रूस की राजनीति में पुतिन का जलवा बरकरार, संसदीय चुनावों में ऐतिहासिक जीत
रूस की राजनीति में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की पकड़ एक बार फिर से बेहद मजबूत साबित हुई है। हाल ही में संपन्न हुए देश के संसदीय चुनावों के अंतिम परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि क्रेमलिन का राजनीतिक नियंत्रण पूरी तरह से অক্ষुण्ण है। चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रपति पुतिन की मुख्य सहयोगी पार्टी 'यूनाइटेड रशिया' ने स्टेट ड्यूमा में तीन-चौथाई से भी अधिक सीटों पर प्रचंड विजय हासिल की है। यह परिणाम रूसी राजनीतिक इतिहास में एक नया मील का पत्थर माना जा रहा है, जिससे यह साफ हो गया है कि तमाम अंदरूनी और बाहरी दबावों के बावजूद पुतिन की लोकप्रियता और सत्ता पर उनकी पकड़ पर कोई आंच नहीं आई है।
यह पूरा चुनावी मुकाबला ऐसे समय में आयोजित किया गया था जब रूस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है और देश की अर्थव्यवस्था पर कड़ा दबाव बना हुआ है। इसके अलावा, यूक्रेन के साथ चल रहे लंबे सैन्य संघर्ष और रूसी भूभाग पर होने वाले ड्रोन हमलों की वजह से भी सुरक्षा को लेकर एक अलग तरह का माहौल बना हुआ था। इन तमाम विषम परिस्थितियों और प्रतिकूल हवाओं के बीच भी सरकारी तंत्र और राजनीतिक रणनीति के जरिए क्रेमलिन ने अपनी स्थिति को जमीन पर और अधिक पुख्ता करने में सफलता प्राप्त की है।
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विपक्ष की राहें हुईं बेहद कठिन, मीडिया और प्रचार पर रहा कड़ा पहरा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार के चुनावों में विपक्षी दलों और असंतुष्ट उम्मीदवारों के लिए अपनी जमीन तलाशना लगभग असंभव सा बना दिया गया था। चुनाव प्रक्रिया पर शासकीय मशीनरी का कड़ा पहरा था और मतदान से पहले ही विपक्ष के कई प्रमुख चेहरों को या तो हाशिए पर धकेल दिया गया था या वे चुनावी मैदान से बाहर कर दिए गए थे। सरकारी मीडिया का व्यापक और आक्रामक प्रचार तंत्र पूरी तरह से सत्तारूढ़ दल के पक्ष में माहौल तैयार करने में जुटा रहा, जिससे आम मतदाताओं की सोच पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि रूस के भीतर जिस तरह का प्रशासनिक और राजनीतिक ढांचा बीते कुछ वर्षों में तैयार किया गया है, उसमें किसी भी बड़े बदलाव की गुंजाइश बहुत कम बचती है। चुनाव आयोग द्वारा घोषित परिणामों से यह बात खुलकर सामने आ गई है कि विपक्षी खेमा इन चुनावों में कोई खास चुनौती पेश करने में पूरी तरह नाकामयाब रहा। कड़े नियमों और सुरक्षा प्रबंधों के बीच संपन्न हुए इस लोकतांत्रिक अनुष्ठान में आम जनता ने भी बढ़-चढ़कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, हालांकि अधिकांश विश्लेषक इसे सत्ता के पक्ष में एकतरफा झुकाव के रूप में ही देख रहे हैं।
यूक्रेन संघर्ष की पृष्ठभूमि में हुए पहले चुनाव और जनता की भागीदारी
वर्ष 2022 में यूक्रेन के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किए जाने के बाद यह रूस का पहला ऐसा बड़ा संसदीय चुनाव था, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई थीं। इस चुनाव की महत्ता इस बात से भी बढ़ जाती है कि इसमें उन तमाम क्षेत्रों के नागरिकों को भी मतदान प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया, जिन पर मॉस्को ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान अपने नियंत्रण में ले लिया था। इसके अलावा, क्रीमिया प्रायद्वीप के मतदाताओं ने भी बढ़-चढ़कर इस चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लिया, जिसे रूस ने बहुत पहले ही अपने भूभाग में मिला लिया था।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, देश भर के कुल 11.1 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से लगभग 60 प्रतिशत लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। मतदान प्रतिशत को बढ़ाने और अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए चुनाव अधिकारियों ने कई इलाकों में आधुनिक डिजिटल तकनीकों का सहारा लिया, जिसमें ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा भी शामिल थी। हालांकि, विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इन डिजिटल माध्यमों की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं, लेकिन सरकार ने इन सभी आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए इसे एक सफल और निष्पक्ष चुनाव करार दिया है।
पुतिन की नीतियों पर मुहर या मजबूरी का नतीजा? जानकारों की राय
राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या यह भारी बहुमत वाकई में आम जनता का राष्ट्रपति पुतिन की नीतियों के प्रति अटूट समर्थन है या फिर यह कड़े प्रशासनिक नियंत्रण का परिणाम मात्र है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का तर्क है कि पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बाद रूसी समाज में एक प्रकार की राष्ट्रवादी भावना को बढ़ावा मिला है, जिसका सीधा फायदा पुतिन की पार्टी को मिला है। जनता के एक बड़े वर्ग ने संकट के इस दौर में स्थिरता को प्राथमिकता दी है, जिसके चलते उन्होंने बदलाव के बजाय मौजूदा नेतृत्व पर ही अपना भरोसा जताया है।
"रूस के इन चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि पश्चिमी देशों के भारी दबाव और आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद क्रेमलिन अपनी घरेलू और विदेश नीतियों पर पूरी मजबूती के साथ आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र है। यह परिणाम पुतिन के नेतृत्व में जनता के अटूट विश्वास का प्रत्यक्ष प्रमाण है।" — दिमित्री पेसकोव, क्रेमलिन प्रवक्ता
भविष्य की राजनीतिक दिशा और वैश्विक कूटनीति पर इसका असर
स्टेट ड्यूमा में तीन-चौथाई बहुमत हासिल करने के बाद अब राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए नीतिगत फैसले लेना और भी ज्यादा आसान हो जाएगा। इस प्रचंड बहुमत के बल पर सरकार बिना किसी रुकावट के अपने विधाई एजेंडे को आगे बढ़ा सकती है और संविधान या अन्य कानूनों में मनचाहे बदलाव करने के लिए पूरी तरह से अधिकृत होगी। इसका सीधा असर रूस की आंतरिक राजनीति के साथ-साथ उसकी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी देखने को मिलेगा, खासकर पश्चिमी देशों के साथ चल रहे उसके दीर्घकालिक टकराव के संदर्भ में।
आगामी समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि रूस अपनी इस राजनीतिक स्थिरता का उपयोग अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए किस प्रकार करता है। वैश्विक मंच पर रूस अपने ऊपर लगे प्रतिबंधों के बावजूद अपनी स्थिति को और मजबूत करने की दिशा में नए रणनीतिक कदम उठा सकता है। बहरहाल, इन चुनावों के नतीजों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि रूस के राजनीतिक पटल पर आने वाले कई वर्षों तक पुतिन का प्रभाव और उनका दबदबा पूरी तरह से निर्विवाद बना रहने वाला है।






