नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — वैश्विक रक्षा बाजार से भारत के लिए एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। तुर्की के एडवांस्ड जेट ट्रेनर और हल्के लड़ाकू विमान 'हर्जेट' ने भारत के स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान 'एलसीए तेजस' को पछाड़ दिया है। यूरोपीय देश स्पेन के साथ तुर्की की इस नई रक्षा डील ने भारतीय रक्षा मंत्रालय और वायुसेना की चिंताएं बढ़ा दी हैं। यह घटनाक्रम केवल एक विमान की बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय हथियारों के बाजार में भारत की बढ़ती पहुंच के सामने एक बड़े झटके की तरह देखा जा रहा है।
रक्षा जानकारों के मुताबिक, स्पेन अपनी वायुसेना के पुराने विमानों को बदलने के लिए नए विकल्प तलाश रहा था। इस दौड़ में भारत का 'तेजस' भी शामिल था, जो अपनी कम लागत और बेहतरीन तकनीकी खूबियों के लिए जाना जाता है। लेकिन आखिरी दौर में स्पेन ने तुर्की के 'हर्जेट' पर अपना भरोसा जताया। इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय रक्षा गलियारों में चर्चा तेज हो गई है कि आखिर भारतीय विमान वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कहां पिछड़ गया और इसके पीछे क्या कूटनीतिक कारण रहे हैं।
वैश्विक रक्षा बाजार में तुर्की की बढ़ती पैठ
तुर्की पिछले कुछ सालों से अपने रक्षा उत्पादन को तेजी से बढ़ावा दे रहा है। ड्रोन तकनीक के बाद अब उसके लड़ाकू विमान भी वैश्विक स्तर पर अपनी जगह बना रहे हैं। 'हर्जेट' विमान की कम कीमत और समय पर डिलीवरी का वादा विदेशी खरीदारों को ज्यादा आकर्षित कर रहा है। इसके मुकाबले, भारतीय रक्षा उद्योगों को अपने विमानों की आपूर्ति के समय और उत्पादन क्षमता के स्तर पर अभी और सुधार करने की जरूरत महसूस हो रही है। स्पेन के साथ हुई इस डील ने यह साबित कर दिया है कि यूरोपीय रक्षा बाजार में जगह बनाना भारत के लिए कितना कठिन और चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।
दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में चल रहे समीकरण भी इस डील को प्रभावित कर रहे हैं। रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि यूरोपीय संघ के भीतर आपसी रक्षा सहयोग और कूटनीतिक दबाव भी ऐसे फैसलों में अहम भूमिका निभाते हैं। तुर्की ने अपनी रक्षा कंपनियों को आर्थिक छूट और तकनीकी साझेदारी के जो ऑफर दिए, वे स्पेन को ज्यादा मुफीद लगे। इसके विपरीत, भारत के लिए अपने रक्षा उत्पादों की मार्केटिंग और ग्लोबल सप्लाई चेन को मजबूत करने के मोर्चे पर अभी लंबी लड़ाई लड़नी बाकी है।
भारत के स्वदेशी विमान 'तेजस' के सामने खड़ी नई चुनौतियां
भारतीय वायुसेना पहले ही 'तेजस' के मार्क-1ए संस्करण के उत्पादन में हो रही देरी से जूझ रही है। सरकारी रक्षा कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल पर समय पर विमानों की डिलीवरी का भारी दबाव है। जब देश की अपनी जरूरतें ही पूरी होने में वक्त लग रहा है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में नए ग्राहकों को भरोसा दिलाना और मुश्किल हो जाता है। स्पेन की इस डील के हाथ से निकल जाने के बाद अब भारत को अपनी निर्यात रणनीति पर नए सिरे से विचार करने की सख्त जरूरत आन पड़ी है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच केवल रक्षा बाजार ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर कई अन्य भू-राजनीतिक बदलाव भी भारत के लिए चिंता का विषय बन रहे हैं। पड़ोसी देशों के साथ रूस के बदलते रिश्तों और वैश्विक कूटनीति के बदलते समीकरणों के बीच भारत को अपनी विदेश नीति और रक्षा कूटनीति दोनों मोर्चों पर बेहद सतर्क रहना होगा। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से साफ है कि आने वाले दिनों में भारतीय रक्षा निर्यात को वैश्विक बाजार में टिके रहने के लिए अपनी उत्पादन रफ्तार और तकनीकी गुणवत्ता दोनों को रिकॉर्ड स्तर पर सुधारना होगा।
रूस-पाकिस्तान संबंध और भू-राजनीतिक मोर्चे पर बढ़ती चिंताएं
रक्षा बाजार में झटके के साथ-साथ कूटनीतिक मोर्चे पर भी भारत के लिए चुनौतियां कम नहीं हो रही हैं। रूस और पाकिस्तान के बीच बढ़ते संबंधों ने दिल्ली के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है। मास्को और इस्लामाबाद के बीच रक्षा और कूटनीतिक स्तर पर हो रहे तालमेल को भारत की सुरक्षा के लिहाज से बहुत संवेदनशील माना जा रहा है। ऐसे समय में जब वैश्विक मंचों पर नए समीकरण बन रहे हैं, भारत को अपनी पारंपरिक दोस्ती के साथ-साथ नई रणनीतिक साझेदारियों को बहुत सावधानी से संभालना होगा ताकि देश की सुरक्षा और हितों पर कोई आंच न आए।


