नई दिल्ली में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है क्योंकि देश की सबसे बड़ी अदालत ने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा कदम उठाया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं की तरफ से दायर की गई याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग को आधिकारिक तौर पर नोटिस जारी कर दिया है। इस याचिका में चुनाव आयोग के कामकाज और विशेष मतदाता पुनरीक्षण या SIR से जुड़े मुद्दों को उठाया गया था जिस पर अब कानूनी जवाब तलब किया गया है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और अन्य जजों की बेंच ने बेहद कड़े शब्दों में कुछ टिप्पणियां भी कीं। अदालत के सामने जब राहुल गांधी के एक पुराने धरने और विरोध प्रदर्शन का जिक्र किया गया तो न्यायपालिका ने स्पष्ट कर दिया कि दबाव की राजनीति का कोर्ट पर कोई असर नहीं पड़ता है। बेंच ने साफ तौर पर कहा कि कोई भी व्यक्ति या समूह न्यायपालिका को धौंस नहीं दिखा सकता है। अदालत अपने तय नियमों और संविधान के दायरे में ही निष्पक्ष रूप से काम करेगी, चाहे बाहर किस तरह का भी राजनीतिक दबाव क्यों न बनाया जा रहा हो।
चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार से मांगा गया जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर तय समय सीमा के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। अदालत यह देखना चाहती है कि याचिका में उठाए गए गंभीर सवालों पर चुनाव आयोग का पक्ष क्या है। विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव से जुड़ी कई व्यवस्थाओं में पारदर्शिता की कमी है और इस पर आयोग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों पक्षों को सुनने के बाद ही अगला आदेश देने की बात कही है।
विपक्षी गठबंधन के नेताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता बनाए रखना देश के हित में सबसे जरूरी काम है। राहुल गांधी समेत तमाम नेताओं ने अपनी याचिका में दलील दी है कि चुनावी प्रणाली को और अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए ताकि आम जनता का भरोसा मजबूत हो सके। चुनाव आयोग अब इस नोटिस के बाद सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना विस्तृत हलफनामा पेश करेगा। देश भर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आयोग अपनी सफाई में अदालत को क्या दलीलें देता है।
न्यायपालिका की दो टूक और देश का सियासी पारा
इस पूरे घटनाक्रम के बाद देश की राजधानी में राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई है। एक तरफ जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष इस कानूनी लड़ाई को अपने-अपने तरीके से देख रहे हैं, वहीं न्यायपालिका का यह संदेश साफ है कि अदालत किसी भी तरह के दबाव में काम नहीं करेगी। सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी से यह संदेश भी गया है कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन हर किसी के लिए अनिवार्य है। अदालत ने साफ कर दिया कि विरोध करना सबका अधिकार है, लेकिन न्यायपालिका को डराने या प्रभावित करने की कोशिशें कभी सफल नहीं होंगी।
आगामी दिनों में इस मामले की अगली सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के जवाब पर सबकी नजर रहेगी। 'द फ्रीलान्स' की टीम इस पूरे मामले पर जमीन से लेकर अदालत तक पैनी नजर बनाए हुए है। यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट के इन सवालों का क्या जवाब देता है और इस कानूनी प्रक्रिया से देश की चुनावी व्यवस्था में क्या सुधार देखने को मिलते हैं।



