नई दिल्ली और हनुमानगढ़ के मैदानों से ग्राउंड जीरो रिपोर्ट — देश की राजधानी दिल्ली में किसानों के आंदोलन को लेकर सरगर्मी एक बार फिर तेज हो गई है। हाल ही में संयुक्त किसान मोर्चा और अन्य संगठनों की एक अहम बैठक हुई थी। इस बैठक में बड़ा फैसला लेते हुए 29 नवंबर को होने वाले ट्रैक्टर संसद मार्च को फिलहाल स्थगित कर दिया गया। इस फैसले के बाद किसानों के अगले कदम को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। लेकिन भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने साफ कर दिया है कि किसानों का संघर्ष थमा नहीं है।
राजस्थान के हनुमानगढ़ में एक जनसभा को संबोधित करते हुए राकेश टिकैत ने किसानों को पूरी तरह सतर्क रहने की सलाह दी। उन्होंने अपने खास अंदाज में कहा कि सभी किसान अपने ट्रैक्टरों के बंपर मजबूत रखें। टिकैत ने जोर देकर कहा कि समय आने पर यही ट्रैक्टर किसानों के काम आएंगे और उनकी ताकत बनेंगे। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल ही में जंतर-मंतर पर सीजेपी के बैनर तले बड़ा विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था। इस प्रदर्शन में राकेश टिकैत के साथ-साथ मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे पाटिल की मौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी थी।
हनुमानगढ़ में राकेश टिकैत की दो टूक चेतावनी
हनुमानगढ़ की इस रैली में किसानों की भारी भीड़ जुटी थी। टिकैत ने मंच से सरकार को घेरते हुए कहा कि किसानों की मांगें अभी पूरी नहीं हुई हैं। उन्होंने कहा कि भले ही संसद मार्च को अभी टाला गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसान अपनी लड़ाई भूल गए हैं। ट्रैक्टरों को मजबूत रखने की बात कहकर उन्होंने सरकार को यह संदेश दिया है कि किसान किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार बैठे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे किसानों ने भी उनके इस आह्वान का समर्थन किया है।
दूसरी तरफ, जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी प्रोटेस्ट में देश भर के मुद्दों पर तीखी आवाजें उठीं। मनोज जरांगे पाटिल और राकेश टिकैत का एक मंच पर आना इस बात का संकेत है कि देश के किसान और ग्रामीण वर्ग अब आपसी एकजुटता को और मजबूत कर रहे हैं। हालांकि 29 नवंबर का मार्च भले ही स्थगित हुआ हो, लेकिन किसान नेताओं की ओर से लगातार बैठकें की जा रही हैं। आने वाले दिनों में आंदोलन की रूपरेखा क्या होगी, इस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
ट्रैक्टर मार्च स्थगित होने के पीछे की असल वजह
प्रशासनिक सूत्रों और किसान संगठनों से मिली जानकारी के मुताबिक, 29 नवंबर के संसद मार्च को शांतिपूर्ण माहौल बनाए रखने और पुलिस प्रशासन के साथ हुई बैठकों के बाद टाला गया। किसान नेताओं का कहना है कि वे किसी भी तरह का टकराव नहीं चाहते हैं, लेकिन अपनी बात मनवाने के लिए दबाव बनाए रखेंगे। दिल्ली की सीमाओं पर पिछले कुछ सालों से चल रहे किसान आंदोलनों के अनुभव को देखते हुए इस बार रणनीति में थोड़ा बदलाव किया गया है।
जमीनी स्तर पर किसानों का मूड साफ तौर पर गुस्से और जोश का मिला-जुला रूप है। उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में बैठकों का दौर लगातार जारी है। टिकैत के बंपर मजबूत रखने वाले बयान को गांवों में एक कोडवर्ड की तरह देखा जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह निकाला जा रहा है कि किसान कभी भी दिल्ली की तरफ कूच करने के लिए बुलावा पा सकते हैं। 'द फ्रीलान्स' की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे ही कोई नया अपडेट आएगा, हम आप तक सबसे पहले पहुंचाएंगे।





