नई दिल्ली और जिनेवा के कूटनीतिक गलियारों से लेकर संयुक्त राष्ट्र की बैठकों तक, एक ही सवाल सबसे ज्यादा गूंज रहा है—क्या सदी के आठवें दशक में प्रवेश कर रहा संयुक्त राष्ट्र संघ अब अपनी प्रासंगिकता खो चुका है? वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की संरचना और इसकी वीटो पावर पर चल रही तीखी बहस इस बात की गवाही दे रही है कि वैश्विक शासन प्रणाली में बड़े सुधारों का वक्त आ चुका है। द फ्रीलान्स के विशेष ग्राउंड विश्लेषण में हमने यह जानने की कोशिश की है कि आखिर क्यों भारत की स्थायी सदस्यता की मांग आज अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बन गई है।
IBSA का कड़ा अल्टीमेटम और बदलता वैश्विक समीकरण
हालिया घटनाक्रमों में IBSA (भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका) समूह ने UNSC में स्थायी सदस्यता के मुद्दे पर एक स्पष्ट और कड़ा अल्टीमेटम जारी किया है। समूह का साफ कहना है कि वैश्विक दक्षिण (Global South) की अनदेखी अब और बर्दाश्त नहीं की जा सकती। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद गढ़ी गई इस व्यवस्था में आज की आर्थिक और सामरिक महाशक्तियों को नजरअंदाज करना संयुक्त राष्ट्र की साख को लगातार धमिल कर रहा है। लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के इन प्रमुख देशों का यह गठबंधन अब पश्चिमी देशों पर दबाव बना रहा है कि वे सुरक्षा परिषद के विस्तार को टाले नहीं।
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रूस की जोरदार पैरवी और जर्मनी-जापान पर पेच
इस कूटनीतिक शतरंज में रूस ने एक बार फिर खुलकर भारत की उम्मीदवारी का समर्थन किया है। मास्को का मानना है कि बहुध्रुवीय (Multiplex) दुनिया में भारत की स्थायी मौजूदगी के बिना UNSC के निर्णय अधूरे और एकतरफा हैं। हालांकि, इसी समीकरण का दूसरा पहलू बेहद दिलचस्प और जटिल है। जहां रूस भारत के पक्ष में खुलकर खड़ा है, वहीं जर्मनी और जापान की उम्मीदवारी को लेकर भू-राजनीतिक पेच फंसे हुए हैं। रूस और कुछ अन्य देश जर्मनी और जापान के ऐतिहासिक और वर्तमान सैन्य-राजनीतिक गठजोड़ के चलते उनकी प्रविष्टि पर सतर्क रुख अपनाए हुए हैं, जिससे यह सुधार प्रक्रिया और पेचीदा हो गई है।
वीटो पावर पर बहस और संयुक्त राष्ट्र की 'कमजोर' होती साख
विश्लेषकों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के हालिया सत्रों में जिस तरह से वैश्विक दक्षिण ने आवाज उठाई है, उससे साफ है कि UNSC के पांच स्थायी सदस्यों (P5) के पास केंद्रित 'वीटो पावर' अब वैश्विक शांति के बजाय अड़ंगेबाजी का साधन बन गई है। इजरायल-पलेस्टाइन संघर्ष से लेकर अन्य क्षेत्रीय तनावों के दौरान सुरक्षा परिषद की विफलता ने इसे 'दब्बू और कमजोर' संस्था के रूप में चित्रित किया है। ऐसे में भारत जैसे विशाल लोकतंत्र और उभरती आर्थिक ताकत को शामिल करना न सिर्फ न्यायसंगत है, बल्कि इस संस्था के वजूद को बचाने के लिए अनिवार्य भी है।
भविष्य का असर और आगे की राह
हमारी फील्ड जांच बताती है कि आने वाले समय में पश्चिमी देशों पर भारत के पक्ष में समर्थन जुटाने का कूटनीतिक दबाव और बढ़ेगा। मॉरीशस जैसे छोटे देशों का समर्थन भी भारत के पक्ष में नैतिक वजन बढ़ाता है। हालांकि, राह आसान नहीं है क्योंकि वीटो पावर के स्वार्थी इस्तेमाल से बाज न आने वाले देश आसानी से अपनी ताकत का दायरा साझा करने से बचेंगे। बावजूद इसके, भारत की बढ़ती आर्थिक और सामरिक ताकत अब ग्लोबल मंच पर ऐसी हकीकत बन चुकी है जिसे नजरअंदाज करना किसी भी महाशक्ति के लिए मुमकिन नहीं होगा।




