नई दिल्ली और न्यूयॉर्क के कूटनीतिक गलियारों से लेकर संयुक्त राष्ट्र की बैठकों तक, इन दिनों एक ही सवाल सबसे मुखर है—क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का वर्तमान स्वरूप अब वैश्विक वास्तविकताओं को दर्शाने में असमर्थ हो चुका है? 'द फ्रीलान्स' की ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के विश्लेषण से यह साफ है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद गढ़ी गई इस वैश्विक संस्था के भीतर बदलाव का दबाव अब चरम पर पहुंच गया है। हालिया घटनाक्रमों में IBSA (भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका) देशों का अल्टीमेटम और रूस द्वारा भारत की उम्मीदवारी की जोरदार पैरवी ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है।
IBSA का कड़ा रुख और ग्लोबल साउथ की आवाज
संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र की पृष्ठभूमि में ग्लोबल साउथ के देशों ने अपनी आवाज को और बुलंद कर दिया है। IBSA मंच से स्पष्ट रूप से यह रेखांकित किया गया है कि अब पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाली वैश्विक व्यवस्था अधिक समय तक टिक नहीं सकती। भारत को UNSC में स्थायी सीट दिए जाने की मांग अब केवल भारत का द्विपक्षीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक दक्षिण के उन तमाम देशों की आकांक्षा बन चुका है जो दशकों से संयुक्त राष्ट्र के फैसलों में खुद की नुमाइंदगी की तलाश कर रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान सुरक्षा परिषद अपने 81वें सत्र के करीब आते-आते अपनी उस प्रासंगिकता को खोती दिख रही है, जिसके लिए इसे कभी स्थापित किया गया था।
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रूस का खुला समर्थन और कूटनीतिक समीकरण
इस पूरी कूटनीति के बीच मॉस्को की ओर से आया बयान बेहद रणनीतिक और वजनदार है। रूस ने न केवल UNSC के स्थायी सदस्य के रूप में भारत की उम्मीदवारी का पूर्ण समर्थन किया है, बल्कि पश्चिमी ताकतों की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए भारत के पक्ष को पुरजोर तरीके से रखा है। हालांकि, जहां एक ओर रूस भारत के साथ पूरी मजबूती से खड़ा है, वहीं जर्मनी और जापान जैसे अन्य दावेदारों के प्रति उसका रुख कुछ अलग देखा जा रहा है। हमारे सामरिक विशेषज्ञों के मुताबिक, मास्को का यह रुख भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और वैश्विक मंच पर उसकी निष्पक्ष और मजबूत स्थिति की स्वीकारोक्ति है।
वीटो पावर पर तकरार और संस्थागत कमियां
सुरक्षा परिषद की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी 'वीटो पावर' (Veto Power) व्यवस्था है। पांच स्थायी सदस्यों के पास मौजूद यह असीमित अधिकार अक्सर वैश्विक शांति और सुरक्षा के रास्ते में बड़ा रोड़ा साबित होता है। हालिया क्षेत्रीय संघर्षों, चाहे वह पश्चिम एशिया का संकट हो या अन्य कूटनीतिक गतिरोध, ने यह साबित कर दिया है कि मौजूदा UNSC दब्बू और कमजोर साबित हो रही है। जब तक वीटो पावर के ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किया जाता, तब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाले बड़े फैसलों पर आम सहमति बनना नामुमकिन है। Drishti IAS और अन्य वैचारिक मंचों पर भी इस बात पर गहरी चिंता जताई गई है कि कैसे यह वीटो पावर वैश्विक न्याय के रास्ते में बाधा बनी हुई है।
भविष्य का परिदृश्य और भारत की स्थिति
अंततः, सवाल यह उठता है कि क्या संयुक्त राष्ट्र अपने 81वें सत्र तक आते-आते खुद को पुनर्जीवित कर पाएगा? भारत के लिए यह क्षण केवल एक सीट पाने की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में उस बहुध्रुवीय (Multipolar) संतुलन को स्थापित करने का अवसर है जिसकी वकालत नई दिल्ली लगातार करती रही है। 'द फ्रीलान्स' की पड़ताल बताती है कि आने वाले दिनों में UNSC सुधारों पर दबाव और बढ़ेगा, और भारत इस वैश्विक परिवर्तन के केंद्र में मजबूती से खड़ा है।




