नई दिल्ली/संयुक्त राष्ट्र: वैश्विक कूटनीति के गलियारों में इन दिनों एक ही सवाल सबसे ज्यादा गूंज रहा है—क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का मौजूदा ढांचा अपनी प्रासंगिकता खो चुका है? 'द फ्रीलान्स' की विशेष पड़ताल और हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रम बताते हैं कि 81वें संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के नजदीक आते ही दुनिया की सबसे ताकतवर संस्था के भीतर बदलाव की मांग अब और तीखी हो गई है। भारत की स्थायी सदस्यता की मांग को लेकर जहाँ ग्लोबल साउथ की आवाजें बुलंद हो रही हैं, वहीं पश्चिमी देशों की चुप्पी पर भी सवालिया निशान लगने लगे हैं।
IBSA का कड़ा अल्टीमेटम और वैश्विक कूटनीति
हाल ही में IBSA (भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका) गठबंधन ने UNSC में सुधारों को लेकर एक कड़ा रुख अख्तियार किया है। गठबंधन ने स्पष्ट शब्दों में अल्टीमेटम दिया है कि सुरक्षा परिषद में वैश्विक दक्षिण (Global South) की अनदेखी अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय बने ढांचे में आज की बहुध्रुवीय दुनिया (Multipolar World) का प्रतिनिधित्व नहीं झलकता। जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते स्थायी सदस्यता के विस्तार पर फैसला नहीं लिया गया, तो यूएन की साख पर और गहरा बट्टा लगेगा।
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रूस की जोरदार पैरवी और वीटो पावर का पेंच
इस बीच, मॉस्को से आ रहे संकेत नई दिल्ली के लिए बेहद उत्साहजनक हैं। रूस ने एक बार फिर UNSC में भारत की उम्मीदवारी का खुलकर समर्थन किया है। 'द फ्रीलान्स' के राजनयिक सूत्रों के मुताबिक, रूस का यह समर्थन सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि यह उभरती हुई वैश्विक धुरी का हिस्सा है। हालांकि, सवाल यह भी उठ रहा है कि रूस जहां भारत और मॉरीशस जैसे देशों के पक्ष में खड़ा है, वहीं जर्मनी और जापान की उम्मीदवारी को लेकर उसकी आपत्तियों के अपने भू-राजनीतिक निहितार्थ हैं। वीटो पावर (Veto Power) के दुरुपयोग और इसके खाके को बदलने की मांग पर भी विश्लेषकों के बीच तीखी बहस छिड़ी हुई है।
'दब्बू और कमजोर' होती यूएन महासभा की वास्तविकता
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि केवल सुरक्षा परिषद ही नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की कार्यप्रणाली भी आज के दौर में 'दब्बू और कमजोर' साबित हो रही है। इजरायल-पारीस्तान संघर्ष से लेकर दुनिया के अन्य हिस्सों में चल रहे युद्धों के बीच यूएन के प्रस्ताव या तो कागजी साबित होते हैं या फिर महाशक्तियों के वीटो की भेंट चढ़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में, भारत जैसी बड़ी उभरती हुई अर्थव्यवस्था और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को स्थायी सीट मिलना न केवल भारत का अधिकार है, बल्कि यह वैश्विक शांति के लिए भी अनिवार्य है।
भविष्य का असर और आगे की राह
- सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और वीटो पावर के इस्तेमाल पर पुनर्विचार की मांग तेज।
- भारत के पक्ष में IBSA और रूस जैसे प्रमुख वैश्विक खिलाड़ियों का समर्थन कूटनीतिक पलड़ा भारी कर रहा है।
- पश्चिमी देशों और पारंपरिक महाशक्तियों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों को स्वीकार करें।
हमारी फील्ड जांच बताती है कि आने वाले दिनों में कूटनीतिक मोर्चे पर यह संघर्ष और तेज होगा। क्या भारत को आखिरकार वह मुकाम मिलेगा जिसका वह हकदार है? इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि ग्लोबल साउथ कितनी एकजुटता से दबाव बना पाता है। 'द फ्रीलान्स' इस पूरी प्रक्रिया पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा।




