13 साल का लंबा इंतजार हुआ खत्म, राजकुमार राव की मास्टरपीस फिल्म अब ओटीटी पर
हिंदी सिनेमा के वर्सेटाइल और मंझे हुए कलाकारों की जब भी बात होती है, तो राजकुमार राव का नाम सबसे ऊपर आता है। अपनी बेमिसाल अदायगी और हर किरदार में पूरी तरह ढल जाने की क्षमता के कारण उन्होंने दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बनाई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अभिनेता को बतौर लीड एक्टर बॉलीवुड में असली पहचान किस फिल्म से मिली थी? यह वही फिल्म थी जिसके लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार अपने नाम किया था। हम बात कर रहे हैं निर्देशक हंसल मेहता की साल 2012 में आई बहुचर्चित कोर्ट-रूम ड्रामा फिल्म 'शाहिद' की, जो अब आखिरकार 13 साल के लंबे अंतराल के बाद ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम वीडियो पर ऑनलाइन स्ट्रीम कर दी गई है।
यह फिल्म जब सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी, तब बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के लिहाज से यह कोई बहुत बड़ी कमर्शियल सक्सेस साबित नहीं हुई थी। इसके बावजूद इसकी पटकथा, निर्देशन और राजकुमार राव के रोंगटे खड़े कर देने वाले अभिनय ने इसे भारतीय सिनेमा की एक बेहतरीन कल्ट क्लासिक फिल्म बना दिया। हालांकि, डिजिटल स्ट्रीमिंग के इस दौर में जहां हर छोटी-बड़ी फिल्म रिलीज के कुछ ही हफ्तों बाद ओटीटी पर उपलब्ध हो जाती है, वहीं इस राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म को दर्शकों तक पहुंचने में पूरे तेरह साल का लंबा समय लग गया। इस बड़ी देरी ने सिनेमा प्रेमियों और समीक्षकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर एक मजबूत और मानवीय हक की बात कहने वाली फिल्म को इतने लंबे समय तक क्यों नजरअंदाज किया गया।
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वकील शाहिद आजमी की प्रेरणादायक और संघर्ष से भरी दास्तान
यह फिल्म किसी आम काल्पनिक कहानी पर आधारित नहीं है, बल्कि यह एक असली योद्धा की जिंदगी का जीवंत दस्तावेज है। फिल्म की कहानी जाने-माने वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता शाहिद आजमी के जीवन संघर्षों को करीब से दिखाती है। शाहिद आजमी ने अपने जीवन में उन बेकसूर लोगों की कानूनी पैरवी करने का बीड़ा उठाया था, जिन्हें देश के कड़े आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत गलत तरीके से आरोपी बना दिया गया था। वह एक ऐसा दौर था जब समाज और प्रशासनिक तंत्र में एक खास वर्ग के लोगों को कोर्ट द्वारा दोषी साबित किए जाने से पहले ही मीडिया और सिस्टम द्वारा अपराधी मान लिया जाता था। ऐसे डरावने और पक्षपातपूर्ण माहौल में शाहिद आजमी ने निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया और न्याय के बुनियादी अधिकारों के लिए लंबी और खतरनाक लड़ाई लड़ी।
अपने इसी जांबाज और अडिग रवैये के कारण शाहिद आजमी को कई ताकतों की आंखों की किरकिरी बनना पड़ा। न्याय की पैरोकारी करने की भारी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी। जब यह फिल्म बड़े पर्दे पर आई थी, तब इसने समीक्षकों की खूब वाहवाही बटोरी थी, लेकिन इसके बावजूद मुख्यधारा के स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स ने इसे अपने कैटलॉग में शामिल करने से लंबे समय तक परहेज किया। इस देरी के पीछे की असल वजहों पर अब फिल्म से जुड़े लोगों ने खुलकर अपनी बात रखनी शुरू कर दी है, जिससे फिल्म जगत की कई कड़वी सच्चाइयां सामने आ रही हैं।
राइटर अपूर्वा असरानी ने तोड़ी चुप्पी, उठाए 'डर की राजनीति' पर गंभीर सवाल
