देश के बड़े महानगरों में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर अक्सर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से काफी अलग नजर आती है। हाल ही में जानी-मानी अभिनेत्री तिलोत्तमा शोम ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा नोट साझा किया, जिसने एक बार फिर इस गंभीर मुद्दे पर देश का ध्यान खींच लिया है। उनकी यह पोस्ट केवल एक घटना का जिक्र नहीं है, बल्कि यह उस मानसिक दबाव का आईना है, जिससे देश की हर महिला को रोजमर्रा की जिंदगी में दो-चार होना पड़ता है। इस वाकये ने आम जनता के बीच सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नए सिरे से बहस छेड़ दी है।
मुंबई की एक सड़क और खौफनाक खामोशी
घटना की शुरुआत मुंबई के व्यस्त इलाके जुहू से हुई, जहां अभिनेत्री ने ट्रैफिक सिग्नल के पास फुटपाथ पर एक युवा लड़की को खड़े देखा। वह लड़की मेटल की रेलिंग के सहारे बड़े आराम से अपने फोन में मगन थी। उसके चेहरे पर किसी भी तरह की कोई घबराहट या डर नहीं था। वह पल ऐसा था जो सामान्य और सुकून भरा लग सकता था, लेकिन वहीं खड़े होकर सब कुछ देख रही तिलोत्तमा शोम के मन में बेचैनी शुरू हो गई। उन्होंने देखा कि सड़क से गुजरने वाले कुछ पुरुषों की नजरें उस लड़की पर टिकी रह गईं।
हालांकि उन पुरुषों के हावभाव में कोई स्पष्ट रूप से आक्रामक बात नहीं थी, लेकिन एक महिला होने के नाते अभिनेत्री उस नजर की गहराई और उसके संभावित खतरों को बखूबी समझ रही थीं। उनके मन में बार-बार यह दुविधा आ रही थी कि क्या वे उस लड़की को जाकर कहें कि वह फोन छोड़कर अपने आसपास के माहौल पर ध्यान दे। लेकिन साथ ही वे यह भी चाहती थीं कि वह युवा महिला बिना किसी डर के आजादी के उस पल का आनंद ले सके और देश में चैन से जी सके।
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पुरानी यादें और दिल्ली के वे दिन
इस पूरी घटना ने अभिनेत्री को उनके अतीत के दिनों की याद दिला दी। उन्होंने याद किया कि कैसे वे दिल्ली के प्रतिष्ठित लेडी श्रीराम कॉलेज की छात्रा रह चुकी हैं और राजधानी में रहते हुए उन्होंने लंबे समय तक सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल किया है। दिल्ली की सड़कों से लेकर मुंबई की गलियों तक, महिलाओं के लिए सार्वजनिक जगहों पर बेफिक्र घूमना आज भी एक चुनौती बना हुआ है। उन्होंने महसूस किया कि दशकों बीत जाने के बाद भी महिलाओं की मानसिक स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है।
जब एक महिला घर से बाहर निकलती है, तो उसके अवचेतन मन में लगातार यह बात चलती रहती है कि उसे खुद को सुरक्षित रखना है। यह केवल शारीरिक सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि यह उस मानसिक थकान का भी है जो हर वक्त सतर्क रहने की वजह से पैदा होती है। समाज में सुरक्षा के तमाम दावों के बावजूद महिलाओं का सहज और निश्चिंत होकर जीना आज भी एक अधूरा सपना सा लगता है।
अस्पतालों की चारदीवारी में भी सुरक्षा पर सवाल
जुहू की इस घटना के तुरंत बाद अभिनेत्री का सामना एक और ऐसी परिस्थिति से हुआ जिसने उनके इन खौफनाक अहसासों को और गहरा कर दिया। हाल ही में उनके किसी परिचित व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल की उस शांत और नियंत्रित माहौल में पहुंचने के बाद उनके मन में एक अजीब सा डर घर कर गया। उन्होंने एक बुरे सपने से जागने के बाद खुद से यह सवाल किया कि क्या आज के समय में अस्पताल जैसी जगहों पर भी महिलाएं सुरक्षित हैं?
उन्होंने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए सवाल उठाया कि क्या अस्पताल के बिस्तर पर बेहोश या लाचार पड़ी महिला सचमुच पूरी तरह सुरक्षित मानी जा सकती है? यह सवाल सिर्फ एक अभिनेत्री का नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस नागरिक के मन में उठना चाहिए जो समाज की व्यवस्था को दुरुस्त करने का दावा करता है। जब सुरक्षित मानी जाने वाली जगहों पर भी सवालिया निशान खड़े होने लगें, तो व्यवस्था की असलियत खुद-ब-खुद सामने आ जाती है।
मानसिक बोझ और एक उम्मीद की किरण
इन दोनों ही घटनाओं में तकनीकी रूप से कोई बड़ा अपराध नहीं हुआ था, लेकिन इसके बावजूद जो मानसिक आघात महिलाओं को झेलना पड़ता है, वह बेहद भारी होता है। किसी भी तरह की अनहोनी न होने के बावजूद यह अहساس कि कभी भी कुछ भी हो सकता है, महिलाओं के मन में एक स्थायी डर पैदा कर देता है। यही वह अदृश्य बोझ है जिसे देश की आधी आबादी हर दिन ढोने के लिए मजबूर है।
"हम बार-बार टूटते हैं ताकि बार-बार एक हो सकें, क्योंकि हम अभी भी एक अतुलनीय भारत की उम्मीद कर सकते हैं।" — तिलोत्तमा शोम, अभिनेत्री
अपनी इस लंबी और मार्मिक बात को समाप्त करते हुए अभिनेत्री ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। उन्होंने लिखा कि तमाम विसंगतियों और टूटन के बावजूद लोग फिर से जुड़ते हैं क्योंकि वे एक बेहतर और सुरक्षित भविष्य की आस लगाए रहते हैं। उनकी यह पोस्ट देश के सिस्टम और आम आदमी दोनों के लिए एक चेतावनी भी है और सुधार की दिशा में उठाया गया एक वैचारिक कदम भी।





