उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले INDIA गठबंधन में क्यों मचा है घमासान?
उत्तर प्रदेश के आगामी राजनीतिक रण से पहले विपक्षी 'INDIA' गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस के बीच सीटों के तालमेल को लेकर चल रही खींचतान अब खुलकर सतह पर आने लगी है। दोनों दलों के नेताओं की ओर से लगातार तीखे बयान सामने आ रहे हैं, जिससे गठबंधन की एकजुटता पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि क्या यह सिर्फ सीटों के लिए प्रेशर पॉलिटिक्स है या फिर गठबंधन में बड़ी टूट की शुरुआत हो चुकी है।
यह पूरा विवाद और बयानबाजी का सिलसिला पिछले कुछ महीनों से सुलग रहा था, जो सितंबर के आखिरी हफ्ते में अपने चरम पर पहुंच गया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और समाजवादी पार्टी के प्रवक्ताओं व सांसदों के बीच जुबानी जंग ने सियासी तापमान को काफी बढ़ा दिया है। जानकार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े सूबे में बिना किसी ठोस फार्मूले के आगे बढ़ना दोनों दलों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है, लेकिन अहंकार और सीटों की महत्वाकांक्षा इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन रही है।
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कांग्रेस और सपा नेताओं के तीखे बोल से बिगड़ा माहौल
इस आपसी कलह की शुरुआत तब और साफ हो गई जब कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सीट समझौते को लेकर एक तीखा बयान दिया। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि यदि गठबंधन नहीं करना है तो कौन कह रहा है, क्या पार्टी किसी से भीख मांग रही है। इस बयान ने समाजवादी पार्टी के नेताओं को नागवार गुजरा। इसके तुरंत बाद सपा सांसद इकरा हसन ने पलटवार करते हुए इसे एक बचकाना बयान करार दिया और दावा किया कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को केवल अखिलेश यादव ही शिकस्त दे सकते हैं।
मामले को और तूल देते हुए सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और नेता आईपी सिंह ने कांग्रेस के 150 सीटों पर दावे करने वाले बयानों पर जोरदार तंज कसा। उन्होंने सोशल मीडिया और बयानों के जरिए लुटियंस दिल्ली के कांग्रेसियों को चुनौती दी कि वे यूपी की सभी 403 सीटों पर अकेले चुनाव लड़कर देख लें। इन बयानों से साफ जाहिर होता है कि जमीन पर दोनों दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच किस स्तर का अविश्वास पैदा हो चुका है, जिसे पाटना शीर्ष नेतृत्व के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
अखिलेश यादव ने INDIA गठबंधन की बैठक से बनाई दूरी
इस बढ़ते तनाव के बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का एक बड़ा कदम सामने आया। उन्होंने INDIA गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक में व्यक्तिगत रूप से शामिल होने से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने अपनी पहले से तय व्यस्तताओं का हवाला देते हुए पार्टी की तरफ से एक प्रतिनिधिमंडल भेजने की बात कही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव फिलहाल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ किसी भी ऐसी आमने-सामने की बैठक से बचना चाहते हैं जहाँ सीटों के बंटवारे पर असहज सवाल उठ सकते हैं।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यह कदम कांग्रेस को यह स्पष्ट संदेश देने के लिए उठाया गया है कि समाजवादी पार्टी किसी के भी राजनीतिक दबाव में काम करने को तैयार नहीं है। अपने इस कदम से अखिलेश ने यह जता दिया है कि उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय दल के तौर पर सपा की अपनी शर्तें होंगी और पार्टी अपनी ताकत के हिसाब से ही मैदान में उतरेगी। कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले रायबरेली क्षेत्र से अपनी रथ यात्रा की शुरुआत करना भी इसी रणनीति का एक हिस्सा माना जा रहा है।
रायबरेली-अमेठी सीटों पर पेंच और AIMIM की नई चुनौती
कांग्रेस और सपा के बीच सीटों के इस शीत युद्ध में रायबरेली और अमेठी क्षेत्र की कुछ प्रमुख सीटें मुख्य केंद्र बन गई हैं। इनमें ऊंचाहार, हरचंदपुर और खुद अमेठी व रायबरेली की अन्य विधानसभा सीटों पर दोनों दल अपना दावा ठोक रहे हैं। समाजवादी पार्टी का स्पष्ट मानना है कि उत्तर प्रदेश के पैमाने पर उनका जमीनी जनाधार और काडर कांग्रेस की तुलना में काफी मजबूत है, इसलिए वे अधिकांश सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारना चाहते हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी की हालिया लोकप्रियता और भारत जोड़ो यात्रा के प्रभाव को भुनाने की जुगत में ज्यादा सीटें मांग रही है।
"राजनीति में दबाव की रणनीति हमेशा अंतिम समय तक चलती है, लेकिन जब आपसी समन्वय टूट जाए तो इसका सीधा फायदा विरोधी दल को मिलता है। सपा और कांग्रेस को अपनी प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार करना होगा।" — राजनीतिक विश्लेषक
इस पूरे घटनाक्रम में एक और बड़ा राजनीतिक समीकरण असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के रूप में उभर रहा है। ओवैसी ने कानपुर की एक बड़ी जनसभा में साफ ऐलान कर दिया है कि वे आगामी 2 अक्टूबर तक विपक्षी दलों के रुख का इंतजार करेंगे। यदि विपक्षी गठबंधन ने उनकी पार्टी को साथ नहीं लिया, तो वे अपने दम पर अपनी राह चुनेंगे। ओवैसी का यह रुख उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों में सपा और कांग्रेस के साझा समीकरण को तगड़ा झटका दे सकता है, क्योंकि इससे अल्पसंख्यक वोटों का बिखराव तय माना जा रहा है।
कांग्रेस की अपनी तैयारी और भविष्य की राह
दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी ने इन तमाम उठापटक के बीच अपनी सांगठनिक तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के सहप्रभारी और राष्ट्रीय सचिव जगदीश चंद्र जांगिड़ ने साफ किया है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व सीट बंटवारे के मुद्दों पर अपना काम कर रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने के लिए सभी 403 सीटों पर तैयारियां तेज कर दी गई हैं। महाराजपुर और कल्याणपुर जैसे इलाकों में कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कर पार्टी यह जताना चाहती है कि वह हर परिस्थिति के लिए तैयार है।
बहरहाल, उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले INDIA गठबंधन के भीतर जारी यह घमासान आने वाले दिनों में क्या मोड़ लेगा, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा। क्या दोनों दल आपसी अहंकार और सीटों के मोह को छोड़कर कोई व्यावहारिक रास्ता निकाल पाएंगे, या फिर यह बिखराव विपक्षी एकता की सबसे बड़ी कमजोरी साबित होगा? इसका जवाब आने वाले हफ्तों की राजनीतिक बैठकों और समझौतों पर निर्भर करेगा।





