सड़कों पर दौड़ती मौत की गाड़ियां और सिस्टम की नाकामी
देश की सड़कों पर फर्राटा भर रही निजी स्लीपर बसें इन दिनों यात्रियों के लिए सुरक्षित सफर का साधन नहीं, बल्कि चलती-फिरती चिता बनती जा रही हैं। हाल ही में यमुना एक्सप्रेसवे पर जेवर के नजदीक एक एसी स्लीपर बस में अचानक लगी भीषण आग ने नौ लोगों की जिंदगी लील ली। इस हृदयविदारक हादसे ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि किस तरह मुनाफे की हवस में इंसानी जिंदगियों को ताक पर रखा जा रहा है। दिल्ली के मोरी गेट, कश्मीरी गेट और आनंद विहार जैसे प्रमुख अंतरराज्यीय बस अड्डों से रोजाना हजारों यात्री सफर के लिए निकलते हैं, लेकिन उनके मन में यह डर हमेशा बना रहता है कि वे अपनी मंजिल तक सुरक्षित पहुंचेंगे भी या नहीं।
इस हादसे के बाद परिवहन सुरक्षा और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर तमाम गंभीर सवाल उठने लगे हैं। क्या इन बसों में सफर करने वाले यात्रियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं? क्या वाहन मालिक और परिवहन विभाग नियमों का कड़ाई से पालन करवा रहे हैं? इन तमाम सवालों के बीच यह साफ हो चुका है कि जब तक प्रशासनिक लापरवाही और अवैध गतिविधियों पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक ऐसे हादसे थमने वाले नहीं हैं।
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इलेक्ट्रिकल डिजाइन और वायरिंग की अनदेखी
विशेषज्ञों का मानना है कि स्लीपर बसों में बार-बार आग लगने की घटनाएं किसी एक छोटी सी चूक का परिणाम नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे तकनीकी स्तर पर की जाने वाली गंभीर लापरवाही है। आधुनिक और सुरक्षित कमर्शियल गाड़ियों में कंप्यूटराइज्ड कंट्रोल यानी मल्टिप्लेक्सिंग सिस्टम का उपयोग किया जाता है। यह तकनीक स्वतः ही इलेक्ट्रिकल लोड को संतुलित रखती है, एम्पेयर ओवरलोडिंग को रोकती है और तारों को अत्यधिक गर्म होने से बचाती है।
दुर्भाग्य की बात यह है कि लोकल स्तर पर गाड़ियां तैयार करने वाले फैब्रिकेटर्स इन उन्नत तकनीकों से किनारा कर लेते हैं। वे लागत कम करने के चक्कर में घटिया वायरिंग और इलेक्ट्रिकल डिजाइन का इस्तेमाल करते हैं। परिणाम यह होता है कि जरा सा शॉर्ट सर्किट पूरी बस को चंद मिनटों में राख में बदल देता है। यात्रियों को अपनी जान बचाने के लिए संभलने का मौका तक नहीं मिलता।
फर्जी फिटनेस और कागजी दस्तावेजों का काला खेल
दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों से संचालित होने वाली अधिकांश निजी स्लीपर बसों की जमीनी हकीकत बेहद चौंकाने वाली है। परिवहन विशेषज्ञों के अनुसार, इनमें से ज्यादातर गाड़ियों का असली फिटनेस परीक्षण कभी होता ही नहीं है। कागजों में हेरफेर कर इन बसों का रजिस्ट्रेशन पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, मेघालय या नागालैंड में दिखा दिया जाता है। बस के मालिक कभी उन राज्यों का रुख भी नहीं करते, फिर भी वहां से फर्जी फिटनेस सर्टिफिकेट जारी हो जाते हैं।
इसके अलावा, निजी स्तर पर चलने वाले कई फिटनेस सेंटर भी बिना किसी भौतिक जांच के इन खतरनाक और जर्जर गाड़ियों को सड़क पर दौड़ाने की अनुमति दे देते हैं। इस पूरे खेल में सांठगांठ इतनी गहरी है कि नियमों की धज्जियां उड़ाने वालों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।
तकनीकी पदों पर गैर-तकनीकी लोगों का कब्जा
सड़क सुरक्षा के मोर्चे पर सरकारी तंत्र की विफलता का एक बड़ा कारण यह भी है कि मोटर व्हीकल इंस्पेक्टर जैसे अति महत्वपूर्ण तकनीकी पदों पर क्लेरिकल और गैर-तकनीकी कर्मचारियों को बैठा दिया गया है। इन लोगों को गाड़ियों की तकनीकी जटिलताओं और सुरक्षा मानकों की गहरी समझ नहीं होती।
जब निरीक्षण करने वाले अधिकारी ही तकनीकी मामलों से अनजान होंगे, तो वाहनों की फिटनेस जांच महज एक कागजी औपचारिकता बनकर रह जाएगी। देश में हर साल सड़क हादसों में डेढ़ लाख से अधिक लोग अपनी जान गंवाते हैं, लेकिन हादसे के बाद कुछ दिनों की कागजी कार्रवाई और बयानबाजी के अलावा कोई ठोस बदलाव नजर नहीं आता।
परिवहन संघ के गंभीर सवाल और भविष्य की चेतावनी
इस भीषण हादसे के बाद देश की प्रतिष्ठित ट्रांसपोर्ट संस्था 'ऑल इंडिया मोटर एंड गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन' ने सरकार के सामने कड़े सवाल खड़े किए हैं। एसोसिएशन के प्रमुख ने संबंधित मंत्रालयों और प्रशासनिक अधिकारियों को पत्र लिखकर यात्री बसों में अवैध रूप से कमर्शियल और विस्फोटक सामान ढोए जाने के काले कारोबार पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।
"यात्री बसों के जरिए बिना किसी कागजात और सुरक्षा जांच के भारी-भरकम ज्वलनशील सामान की तस्करी न केवल वैध व्यापार को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि आम नागरिकों की जिंदगी को दांव पर लगा रही है। यदि अब भी कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी घटनाएं रुकेंगी नहीं।" — राजेंद्र कपूर, राष्ट्रीय अध्यक्ष, ऑल इंडिया मोटर एंड गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन
निष्कर्ष और आगे की राह
सड़क पर दौड़ती इन लापरवाहियों और मौत के सौदागरों पर नकेल कसने का समय आ गया है। केवल मुआवजे की घोषणा करने या कुछ दिनों के लिए चेकिंग अभियान चलाने से मासूमों की जान वापस नहीं लाई जा सकती। इसके लिए परिवहन विभाग, ट्रैफिक पुलिस और बस ऑपरेटरों को अपनी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी तय करनी होगी। जब तक आम यात्री भी जागरूक होकर सुरक्षित बसों की मांग नहीं करेंगे और नियमों का उल्लंघन करने वालों का सामाजिक बहिष्कार नहीं होगा, तब तक इस व्यवस्था को सुधारना असंभव है।






