न्यूयार्क/वाशिंगटन: संयुक्त राष्ट्र के गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी और संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय खबर सामने आ रही है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से सुलग रही कूटनीतिक सुलगन अब एक खुले टकराव में बदलती दिख रही है। अमेरिकी राजनीतिक परिदृश्य में अपने सख्त रुख के लिए पहचाने जाने वाले मार्को रुबियो ने न्यूयॉर्क आए ईरानी प्रतिनिधिमंडल को तय समय से पहले शहर छोड़ने का सख्त आदेश जारी कर दिया है। 'द फ्रीलान्स' की ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन टीम द्वारा जुटाई गई जानकारी के अनुसार, यह फैसला दोनों देशों के बीच जिनेवा से लेकर न्यूयॉर्क तक चल रही गुप्त और औपचारिक वार्ताओं के अचानक पूरी तरह ठप हो जाने के बाद लिया गया है।
वार्ता के विफल होने के पीछे के भू-राजनीतिक समीकरण
संयुक्त राष्ट्र महासभा या अन्य उच्चस्तरीय बैठकों के सिलसिले में न्यूयॉर्क में मौजूद ईरानी राजनयिकों और अमेरिकी प्रशासन के बीच पिछले कुछ हफ्तों से परदे के पीछे बातचीत के प्रयास चल रहे थे। हालांकि, क्षेत्रीय सुरक्षा, परमाणु कार्यक्रम और मध्य पूर्व में प्रॉक्सी वार जैसे मुद्दों पर दोनों पक्ष किसी भी न्यूनतम सहमति पर पहुंचने में नाकाम रहे। विश्व मंच पर शांति स्थापित करने के दावों के बीच, जब कूटनीतिक संवाद के सारे रास्ते बंद होते दिखे, तो अमेरिकी पक्ष का सब्र जवाब दे गया। मार्को रुबियो के इस अप्रत्याशित और आक्रामक निर्देश ने साफ कर दिया है कि अमेरिका अब ईरान के साथ कूटनीतिक वार्ताओं में और अधिक समय गंवाने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
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ईरान की तीखी प्रतिक्रिया: 'यह संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन'
अमेरिकी आदेश के सामने आने के तुरंत बाद तेहरान की ओर से भी बेहद तीखी प्रतिक्रिया दर्ज कराई गई है। ईरानी विदेश मंत्रालय और संयुक्त राष्ट्र में उनके स्थायी मिशन ने इस कदम को अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक परंपराओं, मेजबान देश के रूप में संयुक्त राष्ट्र के समझौतों और संप्रभुता का खुला उल्लंघन करार दिया है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि अमेरिका वैश्विक मंच का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक धौंस जमाने के लिए कर रहा है। तेहरान ने स्पष्ट किया है कि इस तरह के दबाव के आगे झुकने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता, और वे अपनी स्वतंत्र कूटनीतिक और क्षेत्रीय नीतियों पर अडिग रहेंगे।
संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक कूटनीति पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभाव
इस घटनाक्रम ने न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय की सुरक्षा और कूटनीतिक माहौल पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारों का मानना है कि यदि मेजबान देश इस तरह एकपक्षीय रूप से किसी देश के प्रतिनिधिमंडल को निष्कासित करने या शहर छोड़ने का अल्टीमेटम देने लगे, तो वैश्विक संस्थाओं की निष्पक्षता और उनकी कार्यप्रणाली पर गहरा असर पड़ेगा।
- संयुक्त राष्ट्र की मेजबानी के नियमों और अमेरिका के घरेलू कानूनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है।
- पश्चिम एशिया में पहले से सुलग रही जंग की आग अब संयुक्त राष्ट्र के मंच तक खुलकर पहुंचती दिख रही है।
- यूरोपीय देश इस तनाव के बीच मध्यस्थता की अपनी पारंपरिक भूमिका को लेकर पसोपेश में हैं।
- वैश्विक अर्थव्यवस्था और कच्चे तेल की कीमतों पर भी इस राजनयिक भूचाल का असर पड़ना तय माना जा रहा है।
भविष्य का संकट: क्या कूटनीति के दरवाजे हमेशा के लिए बंद?
एक वरिष्ठ फील्ड रिपोर्टर के तौर पर हमारी पड़ताल यह इशारा करती है कि अमेरिका और ईरान के संबंध अब तक के सबसे निचले पायदान पर पहुंच चुके हैं। मार्को रुबियो का यह रुख केवल एक तात्कालिक निष्कासन आदेश नहीं है, बल्कि यह आने वाले दिनों में वाशिंगटन की ईरान नीति में एक बड़े और खतरनाक बदलाव का संकेत है। यदि बातचीत के तमाम दरवाजे बंद हो जाते हैं, तो मध्य पूर्व में किसी भी सैन्य दुस्साहस या प्रॉक्सी संघर्ष के बढ़ने की आशंका कई गुना बढ़ जाएगी। दुनिया भर की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या संयुक्त राष्ट्र नेतृत्व इस अमेरिकी हस्तक्षेप पर कोई औपचारिक रुख अपनाता है या नहीं।








