सिनेमा के पर्दे पर लोक आस्था के महापर्व की अनूठी छटा
भारतीय मुख्यधारा के सिनेमा ने लंबे समय तक देश की लोक संस्कृति और पारंपरिक त्योहारों को वह स्थान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। हालांकि, समय के साथ अब निर्देशक और निर्माता अपनी कहानियों में मिट्टी की खुशबू को पिरोना पसंद कर रहे हैं। इसी कड़ी में सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की आने वाली फिल्म 'द वन' चर्चा का विषय बनी हुई है। इस फिल्म की पूरी कहानी 'देवांचल' नामक एक काल्पनिक गांव और वहां मनाए जाने वाले छठ पूजा के भव्य उत्सव पर आधारित है। फिल्म निर्माताओं ने लोक आस्था के इस महान पर्व की हर एक रस्म को बड़े ही प्रामाणिक ढंग से पर्दे पर उतारने का प्रयास किया है।
पारंपरिक रूप से बॉलीवुड फिल्मों में इस तरह के आयोजनों को या तो नजरअंदाज कर दिया जाता था या फिर प्रतीकात्मक रूप से दिखाया जाता था। लेकिन 'द वन' इस लिहाज से अलग है क्योंकि यह छठ पूजा के जश्न को कहानी के केंद्र में रखती है। त्योहार की तैयारियां, घर की महिलाओं द्वारा ठेकुआ जैसे पारंपरिक पकवानों को बनाने की प्रक्रिया और पूरे गांव का एक सूत्र में बंध जाना, दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाला अनुभव देता है। फिल्म में कलाकारों का अभिनय तो खास है ही, लेकिन इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है, जो दर्शकों को अपनी जड़ों से जोड़ती है।
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'बिहार कोकिला' शारदा सिन्हा को ट्रिब्यूट और सुरीली श्रद्धांजलि
जब छठ महापर्व की बात आती है, तो पद्म विभूषण से सम्मानित शारदा सिन्हा की आवाज के बिना वह उत्सव अधूरा सा लगता है। 'द वन' फिल्म में उनकी इसी कमी को पूरा करते हुए उन्हें एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी गई है। फिल्म के पहले हिस्से में जब मुख्य किरदार देवांचल लौटते हैं, तो बैकग्राउंड में शारदा सिन्हा का गाया हुआ बेहद लोकप्रिय छठ गीत 'पहिले पहिल हम कईनी' गूंज उठता है। इस गाने के बजते ही सिनेमाघरों का माहौल पूरी तरह बदल जाता है और दर्शक पुरानी यादों में खो जाते हैं।
संगीत प्रेमियों और शारदा सिन्हा के प्रशंसकों के लिए यह पल किसी भावनात्मक झटके से कम नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लोग अपने अनुभव साझा कर रहे हैं और कह रहे हैं कि बड़े पर्दे पर मां शारदा की आवाज को सुनना एक रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव है। फिल्म में इस गाने का इस्तेमाल केवल एक ऑडियो ट्रैक के रूप में नहीं किया गया है, बल्कि यह कहानी के भावनात्मक ताने-बाने को मजबूत करने का काम करता है। यह उन अनगिनत लोगों को समर्पित है जो दुनिया के किसी भी कोने में हों, लेकिन छठ के समय अपनी मिट्टी की ओर खिंचे चले आते हैं।
सिनेमाघरों में उमड़ रही भावनाएं और दर्शकों की प्रतिक्रिया
जैसे ही फिल्म के इस हिस्से के दृश्य सोशल मीडिया पर सामने आए, प्रतिक्रियाओं का बाढ़ सा आ गया। इंस्टाग्राम और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स पर दर्शक खुलकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे हैं। एक यूजर ने लिखा कि थिएटर की बेहतरीन साउंड क्वालिटी में शारदा सिन्हा की आवाज सुनना आंखें नम कर देने वाला पल था। लोग इस बात से बेहद खुश हैं कि मुख्यधारा का सिनेमा अब क्षेत्रीय संस्कृति और महान कलाकारों को इस तरह का सम्मान दे रहा है।
यह प्रतिक्रिया इस बात का प्रमाण है कि दर्शक अब ऐसी कहानियों को देखना चाहते हैं जो उनकी संस्कृति, परंपराओं और भावनाओं से गहराई से जुड़ी हों। लोक गीतों की मिठास जब आधुनिक तकनीक के साथ मिलती है, तो उसका प्रभाव दोगुना हो जाता है। 'द वन' ने इस फॉर्मूले को बखूबी अपनाया है, जिसके चलते रिलीज से पहले ही यह फिल्म चर्चा के केंद्र में आ गई है।
