों के बीच अक्सर बहस होती रहती है। हाल ही में प्रशांत किशोर जैसे राजनीतिक रणनीतिकारों ने भी न्याय व्यवस्था और नेताओं की मुलाकातों को लेकर अपने बयान दिए हैं। उनका कहना है कि देश की मौजूदा राजनीतिक दिशा और न्यायपालिका के बीच का तालमेल बहुत कुछ कहता है। हालांकि, अदालती मामलों में केवल कानून और संविधान के नियमों के आधार पर ही फैसले होते हैं। किसी भी मामले में तारीख मिलने का समय इस बात पर निर्भर करता है कि मामला कितना गंभीर और तात्कालिक महत्व का है।
मेट्रो गेट और अन्य मामलों पर भी चल रही है कानूनी लड़ाई
सुप्रीम कोर्ट में केवल राजनीतिक याचिकाएं ही नहीं, बल्कि आम जनता से जुड़े कई अन्य अहम मुद्दों पर भी सुनवाई जारी है। हाल ही में दिल्ली मेट्रो रेल निगम यानी DMRC ने अदालत में जवाब दिया है। यह मामला प्रदर्शनों के दौरान मेट्रो स्टेशनों के एंट्री और एग्जिट गेट बंद करने से जुड़ा हुआ है। DMRC ने अदालत को बताया कि सुरक्षा कारणों और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई बार यह कड़े कदम उठाने पड़ते हैं। अदालत इन सभी पक्षों को सुनकर ही कोई निष्पक्ष आदेश जारी करती है ताकि आम यात्रियों को कम से कम परेशानी का सामना करना पड़े।
इसके अलावा चुनाव आयोग से जुड़े SIR के मुद्दे पर भी सियासी बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तय की गई है। इन तमाम मामलों से साफ है कि देश की सबसे बड़ी अदालत इस समय कई मोर्चों पर बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामलों की सुनवाई कर रही है। राहुल गांधी की याचिका पर सुनवाई की तारीख तय होने के बाद इन कानूनी लड़ाइयों में और तेजी आने की पूरी उम्मीद है।
कानूनी प्रक्रिया और आगे की संभावित समयसीमा
किसी भी कानूनी मामले में तारीख मिलने का इंतजार लंबा हो सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की कार्यशैली हमेशा से पारदर्शी रही है। राहुल गांधी के मामले में अब जबकि कागजी कमियां पूरी हो चुकी हैं, गेंद पूरी तरह से अदालत के पाले में है। देश की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई के लिए कौन सी तारीख तय करता है। राजनीतिक दलों के लिए यह मामला बहुत अहम है क्योंकि इसका सीधा असर आने वाले दिनों की चुनावी और राजनीतिक रणनीतियों पर पड़ सकता है। द फ्रीलान्स की टीम इस मामले से जुड़े हर एक अपडेट पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी।




