13 साल बाद डिजिटल दुनिया में लौटी राजकुमार राव की 'शाहिद'
हिंदी सिनेमा में वर्सेटाइल अभिनेताओं की गिनती जब भी होगी, राजकुमार राव का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। उनकी अभिनय यात्रा को एक नई दिशा देने वाली और उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाने वाली चर्चित फिल्म 'शाहिद' आखिरकार ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आ गई है। साल 2013 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई यह फिल्म अब जाकर अमेजन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही है। हालांकि, इस फिल्म के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आने से जितनी खुशी फैंस को हुई है, उससे कहीं ज्यादा चर्चा इसके लेखक और एडिटर के एक तीखे सवाल ने छेड़ दी है।
हंसल मेहता के निर्देशन में बनी यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील शाहिद आजमी की जिंदगी पर आधारित थी। फिल्म में राजकुमार राव ने मुख्य भूमिका निभाकर अपनी अदायगी का लोहा मनवाया था। सीमित बजट में बनी होने के बावजूद इस कोर्ट-रूम ड्रामा ने समीक्षकों और दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी थी। इसके बावजूद, इतने सालों तक किसी भी बड़े स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर इसका उपलब्ध न होना अपने आप में कई सवाल खड़े करता रहा है।
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लेखक अपूर्व असरानी ने उठाए गंभीर सवाल, कहा- आखिर अब क्यों?
फिल्म के लेखक और संपादक अपूर्व असरानी ने 'शाहिद' की इस देरी से हुई ओटीटी रिलीज पर खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक लंबी पोस्ट शेयर करते हुए लिखा कि वह लंबे समय से सोचते रहे हैं कि आखिर इस दमदार और सच्चाई को बयां करने वाली फिल्म को इतने सालों तक डिजिटल मंच क्यों नहीं मिला। उन्होंने फिल्म की रिलीज के वक्त और मौजूदा दौर के सामाजिक-राजनीतिक हालात की तुलना करते हुए कई तीखे सवाल दागे हैं।
असरानी ने लिखा कि शाहिद आजमी जैसे वकील की कहानी पर आधारित यह फिल्म एक ऐसे दौर में बनाई गई थी, जब आतंकवाद से जुड़े मामलों में फंसे बेकसूरों को निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया दिलाने के लिए संघर्ष करना पड़ता था। उन्होंने याद किया कि कैसे शाहिद आजमी को उनके इसी मानवीय और साहसिक कार्यों की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी, जब साल 2010 में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
"मैं अक्सर सोचता रहा हूं कि शाहिद इतने लंबे समय तक बिना किसी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के क्यों रही। यह 2014 से एक साल पहले रिलीज हुई थी। फिर एक ऐसा राजनीतिक माहौल आया, जिसमें असहमति जताने वालों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और आरोपियों के अधिकारों का बचाव करने वालों को लगातार संदेह की नजर से देखा जाने लगा। तो अब 2026 में इस फिल्म को आखिरकार स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म क्यों मिल रहा है? क्या माहौल बदल गया है?" — अपूर्व असरानी, लेखक एवं एडिटर
डर की राजनीति और सेंसरशिप के साए में संवेदनशील सिनेमा
अपूर्व असरानी ने अपनी पोस्ट के जरिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के भीतर के उस डर और दबाव की ओर भी इशारा किया है, जो पिछले कुछ सालों में संवेदनशील और राजनीतिक रूप से मुखर विषयों पर फिल्में बनाने वाले कलाकारों पर हावी रहा है। उनके मुताबिक, जब देश में असहमति की आवाज़ों को दबाने का माहौल बनने लगा, तब फिल्मकारों ने भी ऐसे विषयों से किनारा करना शुरू कर दिया जो व्यवस्था या सत्ता से सवाल पूछते हों।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि इस तरह के सिनेमा को जानबूझकर मुख्यधारा से दूर रखा गया ताकि समाज के एक बड़े वर्ग तक सच और न्याय की लड़ाई लड़ने वाले नायकों की दास्तान न पहुंच सके। हालांकि, अब इतने लंबे अंतराल के बाद जब यह फिल्म ओटीटी पर आई है, तो यह देखना दिलचस्प है कि दर्शक इसे किस तरह से अपना रहे हैं और यह फिल्म आज के समय में कितनी प्रासंगिक बनी हुई है।
फिल्म की कहानी और इसके ऐतिहासिक राष्ट्रीय पुरस्कार का सफर
साल 2012 में टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर होने के बाद 'शाहिद' को साल 2013 में भारतीय सिनेमाघरों में उतारा गया था। बॉक्स ऑफिस पर कमर्शियल रूप से भले ही यह फिल्म बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित न हुई हो, लेकिन इसकी कलात्मकता और मजबूत पटकथा ने इतिहास रच दिया था। 61वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में इस फिल्म ने दो बड़े पुरस्कार अपने नाम किए थे।
राजकुमार राव को इसके लिए बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला था, जबकि हंसल मेहता को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के रूप में सम्मानित किया गया था। इस फिल्म ने राजकुमार राव को एक स्थापित अभिनेता के रूप में पहचान दिलाई थी, जो किसी भी जटिल किरदार में पूरी तरह ढल सकते हैं। अब प्राइम वीडियो पर इसकी मौजूदगी से एक बार फिर उन युवाओं और दर्शकों तक यह कहानी पहुंचेगी जो सिनेमाघरों में इसे देखने से चूक गए थे।
निष्कर्ष और दर्शकों की प्रतिक्रिया
अपूर्व असरानी के इन सवालों ने फिल्म बिरादरी से लेकर आम दर्शकों के बीच भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है। लोग सोशल मीडिया पर इस बात की चर्चा कर रहे हैं कि कैसे अच्छे और समाज को आईना दिखाने वाले सिनेमा को अक्सर राजनीतिक और व्यावसायिक दबावों का सामना करना पड़ता है। 'शाहिद' जैसी फिल्म का ओटीटी पर आना महज एक रूटीन रिलीज नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि भले ही समय लगे, लेकिन सच्ची और बेबाक कहानियां आखिरकार अपनी जगह बना ही लेती हैं।