फिल्म की कहानी: रिश्तों के उलझाव और पुराने जख्मों की दास्तान
फिल्म 'द वन' सिर्फ एक सांस्कृतिक उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी और रहस्मयी कहानी भी छिपी हुई है। अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा फिल्म में ऋषि कुमार का किरदार निभा रहे हैं, जो मूल रूप से देवांचल के रहने वाले हैं लेकिन अपनी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ मुंबई में एक आधुनिक जीवन बिताते हैं। ममता एक स्कूल टीचर हैं और ऋषि एक बिल्डर के रूप में काम करते हैं। दोनों अपने जीवन में एक नए मेहमान यानी बच्चे की चाह रखते हैं, लेकिन मेडिकल कारणों से उनकी कोशिशें कामयाब नहीं हो पाती हैं।
आईवीएफ (IVF) प्रक्रिया के भारी खर्च को उठाने के लिए ऋषि को रुपयों की आवश्यकता होती है। इसी बीच उन्हें अपने पैतृक गांव देवांचल से एक जमीन का नोटिस मिलता है। वह उस जमीन को बेचकर अपनी समस्या का समाधान करने का फैसला करते हैं और अपनी पत्नी के साथ गांव के लिए रवाना होते हैं। कहानी में असली मोड़ तब आता है जब वे त्योहार से ठीक पहले एक वर्जित क्षेत्र माने जाने वाले 'देव वन' में प्रवेश करते हैं और वहां अजीबोगरीब घटनाओं का सामना करते हैं।
नास्तिकता और परंपराओं के बीच उलझे ऋषि कुमार
ऋषि कुमार का किरदार एक आधुनिक सोच वाले व्यक्ति का है जो नास्तिक है और पुरानी परंपराओं या अंधविश्वासों पर सवाल उठाता है। देवांचल में घटित होने वाली घटनाओं के पीछे वह किसी अलौकिक शक्ति को नहीं बल्कि इंसानी भूल और लचर व्यवस्था को जिम्मेदार मानता है। फिल्म में एक पुराना और दुखद हादसा भी दिखाया गया है, जिसे बेहतर मेडिकल सुविधाओं और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए टाला जा सकता था।
जब रहस्य उनके दरवाजे तक पहुंच जाता है, तो ऋषि को मजबूरन इन सभी घटनाओं की तह तक जाना पड़ता है। वह परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करते हैं। यह वैचारिक संघर्ष फिल्म की पटकथा को और अधिक दिलचस्प बनाता है।
शारदा सिन्हा की विरासत और उनका अमर योगदान
इस पूरी चर्चा के केंद्र में महान गायिका शारदा सिन्हा का व्यक्तित्व है, जिन्होंने अपने जीवनकाल में लोक संगीत को वैश्विक पहचान दिलाई। 5 नवंबर 2024 को दिल्ली के एम्स अस्पताल में 72 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था। सेप्टिसीमिया के कारण हुए रिफ्रैक्टरी शॉक ने उनकी जान ले ली थी। अपने लंबे और यशस्वी करियर में उन्हें 1991 में पद्म श्री और 2018 में पद्म भूषण से नवाजा गया था। उनकी कला के प्रति समर्पण को देखते हुए वर्ष 2025 में उन्हें मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से अलंकृत किया गया।
फिल्म 'द वन' में उनके गीत का होना इस बात का प्रमाण है कि कलाकार भले ही इस दुनिया से चले जाएं, लेकिन उनकी आवाज और उनके द्वारा गढ़े गए सुर हमेशा जीवित रहते हैं। देवांचल के काल्पनिक गांव की कहानी के जरिए शारदा सिन्हा की यादें एक बार फिर हर भारतीय के दिल में ताजा हो गई हैं।
"थिएटर में जब मां शारदा की आवाज गूंजी, तो ऐसा लगा मानो हम सब अपने घर और अपनों के बीच लौट आए हैं। यह अनुभव शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।" — एक दर्शक, सोशल मीडिया प्रतिक्रिया
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि 'द वन' केवल एक मनोरंजक फिल्म नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर और लोक परंपराओं का एक दस्तावेज है। शारदा सिन्हा के गीतों के माध्यम से यह फिल्म दर्शकों को एक ऐसे सफर पर ले जाती है, जहां मनोरंजन के साथ-साथ गहरी संवेदनाएं भी जुड़ी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर क्या कमाल करती है, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इसने लोगों के दिलों में अपनी जगह अभी से बना ली है।