फिल्म 'शाहिद' के सह-लेखक और संपादक अपूर्वा असरानी ने इस फिल्म की ओटीटी रिलीज पर खुशी जताने के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और राजनीतिक व्यवस्था पर बहुत तीखे सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक लंबा और विचारोत्तेजक पोस्ट साझा किया है, जिसने मनोरंजन जगत में हलचल मचा दी है। असरानी ने लिखा कि इस शानदार फिल्म को एक अदद स्ट्रीमिंग होम मिलने में पूरे 13 साल का वक्त लग गया। उन्होंने बताया कि किस तरह देश में ऐसा राजनीतिक माहौल बनाया गया जहां असहमति रखने वाली आवाज़ों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, स्वतंत्र पत्रकारों और आरोपियों के कानूनी अधिकारों की रक्षा करने वालों को शक की नजर से देखा जाने लगा।
"नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली फिल्म शाहिद आखिरकार प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही है। हमारी फिल्म को स्ट्रीमिंग के लिए जगह मिलने में 13 साल लग गए। 'शाहिद' फिल्म शाहिद आजमी की कहानी है, जो एक वकील थे और उन्होंने उन लोगों का केस लड़ा जिन पर टेरर कानूनों के तहत आरोप लगे थे। उन्होंने उस माहौल में कानूनी प्रक्रिया का पालन करने के लिए लड़ाई लड़ी, जब लोगों को बेगुनाह साबित होने से पहले ही दोषी मान लिया जाता था। इसी हिम्मत की वजह से उनकी हत्या कर दी गई थी।" — अपूर्वा असरानी, सह-लेखक और संपादक ('शाहिद')
सिस्टम के अनुकूल कहानियां बनाने के दबाव पर भी खुलकर बोले असरानी
अपने सोशल मीडिया नोट में अपूर्वा असरानी ने आगे उन तमाम फिल्ममेकर्स, लेखकों और कलाकारों की मुश्किलों का भी जिक्र किया जो समाज के सुलगते मुद्दों और सच पर आधारित कहानियां पर्दे पर उतारना चाहते हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जो भी रचनाकार 'शाहिद' जैसी बेबाक और सच के करीब रहने वाली कहानियां कहना चाहते हैं, उन्हें हर कदम पर कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ता है। कई बार या तो उन्हें दर-दर भटकना पड़ता है या फिर सिस्टम के दबाव में आकर ऐसी कहानियां बनाने के लिए मजबूर होना पड़ता है जो सत्ता और व्यवस्था को पूरी तरह रास आती हों।
असरानी के अनुसार, आज के समय में कई ऐसी फिल्में और वेब सीरीज आसानी से बड़े बैनर और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पा लेती हैं जो कलात्मक रूप से भले ही औसत दर्जे की हों, लेकिन राजनीतिक रूप से पूरी तरह 'कोशर' यानी सिस्टम के अनुकूल होती हैं। यही वजह है कि वे आसानी से राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीत लेती हैं और उन्हें तुरंत दर्शक भी मिल जाते हैं। इसके विपरीत, जो सिनेमा समाज के काले सच को आईना दिखाता है और व्यवस्था से तीखे सवाल पूछता है, उसे सेंसरशिप और रिलीज के स्तर पर अनगिनत बाधाओं का सामना करना पड़ता है। 'शाहिद' का 13 साल बाद ओटीटी पर आना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि सच की आवाज़ को दबाया तो जा सकता है, लेकिन उसे हमेशा के लिए मिटाया नहीं जा सकता।
निष्कर्ष: ओटीटी पर 'शाहिद' की दस्तक से खुली नई बहस
अमेजन प्राइम वीडियो पर राजकुमार राव की इस मास्टरपीस फिल्म की स्ट्रीमिंग शुरू होने के बाद से एक बार फिर से सिनेमा प्रेमियों के बीच वैचारिक चर्चा छिड़ गई है। दर्शक अब इस बात की चर्चा कर रहे हैं कि कैसे बेहतरीन कंटेंट वाली फिल्मों को सालों तक फाइलों या प्लेटफॉर्म्स के चक्कर काटने पड़ते हैं। फिल्म 'शाहिद' सिर्फ एक बायोपिक भर नहीं है, बल्कि यह उस न्याय व्यवस्था और मानवीय मूल्यों की कहानी है जो हर दौर में प्रासंगिक बनी रहती है। अब जब यह फिल्म ओटीटी के विशाल मंच पर आ चुकी है, तो नई पीढ़ी के दर्शकों को यह देखने का मौका मिलेगा कि कैसे एक साधारण वकील ने विषम परिस्थितियों में भी इंसाफ की मशाल जलाए रखी थी।










