काबुल/इस्लामाबाद: 'द फ्रीलान्स' की विशेष खोजी रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आया है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच दशकों से चल रहे शीत युद्ध में अब एक ऐसा नया अध्याय जुड़ गया है, जिसने इस्लामाबाद की नींद उड़ा दी है। हमारे खुफिया सूत्रों और क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अफगान तालिबान ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के राइफलों और अत्याधुनिक मशीनगनों के एक भारी-भरकम जखीरे पर अप्रत्याशित रूप से हाथ साफ कर लिया है। इस घटनाक्रम ने न केवल दोनों देशों के बीच सीमाई सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति में एक बड़ा बदलाव ला दिया है।
सीमा पर बदलते समीकरण और हथियारों की लूट
डूरंड लाइन के पास पिछले कुछ हफ्तों से लगातार सैन्य झड़पें देखने को मिल रही हैं। हमारी ऑन-द-ग्राउंड ट्रैकिंग से पता चलता है कि पाकिस्तानी सेना द्वारा कथित तौर पर समर्थित या छोड़े गए हथियारों के डिपो अब तालिबान के लड़ाकों के नियंत्रण में आ चुके हैं। अमेरिकी सेना द्वारा अफगानिस्तान छोड़ने के बाद जो हथियार पीछे छूटे थे, वे तो पहले ही तालिबान के हाथ लग चुके थे, लेकिन अब पाकिस्तानी सेना के आधुनिक असलाह का तालिबान के कब्जे में जाना सामरिक रूप से एक बहुत बड़ा उलटफेर है। यह घटना दर्शाती है कि काबुल अब इस्लामाबाद के रणनीतिक दबाव में रहने को तैयार नहीं है।
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भारत की कूटनीतिक चाल और जल कूटनीति
इस पूरे घटनाक्रम के बीच नई दिल्ली से मिल रही रणनीतिक हलचलें भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में इस बात पर मंथन तेज हो गया है कि भारत अब पाकिस्तान पर एक और कड़ा प्रहार करने की तैयारी में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिंधु जल समझौते और अफगानिस्तान से मिलने वाले पानी के प्राकृतिक प्रवाह को लेकर भारत गंभीर कदम उठाने पर विचार कर रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी रणनीति के तहत भारत और काबुल के बीच परोक्ष रूप से संवाद के नए रास्ते खुलते नजर आ रहे हैं, जिससे पाकिस्तान दोनों मोर्चों पर घिरता दिखाई दे रहा है।
पाकिस्तान के लिए दोतरफा सामरिक संकट
- सैन्य मनोबल पर असर: पाकिस्तानी सेना के हथियारों का तालिबान द्वारा जब्त किया जाना रावलपिंडी के जनरल मुख्यालय (GHQ) के लिए करारा झटका है।
- आंतरिक सुरक्षा चुनौती: तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और अफगान तालिबान के बीच वैचारिक और रणनीतिक तालमेल बढ़ने से पाकिस्तान के भीतर सुरक्षा संकट गहरा गया है।
- अंतरराष्ट्रीय अलगाव: क्षेत्रीय सहयोग के मोर्चे पर पाकिस्तान अब अपने ही पाले हुए तत्वों से घिरता नजर आ रहा है।
आंतरिक अशांति और अन्य बड़ी हलचलें
क्षेत्रीय अस्थिरता का असर केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है। एक तरफ जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू-राजनीतिक खेल पलट रहा है, वहीं आंतरिक मोर्चों पर भी कानून व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। हाल ही में पंजाब के जालंधर में आप नेता लक्की ओबेरॉय की हत्या जैसी वारदातों ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, हालांकि सामरिक विश्लेषकों का मानना है कि देश का सुरक्षा तंत्र हर बाहरी और अंदरूनी चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है। इसके अलावा, प्रशासनिक स्तर पर मध्य प्रदेश के इंदौर राजवाड़ा में पहली बार कैबिनेट बैठक आयोजित कर मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा लिए गए बड़े नीतिगत फैसले भी देश के भीतर विकास और प्रशासन की नई तस्वीर पेश कर रहे हैं।
भविष्य का असर: क्या अफगानिस्तान बनेगा नया पावर सेंटर?
विशेषज्ञों का मानना है कि जिस प्रकार से तालिबान ने पाकिस्तानी हथियारों के जखीरे पर कब्जा जमाया है और क्षेत्रीय जल कूटनीति में भारत की सक्रियता बढ़ रही है, उससे आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया का नक्शा पूरी तरह बदल सकता है। दशकों तक आतंकवाद की फैक्टरी चलाने वाले पाकिस्तान के लिए अब खुद उसका यह नासूर जी का जंजाल बन चुका है। 'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन से साफ है कि आने वाले महीने कूटनीतिक और सैन्य लिहाज से बेहद उथल-पुथल भरे रहने वाले हैं।








